Dishashool Kya Hota Hai : सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में यात्रा शुरू करने से पहले शुभ मुहूर्त, नक्षत्र, तिथि और दिशा का विशेष महत्व माना गया है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण विषय दिशाशूल भी है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को किसी विशेष दिन अशुभ दिशा में यात्रा करनी पड़े, तो उसके कार्य में बाधाएं, अनावश्यक खर्च, मानसिक तनाव या विलंब जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
क्या होता है दिशाशूल
इस कारण प्राचीन काल से यात्रा से पहले दिशाशूल का विचार करने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, यह नियम सामान्य दैनिक यात्रा के लिए अनिवार्य नहीं माना जाता है, लेकिन यदि किसी महत्वपूर्ण कार्य, नौकरी, व्यवसाय, परीक्षा, विवाह या शुभ कार्य के लिए यात्रा की जा रही हो, तो दिशाशूल का ध्यान रखना लाभकारी माना गया है।
क्या होता है दिशाशूल
'दिशाशूल' दो शब्दों से मिलकर बना है— दिशा और शूल। यहां शूल का अर्थ है कष्ट या बाधा। अर्थात किसी विशेष दिन किसी विशेष दिशा में यात्रा करने से संभावित बाधाओं का संकेत देने वाली ज्योतिषीय स्थिति को दिशाशूल कहा जाता है। फलित ज्योतिष के अनुसार सप्ताह के प्रत्येक दिन एक या अधिक दिशाएं ऐसी होती हैं, जहां यात्रा करना शुभ नहीं माना जाता है, इसलिए यात्रा से पहले यह देखा जाता है कि जिस दिशा में जाना है, उस दिन वहां दिशाशूल तो नहीं है।
किस दिन कौन दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए
परंपरागत ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार दिशाशूल इस प्रकार माना जाता है।
- सोमवार और शनिवार: पूर्व दिशा
- मंगलवार और बुधवार: उत्तर दिशा
- गुरुवार: दक्षिण दिशा
- शुक्रवार और रविवार: पश्चिम दिशा
इन यात्राओं पर नहीं होता है दिशाशूल का असर
ज्योतिष शास्त्र में एक महत्वपूर्ण नियम यह भी बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर जाकर उसी दिन वापस लौट आता है, तो ऐसी यात्रा में सामान्यतः दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है। इसी प्रकार रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्यों या दैनिक आवागमन में भी अधिकांश विद्वान दिशाशूल को बाधक नहीं मानते है। इसका विशेष महत्व तब होता है, जब यात्रा किसी बड़े उद्देश्य, मांगलिक कार्य या जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय से जुड़ी हो।
जरूरी यात्रा हो तो क्या करें
कई बार परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि दिशाशूल होने के बावजूद यात्रा टालना संभव नहीं होता है। ऐसी स्थिति में शास्त्रों में कुछ सरल उपाय बताए गए हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है।
दिन के अनुसार यात्रा से पहले करें ये उपाय
रविवार – दलिया और घी का सेवन करें।
सोमवार – घर से निकलने से पहले दर्पण देखें।
मंगलवार – थोड़ा सा गुड़ खाकर यात्रा शुरू करें।
बुधवार – तिल और धनिया का सेवन करें।
गुरुवार – दही खाकर यात्रा आरंभ करें।
शुक्रवार – जौ का सेवन करें।
शनिवार – अदरक या उड़द की दाल खाकर घर से निकलें।
धार्मिक मान्यता है कि इन उपायों से दिशाशूल का प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है।
दिशाशूल का प्रभाव कब तक रहता है
ज्योतिष की कई परंपराओं में यह भी माना जाता है कि दिशाशूल का प्रभाव मुख्य रूप से दोपहर लगभग 12 बजे तक अधिक रहता है। इसके बाद इसका प्रभाव कम माना जाता है। हालांकि विभिन्न पंचांगों और परंपराओं में इस विषय पर अलग-अलग मत भी मिलते हैं। यदि यात्रा बहुत आवश्यक हो, तो कई ज्योतिषाचार्य ब्रह्म मुहूर्त या शुभ चौघड़िया में यात्रा शुरू करने की सलाह भी देते हैं।
यात्रा शुरू करने की शुभ विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यात्रा आरंभ करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना शुभ माना गया है। यात्रा करने के लिए घर से निकलते समय सबसे पहले दाहिना पैर बाहर रखें। यात्रा की दिशा में कुछ कदम पैदल चलकर वाहन में बैठें। यदि संभव हो तो तिल, घी या तांबे के पात्र का दान करें। भगवान गणेश, श्रीराम या हनुमान जी का स्मरण करके यात्रा शुरू करें। मन में शुभ संकल्प लेकर घर से निकलें।
लंबी यात्रा पर जाने से पहले क्या करें
यदि चारधाम, तीर्थयात्रा या किसी लंबी धार्मिक यात्रा पर जा रहे हों, तो यात्रा से पहले भगवान हनुमान या काल भैरव के मंदिर में दर्शन करना शुभ माना जाता है। कई लोग यात्रा के दौरान प्रतिदिन हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप भी करते हैं, जिससे मन में आत्मविश्वास बना रहता है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
