Akshaya Tritiya Vrat Katha In Hindi (अक्षय तृतीया की कथा): अक्षय तृतीया के दिन दान पुण्य के कार्य करने और खरीदारी का अपना विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है इससे जीवन में धन-दौलत की कभी कमी नहीं होती। इतना ही नहीं इस दिन व्रत रखना भी अत्यंत शुभ फलदायी होता है। पंडित सुजीत जी महाराज अनुसार ये व्रत जन्म जन्मातंर के पापों से मुक्ति दिलाता है और जीवन में सुख-सुविधाएं बढ़ाता है। अगर आप भी अक्षय तृतीया का व्रत रख रहे हैं तो जरूर पढ़ें ये पौराणिक कथा।
Akshaya Tritiya Story
अक्षय तृतीया व्रत कथा (Akshaya Tritiya Vrat Katha)
अक्षय तृतीया की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में धर्मदास नामक वैश्य था। जो अपने परिवार के साथ गरीबी में जीवन जी रहा था। उसे हमेशा अपने परिवार के भरण-पोषण की चिंता लगी रहती थी क्योंकि उसके परिवार में कई सदस्य थे जिनकी जिम्मेदारी उसी पर थी। धर्मदास बेहद ही धार्मिक पृव्रत्ति का था सभी देव और ब्राह्मणों के प्रति उसकी श्रद्धा की वजह से उसे हर कोई पसंद करता था।
एक दिन मार्ग में उसने कुछ ऋषियों को अक्षय तृतीया के महत्त्व का वर्णन करते हुये सुना। ऋषि कह रहे थे कि अक्षय तृतीया महान अगणित फल प्रदान करने वाली होती है। इस दिन ही नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अवतार प्रकट हुये थे। ऐसे में इस शुभ दिन पर किये जाने वाले दान, हवन, पूजन आदि कर्मों का अक्षय फल प्राप्त होता है यानी ऐसा फल जिसकी समाप्ति कभी नहीं होती। साथ भी ऋषियों ने ये भी कहा कि इस दिन देवताओं और पितरों के निमित्त जो भी दान, हवन, पूजन, तर्पण किया जाता है उसे बेहद पुण्य मिलता है।
इस प्रकार अक्षय तृतीया व्रत के महात्म्य को सुनने के बाद उसने अक्षय तृतीया का व्रत रखने का निश्चय किया। अक्षय तृतीया पर्व के आने पर उसने सुबह जल्दी उठकर गंगा में स्नान किया और विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की। पूरी श्रद्धा से व्रत और अपने सामर्थ्यानुसार जल से भरे घड़े, पंखे, नमक, गेंहू, गुड़, घी, दही, जौ, सत्तू, चावल, सोना और वस्त्र आदि वस्तुएं भगवान को अर्पित करके ब्राह्मणों को दान में दी।
इतना सब दान देना देख धर्मदास के परिवार वाले और उसकी पत्नी ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। परिवार वाले कहने लगे कि अगर धर्मदास इतना सब कुछ दान में दे देगा, तो सभी का पालन-पोषण कैसे होगा। फिर भी धर्मदास नहीं माना और उसने अपने दान और पुण्य कर्म को श्रद्धा से किया। इतना ही नहीं उसने इस शुभ दिन पर ब्राह्मणों को कई प्रकार का दान भी दिया। इस तरह उसके जीवन में जब भी अक्षय तृतीया का पर्व आया उसने प्रत्येक बार पूरी विधि से पूजा और दान आदि कर्म किये।
वृद्ध होने के साथ-साथ अनेक रोगों से ग्रस्त होने के बाद भी उसने अक्षय तृतीया का उपवास किया। साथ में धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। कहते हैं अक्षय तृतीया पर किए गए पुण्य कर्म के कारण ही यही वैश्य दूसरे अगले जन्म में कुशावती का राजा बना।
मान्यताओं अनुसार अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान-पुण्य व पूजन का फल अगने जन्म में भी मिलता है इसलिए ही धर्मदास को नया जन्म एक धनी राजा के रूप में मिला। ये इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव भी उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके शामिल हुए थे।
वह प्रतापी राजा वैभवशाली होने के बावजूद भी हमेशा धर्म मार्ग पर चलता रहा। उसे अपनी श्रद्धा और भक्ति पर कभी घमंड नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे आने वाले जन्मों में भारत के प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
