पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की भाषा समझते थे वृंदावन के ये संत, मन में राम और सामने बांके बिहारी थे विराजमान

Mystic Saint Devaraha Baba: वृंदावन की पावन धरती पर यमुना के किनारे एक ऐसे संत हुए, जिनके मन में राम और सामने स्वयं बांके बिहारी थे। आइए जानते हैं परम पूज्य संत देवराहा बाबा केल कुछ अनसुने किस्से।

Mystic Saint Devaraha Baba: वृंदावन का नाम आते ही सबसे पहले बांके बिहारी मंदिर, राधा-कृष्ण की लीलाएं और यमुना का किनारा सामने आता है, लेकिन यमुना के दूसरे किनारे एक ऐसी जगह भी है, जिसका नाम आते ही एक रहस्यमयी संत की तस्वीर सामने आती है। यह जगह है देवराहा बाबा का आश्रम। देवराहा बाबा को संतों की परंपरा में एक ऐसे योगी के रूप में याद किया जाता है, जिनका जीवन साधना, योग और रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ी कथाओं से भरा रहा। बाबा अक्सर ऊंची लकड़ी की मचान पर विराजमान रहते थे। देश के बड़े नेता, राजनेता और आम लोग तक उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए पहुंचते थे।

कौन थे देवराहा बाबा

कौन थे देवराहा बाबा

शुद्ध बोध थे बाबा

देवराहा बाबा कहते थे कि ‘न मैं स्त्री हूं, न मैं पुरुष हूं, न मैं देवता हूं, न मैं यक्ष हूं और न ही दानव हूं। मैं शुद्ध बोध हूं।’ बाबा अपने स्वरूप को किसी सामान्य सांसारिक पहचान से नहीं जोड़ते थे। उनकी वाणी में आत्मबोध और परमात्मा की अनुभूति को प्रमुख स्थान मिलता था। ‘ॐ देवराहाय दिगंबराय मंचासीनाय नमो नमः।’ मचान पर बैठने के कारण बाबा की पहचान भी देशभर में अलग तरीके से बनी। भक्तों के लिए उनकी मचान ही उनके दर्शन का प्रमुख स्थान बन गई थी।

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