Chitragupta Puja Katha in Hindi 2025: चित्रगुप्त पूजा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। 2025 में यह पूजा 23 अक्टूबर को भाई दूज के साथ मनाई जा रही है। भगवान चित्रगुप्त यमराज के सहायक और सभी जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले देवता हैं। इस दिन उनकी पूजा की जाती है। खासकर कायस्थ समुदाय के लिए यह पूजा कुलदेवता की उपासना मानी जाती है। इस पूजा में कथा सुनने या पढ़ने के बिना पूजन पूरा नहीं होता है। इस कथा को पढ़ने या सुनने से कारोबार और व्यापार में तरक्की मिलती है। नौकरी में लाभ होता है। इसके साथ ही विद्यार्थियों को सक्सेस मिलती है। घर में धन और संपदा आती है। व्यक्ति को आगे नरक की यातनाएं नहीं भोगनी पड़ती हैं।
चित्रगुप्त पूजा की कथा
क्या है चित्रगुप्त की उत्पत्ति की कथा
प्राचीन काल में, जब सृष्टि की रचना हो रही थी, तब सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु की प्रेरणा से संसार को बसाया। उन्होंने चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—को उत्पन्न किया, फिर देव, गंधर्व, दानव, सर्प, नदियां, पर्वत और वृक्ष आदि की रचना की। इसके बाद उन्होंने मनु और दक्ष प्रजापति को बनाया, जिनसे सृष्टि का विस्तार हुआ। दक्ष प्रजापति की कन्याओं के माध्यम से देव, दानव और अन्य प्रजातियां उत्पन्न हुईं। ब्रह्माजी ने यमराज को सभी लोकों का स्वामी बनाया और उन्हें जीवों के कर्मों के आधार पर न्याय करने का आदेश दिया। यमराज को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे प्रत्येक जीव को उनके अच्छे-बुरे कर्मों का फल दें, ताकि सृष्टि में धर्म और न्याय का संतुलन बना रहे।
लेकिन यमराज ने ब्रह्माजी के सामने एक समस्या रखी।
उन्होंने कहा, 'हे प्रभु, सृष्टि में जीवों की संख्या अनंत है, और उनके कर्म भी अनगिनत हैं। प्रत्येक कर्म का हिसाब रखना, उसे भेदों के साथ समझना और न्यायपूर्वक फल देना मेरे लिए अकेले असंभव है। कर्म स्वयं किए गए हों या किसी के कहने पर, मुख्य हों या गौण, उनके भोग और शेष की गणना बहुत जटिल है। मुझे ऐसा सहायक चाहिए जो बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ, तेज लेखक और वेद-शास्त्रों का जानकार हो।' यमराज की इस प्रार्थना को सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने मन में गहरे ध्यान में प्रवेश किया।
ब्रह्माजी ने एक हजार वर्ष तक तपस्या की, और उनकी समाधि से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसका रंग श्याम था, आंखें कमल की तरह सुंदर, गर्दन शंख जैसी, और चेहरा चंद्रमा की तरह दमकता था। उसके हाथ में कलम, दवात और एक पुस्तक थी, जो कर्मों के लेखन का प्रतीक थी। ब्रह्माजी ने उससे पूछा, 'तू कौन है और कहां से आया?' उस पुरुष ने उत्तर दिया, 'हे प्रभु, मैं आपके शरीर से प्रकट हुआ हूं। मुझे न माता-पिता का ज्ञान है, न ही मेरा कोई नाम। कृपया मेरा नामकरण करें और मेरे कर्तव्य बताएं।' ब्रह्माजी ने हंसते हुए कहा, 'तू मेरे काया से उत्पन्न हुआ है, इसलिए तेरा नाम कायस्थ होगा। चूंकि तू सभी जीवों के दृश्य और अदृश्य कर्मों का हिसाब रखेगा, तेरा नाम चित्रगुप्त होगा। तू यमराज का सहायक बनेगा और उनके साथ मिलकर जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा संभालेगा।' इसके बाद ब्रह्माजी ने चित्रगुप्त को यमराज के साथ उनके कार्य में नियुक्त किया और स्वयं अंतर्धान हो गए।
चित्रगुप्त ने की थी ज्वालादेवी की उपासना
चित्रगुप्त ने यमराज के साथ अपने कर्तव्यों की शुरुआत की, लेकिन वह स्वयं को और अधिक शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ बनाने के लिए तप करने का संकल्प लिया। वे कोटि नगर पहुंचे और वहां ज्वालामुखी देवी की उपासना में लीन हो गए। उन्होंने उपवास रखा और पूरे चित्त से माता चंडिका की भक्ति की। चित्रगुप्त ने देवी की स्तुति में कहा, 'हे जगदंबे, तुम संसार को धारण करने वाली, स्वर्ग-पाताल को प्रकाशित करने वाली, सत-रज-तम के रूप में विद्यमान, सभी देवताओं को शक्ति देने वाली हो।
तुम तीन नेत्रों वाली, दैत्यों का नाश करने वाली और भक्तों को वर देने वाली हो। मैं तुम्हारी शरण में हूं, मुझे अपने कर्तव्यों को निभाने की शक्ति दो।' उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर माता ज्वालामुखी ने चित्रगुप्त को वरदान दिया। उन्होंने कहा, 'हे चित्रगुप्त, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूं। तुम परोपकारी, धर्म में स्थिर और असंख्य वर्षों तक आयु वाले रहोगे। तुम्हारा कार्य सृष्टि के लिए कल्याणकारी होगा।' यह वरदान पाकर चित्रगुप्त यमराज के साथ अपने कर्तव्यों में पूरी निष्ठा से जुट गए।
कैसे बना कायस्थ वंश?
ब्रह्माजी ने चित्रगुप्त का विवाह दो कन्याओं इरावती और दक्षिणा से कराया। इरावती से उन्हें आठ पुत्र प्राप्त हुए: चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु, अरुण और अतीन्द्रिय। दक्षिणा से चार पुत्र हुए: भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यवान। ये बारह पुत्र कायस्थ वंश के संस्थापक बने। चारु मथुरा में बसे, इसलिए मथुरा कायस्थ कहलाए। सुचारु गौड़-बंगाल गए, इसलिए गौड़ कायस्थ हुए। भानु श्रीवास्तव नगर में बसे, इसलिए श्रीवास्तव कहलाए। इसी तरह अन्य पुत्रों जैसे भट्टनागर, अम्बष्ट और सूर्यध्वज ने अलग-अलग क्षेत्रों में कायस्थ वंश का विस्तार किया ।
राजा सौदास की कथा
एक अन्य कथा में एक राजा सौदास का उल्लेख है, जो सौराष्ट्र नगर का शासक था। वह महापापी था, जो पराया धन चुराता, दूसरों की स्त्रियों पर बुरी नजर रखता और अभिमानी था। एक दिन वह जंगल में शिकार खेलने गया, जहां उसने एक ब्राह्मण को कार्तिक शुक्ल द्वितीया को चित्रगुप्त और यमराज की पूजा करते देखा। ब्राह्मण ने उसे यम द्वितीया व्रत की महिमा बताई। प्रभावित होकर सौदास ने उसी दिन धूप, दीप और भक्ति के साथ चित्रगुप्त और यमराज की पूजा की।
इसके बाद में वह इस व्रत को भूल गया, लेकिन याद आने पर उसने फिर से पूजा की। मृत्यु के बाद यमदूतों ने उसे यमराज के सामने पेश किया। यमराज ने चित्रगुप्त से उसके कर्मों का हिसाब मांगा। चित्रगुप्त ने बताया कि सौदास ने भले ही बहुत पाप किए, लेकिन उसने यम द्वितीया को एक बार भक्ति से उनकी पूजा की थी। इस एक पुण्य कर्म के कारण उसे नरक की यातना से मुक्ति मिली और स्वर्ग की प्राप्ति हुई। यह कथा बताती है कि चित्रगुप्त पूजा का एक दिन भी जीवन को बदल सकता है।
