Aaj Kaun Sa Roza Hai: रमजान बरकत और इबादत का पाक महीना है। इसी महीने में क़ुरआन का नुज़ूल हुआ। रोज़ा इंसान को तक़वा (ईश्वर-चेतना) सिखाता है, यानी हर काम में अल्लाह की मौजूदगी का एहसास। दिनभर भूख और प्यास सहने से सब्र, आत्मसंयम और अनुशासन आता है, साथ ही गरीबों और जरूरतमंदों के दर्द को समझने की भावना पैदा होती है। तो आज कौन सा रोजा है और ये कबतक रहने वाला है आप यहां से जान सकते हैं। रोजा कब से कबतक रखा जाता है, इसके बारे में भी आप यहां से जान सकते हैं।
आज कौन सा रोजा है?
इस साल रमज़ान 1447 AH का पहला रोज़ा 19 फरवरी 2026 (बुधवार) से रखा जा रहा है। आज 19 फरवरी 2026, पहला रोज़ा है।
रोजा कब से कबतक रखा जाता है?
रोजा सेहरी से इफ्तार तक रखा जाता है। फज्र की नमाज़ से पहले तक खाया-पिया जा सकता है, जिसे सेहरी कहते हैं। फज्र (सुबह की अज़ान) के साथ रोजा शुरू हो जाता है। फिर सूरज ढलते ही (मगरिब की अज़ान पर) रोज़ा खोला जाता है।
पहले रोजे का सहरी-इफ्तार समय 2026-
- सहरी खत्म: सुबह 5:20 बजे
- इफ्तार: शाम 6:15 बजे
आज रोजा कब तक रहेगा?
आज का रोज़ा सुबह फज्र (सुबह अज़ान के बाद) से लेकर शाम के सूर्यास्त तक रखा जाएगा। अगर आप शिया फिक़ह के हिसाब से समय देखें तो इफ्तार कुछ मिनट बाद हो सकता है, लेकिन आम तौर पर रोज़ा सूर्यास्त के समय के साथ ही खोला जाता है।
रमजान में क्या करें-
- पांच वक्त की नमाज- रोजे के साथ नमाज पढ़ना जरूरी है। यह आपको अनुशासन और मानसिक शांति देता है।
- कुरान पढ़ना- इस महीने में कुरान पढ़ना और उसके अर्थ को समझना बहुत पुण्य का काम माना जाता है।
- जकात और सदका- रमजान हमें दूसरों का दर्द समझना सिखाता है। इसलिए गरीबों की मदद करना और उन्हें खाना खिलाना इस महीने का अहम हिस्सा है।
- सब्र और तहजीब- रोजे का असली मकसद गुस्से पर काबू पाना और हर हाल में शुक्रगुजार रहना है।
रोजा रखने के नियम क्या हैं?
रोज़ा इस्लाम में एक अहम इबादत है जो पवित्र महीने रमज़ान में रखा जाता है। रोज़ा रखने के लिए दिल में सच्ची नीयत होना जरूरी है। फज्र की अज़ान से लेकर मगरिब यानी सूर्यास्त तक खाने-पीने, धूम्रपान और पति-पत्नी संबंध से परहेज किया जाता है। दिन भर केवल भूखा-प्यासा रहना ही मकसद नहीं, बल्कि झूठ, गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़े और बुरे कामों से भी बचना जरूरी है। गलती से कुछ खा-पी लेने से रोजा नहीं टूटता, लेकिन जानबूझकर खाने-पीने या रोजा तोड़ने से रोज़ा खत्म हो जाता है और उसकी क़ज़ा रखना जरूरी होती है। बीमार, मुसाफिर, गर्भवती, स्तनपान कराने वाली महिलाएं और बहुत बुज़ुर्ग लोगों को शरीअत में छूट दी गई है। रोज़ा सब्र, तक़वा और आत्मसंयम सिखाता है और इंसान को अल्लाह के करीब लाता है।
