Basant Panchami 2023: धरती की धानी चुनरिया जब बसंती रंग से श्रंगारित हो उठती है वो दिन होता है बसंत पचंमी का। ऋतुराज बसंत के आगमन पर प्रकृति विविध रंगों से सजती है। यही विविध रंग ब्रज की कुंज गलियों में इस पर्व के साथ बिखरने शुरू हो जाते हैं। श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा- वृंदावन, जहां की मिट्टी से लेकर हवा तक में वास है केशव तत्व का। यहां स्थित बांके बिहारी मंदिर में स्नेह बिहारी जी मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा बल्लभ मंदिर आदि में बसंत पंचमी के दिन से आरंभ हो जाएगा फाग उत्सव। आइये आपको बताते हैं बिहारी जी मंदिर में क्या रहेगा बसंत पंचमी पर खास, जिसके लिए हजारों भक्त करते हैं हर वर्ष इंतजार।
बांके बिहारी मंदिर में बसंत
अबीर−गुलाल बिखरेगा मंदिर प्रांगण में
यूं तो बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन में प्रतिदिन ही हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं लेकिन अपने बांके के साथ फाग की शुरूआत करने का आनंद ही कुछ और है। बसंत पंचमी के दिन ठाकुर जी के समक्ष गुलाल, फूल और अबीर के पांच थाल रखे जाते हैं। प्रभु की उर्जाओं से उर्जित होकर उन थालों के गुलाल को भक्तों पर डाला जाता है। गुलाल का फेंटा बिहारी जी की कमर पर इस दिन बांधा जाता है। इस परंपरा के साथ ही ब्रज में 40 दिवसीय रंगोत्सव का आगाज हो जाता है।
चांदी के थालों में सजते हैं ये रंग
बसंत पंचमी पर ठाकुर बांके बिहारी जी को बसंती पोशाक धाराण करवायी जाती है। बिहारी जी के चरणाें में चांदी के थालों में लाल, गुलाबी, हरा, बसंती और पीले रंग का गुलाल अर्पित किया जाता है। इसके बाद ठाकुर जी भक्तों के साथ प्रतीकात्मक होली खेलते हैं। इस मौके पर समाज गायन पर भक्त नृत्य भी करते हैं।
स्वामी हरिदास जी ने की थी परंपरा की शुरूआत
बिहारी जी मंदिर में रंगोत्सव की परंपरा सदियों पुरानी है। बताया जाता है कि बिहारी जी का प्राकाट्य जिनकी भक्ति से हुआ था वो स्वामी हरिदास जी थे। उन्होंने ही रंगोत्सव का आरंभ करवाया था। संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी ने बिहारी जी के कपोलों पर गुलाल लगाकर इस परंपरा की शुरूआत की थी। उस समय माघ शुक्ल पंचमी से चैत्र कृष्ण द्वितीया तक फाग खेलना संत और भक्त ने शुरू किया था। इस उत्सव को ब्रज में मदनोत्सव भी कहा जाता है।
(डिस्क्लेमर : यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
