Chaitra Navratri 2025 Day 1 Maa Shailputri Aarti, Katha (मां शैलपुत्री की आरती और कथा): चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा और अर्चना की जाती है। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। मां शैलपुत्री के स्वरूप की बात करें तो माता दाहिने हाथ में त्रिशूल लिए रहती हैं और बाएं हाथ में कमल का फूल। इनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है तो इनकी सवारी नंदी की है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता शैलपुत्री की पूजा से सुख, समृद्धि और यश की प्राप्ति होती है। चलिए आपको बताते हैं मां शैलपुत्री की आरती और कथा।
Chaitra Navratri 2025 Day 1 Maa Shailputri Aarti, Katha
Mata Shailputri Ki Aarti Lyrics (माता शैलपुत्री की आरती)
शैलपुत्री माँ बैल असवार। करें देवता जय जय कार॥
शिव-शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने न जानी॥
पार्वती तू उमा कहलावें। जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें॥
रिद्धि सिद्धि परवान करें तू। दया करें धनवान करें तू॥
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती जिसने तेरी उतारी॥
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो॥
घी का सुन्दर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के॥
श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें। प्रेम सहित फिर शीश झुकायें॥
जय गिरराज किशोरी अम्बे। शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे॥
मनोकामना पूर्ण कर दो। चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो॥
Maa Shailputri Katha (मां शैलपुत्री की कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में प्रजापति दक्ष ने यज्ञ करवाने का फैसला किया था। इसके लिए उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेज था, लेकिन भगवान शिव को नहीं। देवी सती जानती थी कि उनके पिता दक्ष उनके पास निमंत्रण भेजेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उस यज्ञ में जाने के लिए बेचैन थीं, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यज्ञ में जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण नहीं आया है और इस नाते वहां जाना उचित नहीं है। देवी सती नहीं मानीं और बार-बार यज्ञ में जाने का आग्रह करती रहीं। देवी सती के ना मानने की वजह से भगवान शंकर को उनकी बात माननी पड़ी और उन्होंने उन्हें अनुमति दे दी। देवी सती जब अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहां पहुंची तो देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुंह फेरे हुए हैं और सिर्फ उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। उनकी बाकी बहनें उनका उपहास उड़ा रहीं थीं और देव सती के पति भगवान शिव को भी तिरस्कृत कर रहीं थीं। स्वयं प्रजापति दक्ष ने भी अपमान करने का मौका नहीं छोड़ा। ऐसा व्यवहार देख देवी सती अत्यंत ही दुखी हुईं। अपना और अपने पति का अपमान उनसे सहन न हुआ और फिर उन्होंने यज्ञ की अग्नि में खुद को स्वाहा कर अपने प्राण त्याग दिए। भगवान शिव को जैसे ही इसके बारे ज्ञात हुआ तो उन्होंने अपनी पीड़ा और क्रोध की ज्वाला से प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विनाश कर दिया। युगों के बाद देवी सती ने फिर पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लिया जिससे इनका नाम शैलपुत्री पड़ गया।
