ऋषि मुनियों का नाम लेते ही आंखों के सामने एक ऐसी छवि बनती है, जिसमें कोई साधु जंगल में बैठा है। शरीर पर साधारण वस्त्र हैं। सामने धूनी जल रही है। मन ध्यान में है। हालांकि हिंदू सनातनी दर्शन में ऋषि होना सिर्फ घर छोड़ देना नहीं है। यह भीतर की कई गांठें खोलने की साधना है। हमारे वेद पुराण बताते हैं कि ऋषि वह नहीं जो सबसे दूर हो गया। सही मायने में ऋषि-मुनि वो संत होते हैं जिन्होंने अपने भीतर के लोभ, मोह, अहंकार और इच्छाओं पर विजय पा ली हो।
हर ऋषि को करना पड़ता है ये 5 त्याग
हिंदू धर्म में त्याग को साधना का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना गया। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण भी कर्म छोड़ देने और त्याग के बीच फर्क बताते हैं। गीता के अनुसार सिर्फ कर्मों का त्याग संन्यास नहीं है। कर्मों के फल की आसक्ति छोड़ना भी त्याग का महत्वपूर्ण रूप है। तो आखिर वह कौन-से त्याग हैं, जो साधक को ऋषि-मुनि की राह पर ले जाते हैं?
इस सवाल के जवाब में मशहूर माइथोलॉजिकल साई फाई राइटर अक्षत गुप्ता कहते हैं कि असली मायने में 5 तरह के त्याग करने के बाद भी कोई व्यक्ति ऋषि मुनि बन पाता है। आइए जानते हैं कौन से हैं वो 5 त्याग:
घर और सांसारिक मोह का त्याग
सबसे पहला त्याग घर और सांसारिक मोह का माना जाता है। घर छोड़ना उन रिश्तों और वस्तुओं से पैदा होने वाली आसक्ति को कम करना, जिन्हें मन अपना अंतिम सहारा मान लेता है। अनेक ऋषियों और संन्यासियों ने इसी रास्ते को चुना। उन्होंने सुविधाओं से दूरी बनाई ताकि उनका मन साधना और आत्मज्ञान पर केंद्रित हो सके।
यहां एक जरूरी फर्क है। घर छोड़ना आसान हो सकता है, मोह छोड़ना कठिन। कोई व्यक्ति जंगल में जाकर भी अपने पुराने जीवन के बारे में सोचता रह सकता है। वहीं गृहस्थ जीवन में रहकर भी कोई व्यक्ति आसक्ति से काफी हद तक मुक्त हो सकता है। यही त्याग का असली अर्थ है।
वस्त्र का का त्याग
दूसरा बड़ा त्याग है वस्त्रों का। ऋषि बनने के लिए ये समझना होता है कि हमें इश्वर ने जैसा बनाकार भेजा उसी स्वरूप में रहें। अपने शरीर पर किसी तरह का पर्दा क्यों करना। इसीलिए संन्यासी वस्त्रों का त्याग भी करने लगते हैं।
भोजन का त्याग
तीसरा बड़ा त्याग है भोग-विलास से दूरी। ऋषि परंपरा में भोजन को जरूरत तक सीमित रखने की बात मिलती है। इसका उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं था। उद्देश्य था कि इंद्रियां मन की मालिक न बन जाएं। योग दर्शन में भी इंद्रियों को नियंत्रित करने की साधना को महत्वपूर्ण माना गया है। जब मन हर समय स्वाद के पीछे भागता है, तब ध्यान और आत्मचिंतन कठिन हो जाता है। इसलिए साधक अपने जीवन को धीरे-धीरे सरल बनाता है।
सांसों का त्याग
चौथा त्याग है सांस रोक लेना। कई बार ऋषि मुनि साधना से खुदपर इतना नियंत्रण कर लेते हैं कि वो काफी समय तक अपनी सांस भी रोके रख सकते हैं। वो अपनी मर्जी से सांस लेते हैं और रोकते हैं। यह बेहद कठिन साधना होती है।
शरीर का त्याग
पांचवे त्याग को सबसे बड़ा माना गया है। इसमें शरीर का त्याग किया जाता है। किसी भी संन्यासी की आत्मा जब आध्यात्म के पांचवे चरण में पहुंचती है तो वो शरीर का त्याग कर देती है। शरीर छोड़ वो अनंत का हिस्सा बन जाती है।
अक्षत गुप्ता के मुताबिक इन 5 त्यागों को करने के बाद ही कोई पूरी तरह से ऋषि या मुनि बन पाता है। पांचवा त्याग सबसे कठिन माना जाता है। तभी तो बहुत कम संत महात्मा ऐसे हैं जो जीते जी समाधि ले लेते हैं। समाधि लेना ही शरीर का त्याग करना है।
(डिस्क्लेमर: यह लेख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध लेखक अक्षत गुप्ता के वीडियो में बताए गए विचार के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी संबंधित क्रिएटर के व्यक्तिगत विचार हैं। टाइम्स नाउ नवभारत इन विचारों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है।)
