Durga Saptashati Path Vidhi: नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। इस पाठ में 13 अध्याय हैं, जिनमें मां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की महिमा का वर्णन मिलता है। पाठ शुरू करने से पहले नवार्ण मंत्र का विनियोग, ऋष्यादिन्यास, करन्यास और हृदयादि षडंग न्यास करना काफी आवश्यक है।
क्या है दुर्गासप्तशती के पाठ की विधि (Image AI Generated and Newsroom Verified)
करन्यास में हाथों की उंगलियों और हथेलियों का मंत्रों के साथ स्पर्श किया जाता है। हृदयादि षडंग न्यास में हृदय, सिर, शिखा, कंधे, नेत्र और शरीर की सुरक्षा से जुड़े अस्त्र न्यास की क्रियाएं की जाती हैं। इन प्रक्रियाओं के साथ अक्षरन्यास, व्यापक न्यास और दिग्न्यास भी किया जाता है। इनको करने से व्यक्ति के चारों ओर से सुरक्षा चक्र बन जाता है। आइए जानते हैं कि पाठ करतेे समय यह कैसे करें।
दुर्गा सप्तशती पाठ की कैसे करें तैयारी
सबसे पहले सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान पर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। अपने सामने दुर्गा सप्तशती की पुस्तक, जल से भरा पात्र, फूल, दीपक और पूजा की दूसरी जरूरी सामग्री रखें। इसके बाद आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। मां दुर्गा का ध्यान करें और अपनी मनोकामना के अनुसार पाठ का संकल्प लें। अगर आप विस्तृत नवार्ण विधि कर रहे हैं, तो उसके क्रम में विनियोग, ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादि षडंग न्यास, अक्षरन्यास, व्यापक न्यास, दिग्न्यास, देवी ध्यान और नवार्ण मंत्र का जाप शामिल करें।
दुर्गा सप्तशती का महाविनियोग मंत्र
सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए महाविनियोग का पाठ किया जाता है। इसमें ऋषि, छंद, देवता और पाठ का उद्देश्य बताया जाता है।
महाविनियोग मंत्र
ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तशतीपाठमहामन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं पाठे विनियोगः॥
विनियोग करने की विधि: दाहिने हाथ में थोड़ा जल और साबुत अक्षत यानी चावल लें और मंत्र का उच्चारण करें। मंत्र पूरा होने के बाद जल को किसी साफ पात्र में छोड़ दें। यह सम्पूर्ण सप्तशती पाठ का महाविनियोग है। इसके बाद नवार्ण मंत्र के करन्यास और हृदयादि न्यास के लिए अलग विनियोग आता है। दोनों का इस्तेमाल एक ही उद्देश्य से नहीं होता है।
नवार्ण मंत्र का विनियोग कैसे करें
दुर्गा सप्तशती की नवार्ण विधि में करन्यास और हृदयादि षडंग न्यास से पहले नवार्ण मंत्र का विनियोग किया जाता है। इस मंत्र में तीन ऋषियों, तीन छंदों, तीन देवी स्वरूपों, बीज, शक्ति और कीलक का उल्लेख है।
नवार्ण मंत्र का विनियोग
॥ श्रीगणपतिर्जयति ॥
ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
मंत्र पूरा होने के बाद हाथ में लिया हुआ जल छोड़ दें। अब ऋष्यादिन्यास करें।
ऋष्यादिन्यास की पूरी विधि
ऋष्यादिन्यास में मंत्र के ऋषि, छंद, देवता, बीज, शक्ति और कीलक का नाम लेते हुए शरीर के संबंधित अंगों को स्पर्श किया जाता है। इसके लिए दाहिने हाथ की उंगलियों का इस्तेमाल करें।
पहला मंत्र — सिर का स्पर्श
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि॥
विधि: मंत्र बोलते हुए सिर को स्पर्श करें।
दूसरा मंत्र — मुख का स्पर्श
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः मुखे॥
विधि: दाहिने हाथ की उंगलियों से मुख को स्पर्श करें।
तीसरा मंत्र — हृदय का स्पर्श
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि॥
विधि: छाती के बीच हृदय स्थान को स्पर्श करें।
चौथा मंत्र — बीज का न्यास
ऐं बीजाय नमः गुह्ये॥
विधि: गुह्य स्थान का पारंपरिक न्यास किया जाता है। असुविधा होने पर इसे मानसिक रूप से भी कर सकते हैं।
पांचवां मंत्र — शक्ति का न्यास
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः॥
विधि: दोनों पैरों का स्पर्श करें या उनका ध्यान करें।
छठा मंत्र — कीलक का न्यास
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ॥
विधि: नाभि स्थान को स्पर्श करें।
इन छह मंत्रों के बाद नवार्ण मंत्र से दोनों हाथों का शुद्धिकरण करके करन्यास करें।
करन्यास की पूरी विधि और मंत्र
करन्यास में दोनों हाथों की उंगलियों, हथेलियों और हाथों के पिछले हिस्से का क्रम से स्पर्श किया जाता है। हर मंत्र के साथ उसी अंग का स्पर्श करें, जिसका नाम मंत्र में आया है।
पहला चरण: अंगूठों का न्यास
मंत्र: ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः॥
विधि: दोनों हाथों की तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।
दूसरा चरण: तर्जनी उंगलियों का न्यास
मंत्र: ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः॥
विधि: दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें।
तीसरा चरण: मध्यमा उंगलियों का न्यास
मंत्र: ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः॥
विधि: दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें।
चौथा चरण: अनामिका उंगलियों का न्यास
मंत्र: ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः॥
विधि: दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें।
पांचवां चरण: कनिष्ठिका उंगलियों का न्यास
मंत्र:ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः॥
विधि: दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें।
छठा चरण: हथेली और हाथ के पिछले हिस्से का न्यास
मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥
विधि: दोनों हथेलियों को आपस में स्पर्श करें। इसके बाद दोनों हाथों के पिछले हिस्सों का भी स्पर्श करें।
इन छह चरणों के साथ करन्यास पूरा होता है। इसके बाद हृदयादि षडंग न्यास करें।
हृदयादि षडंग न्यास की पूरी विधि
हृदयादि षडंग न्यास में छह क्रियाएं होती हैं। इनके मंत्रों में हृदय, सिर, शिखा, कवच, तीन नेत्र और अस्त्र का उल्लेख है। हर मंत्र बोलते समय संबंधित अंग को स्पर्श करें।
पहला मंत्र: हृदय न्यास
मंत्र: ॐ ऐं हृदयाय नमः॥
विधि: दाहिने हाथ की पांचों उंगलियों को मिलाकर छाती के बीच हृदय स्थान को स्पर्श करें।
दूसरा मंत्र: शिर न्यास
मंत्र: ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा॥
विधि: दाहिने हाथ की उंगलियों से सिर के ऊपरी हिस्से को स्पर्श करें।
तीसरा मंत्र: शिखा न्यास
मंत्र:ॐ क्लीं शिखायै वषट्॥
विधि: सिर के पीछे शिखा वाले स्थान को स्पर्श करें। जिनकी शिखा नहीं है, वे उसी स्थान पर हाथ रख सकते हैं।
चौथा मंत्र: कवच न्यास
मंत्र: ॐ चामुण्डायै कवचाय हुं॥
विधि: दोनों हाथों को छाती के सामने क्रॉस करें। दाहिने हाथ से बाएं कंधे और बाएं हाथ से दाहिने कंधे को एक साथ स्पर्श करें।
पांचवां मंत्र: नेत्रत्रय न्यास
मंत्र: ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्॥
विधि: दाहिने हाथ की उंगलियों से दोनों आंखों और भौंहों के बीच के स्थान को हल्के से स्पर्श करें। इस क्रिया में तीसरे नेत्र का स्थान भी शामिल होता है।
छठा मंत्र: अस्त्र न्यास
मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्॥
विधि: मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर शरीर के चारों ओर ले जाएं। इसके बाद दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से बाईं हथेली पर हल्की ताली दें। इस तरह हृदयादि षडंग न्यास पूरा होता है।
नवार्ण मंत्र का अक्षरन्यास कैसे करें
विस्तृत नवार्ण विधि में षडंग न्यास के बाद अक्षरन्यास भी किया जाता है। इसमें नवार्ण मंत्र के अक्षरों को शरीर के अलग-अलग स्थानों पर स्थापित करने की क्रिया होती है। इन मंत्रों को एक-एक करके बोलें और दाहिने हाथ की उंगलियों से संबंधित अंग का स्पर्श करें।
1. शिखा का न्यास
ॐ ऐं नमः शिखायाम्॥
विधि: सिर के पीछे शिखा वाले स्थान को स्पर्श करें।
2. दाईं आंख का न्यास
ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे॥
विधि: दाईं आंख के पास हल्के से स्पर्श करें।
3. बाईं आंख का न्यास
ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे॥
विधि: बाईं आंख के पास हल्के से स्पर्श करें।
4. दाएं कान का न्यास
ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे॥
विधि: दाएं कान को स्पर्श करें।
5. बाएं कान का न्यास
ॐ मुं नमः वामकर्णे॥
विधि: बाएं कान को स्पर्श करें।
6. दाईं नासिका का न्यास
ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे॥
विधि: दाईं नासिका के पास स्पर्श करें।
7. बाईं नासिका का न्यास
ॐ यैं नमः वामनासापुटे॥
विधि: बाईं नासिका के पास स्पर्श करें।
8. मुख का न्यास
ॐ विं नमः मुखे॥
विधि: मुख को स्पर्श करें।
9. गुह्य स्थान का न्यास
ॐ च्चें नमः गुह्ये॥
विधि: इस स्थान का पारंपरिक न्यास किया जाता है। असुविधा होने पर मानसिक रूप से मंत्र बोलकर न्यास करें।
व्यापक न्यास की विधि
अक्षरन्यास पूरा होने के बाद व्यापक न्यास किया जाता है। इसमें मूल नवार्ण मंत्र बोलते हुए सिर से पैर तक शरीर के सभी अंगों का दोनों हाथों से क्रमशः स्पर्श किया जाता है।
मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
इस मंत्र को आठ बार बोलें। हर बार दोनों हाथों से सिर से लेकर पैरों तक शरीर पर क्रम से हाथ फेरें। इस दौरान मंत्र का पूरा उच्चारण करें।
दिग्न्यास की पूरी विधि और मंत्र
व्यापक न्यास के बाद दिग्न्यास किया जाता है। इसमें आठ दिशाओं के साथ ऊपर और नीचे की दिशा का भी न्यास होता है। हर मंत्र के बाद संबंधित दिशा की ओर चुटकी बजाएं।
पूर्व दिशा
ॐ ऐं प्राच्यै नमः॥
आग्नेय दिशा
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः॥
दक्षिण दिशा
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः॥
नैऋत्य दिशा
ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः॥
पश्चिम दिशा
ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः॥
वायव्य दिशा
ॐ क्लीं वायव्यै नमः॥
उत्तर दिशा
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः॥
ईशान दिशा
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः॥
ऊपर की दिशा
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः॥
भूमि की दिशा
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः॥
इस क्रम में दिग्न्यास पूरा होने के बाद मां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का ध्यान करें।
मां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का ध्यान
नवार्ण विधि में तीनों देवी स्वरूपों के ध्यान मंत्र भी दिए गए हैं। दिग्न्यास के बाद इनका पाठ करें।
मां महाकाली का ध्यान मंत्र
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
मां महालक्ष्मी का ध्यान मंत्र
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥
मां महासरस्वती का ध्यान मंत्र
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥
इन तीनों ध्यान मंत्रों का पाठ करते हुए मां महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूप का ध्यान करें।
नवार्ण मंत्र का जाप कैसे करें
न्यास और ध्यान पूरा करने के बाद नवार्ण मंत्र का जाप करें।
नवार्ण मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
जपमाला से एक माला यानी 108 बार मंत्र का जाप कर सकते हैं। विस्तृत अनुष्ठान में 1008 बार जाप करें। जाप के लिए माला का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पहले माला का पूजन करें।
माला पूजन मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः॥
इसके बाद माला हाथ में लेकर प्रार्थना करें।
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्ति स्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥
इसके बाद यह मंत्र बोलें।
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि।
साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा॥
अब नवार्ण मंत्र का जाप शुरू करें।
जाप पूरा होने पर क्या करें
जाप पूरा होने के बाद देवी को जप समर्पित करने की प्रार्थना करें।
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥
इसके बाद मां दुर्गा को प्रणाम करें और सप्तशती पाठ के अगले चरण में जाएं।
करन्यास और हृदयादि न्यास के बाद दुर्गा सप्तशती पाठ का क्रम
नवार्ण विधि पूरी करने के बाद सप्तशती के मुख्य पाठ के लिए यह सामान्य क्रम रखा जा सकता है।
- प्रारंभिक पूजा और संकल्प: गणेश स्मरण, मां दुर्गा का ध्यान और पाठ का संकल्प करें।
- देवी कवच: देवी से रक्षा और कल्याण की प्रार्थना वाला कवच पढ़ें।
- अर्गला स्तोत्र: मां दुर्गा से मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करें।
- कीलक स्तोत्र: कीलक स्तोत्र का पाठ करें।
- नवार्ण मंत्र और न्यास: ऊपर बताई गई नवार्ण विधि और जाप को उस पाठ-क्रम में शामिल करें जिसमें इसका विधान है।
- मुख्य सप्तशती पाठ: प्रथम अध्याय से तेरहवें अध्याय तक पाठ करें।
- समापन: क्षमा प्रार्थना, देवी स्तुति और आरती के साथ पूजा पूरी करें।
कुछ विस्तृत पाठ-पद्धतियों में रात्रि सूक्त और देवी अथर्वशीर्ष के बाद नवार्ण विधि आती है, इसलिए नवार्ण विधि को अलग मंत्र-जप की तरह करने और सम्पूर्ण सप्तशती पाठ में शामिल करने के क्रम में अंतर मिल सकता है। यहां दिए मंत्र नवार्ण विधि के उस विस्तृत रूप के हैं जिसमें करन्यास, हृदयादि न्यास, अक्षरन्यास, व्यापक न्यास और दिग्न्यास सभी शामिल हैं।
सप्तशती के तीनों चरित्रों के विनियोग मंत्र
सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती के पाठ में तीन चरित्र होते हैं। अगर चरित्रवार विनियोग किया जा रहा है, तो हर चरित्र के आरंभ में उससे संबंधित विनियोग पढ़ें।
प्रथम चरित्र — पहला अध्याय
ॐ अस्य श्रीप्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः॥
मध्यम चरित्र — दूसरा, तीसरा और चौथा अध्याय
ॐ अस्य श्रीमध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे मध्यमचरित्रजपे विनियोगः॥
उत्तर चरित्र — पांचवें से तेरहवें अध्याय तक
ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य शिव ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यतत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, श्रीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रजपे विनियोगः॥
इन चरित्र विनियोगों का इस्तेमाल चरित्र के संबंधित अध्यायों का पाठ करते समय किया जाता है। अगर एक ही बैठक में पूरा पाठ कर रहे हैं और आपकी विधि में चरित्रवार विनियोग शामिल हैं, तो तीनों को उनके संबंधित चरित्र की शुरुआत में पढ़ें।
