सैन्य दृष्टि से अफगान और रोहिलों की भारी घुड़सवार सेना व तोपखानों का बोलबाला रहा, जिसका नेतृत्व अहमद दुर्रानी और नजीब-उद-दौला कर रहा था, इस युद्ध में मराठों की फ्रांसीसी आपूर्ति वाली तोपखाने व घुड़सवार सेना को हार का सामना करना पड़ा। 18वीं सदी में हुए युद्धों में इसे सबसे बड़ा युद्ध माना जाता है जिसमें दो सेनाओं के बीच युद्ध में एक ही दिन में सबसे बड़ी संख्या में मौतें हुई थी।
इसके बाद पेशवा बाजीराव ने गुजरात और मालवा पर नियंत्रण कायम कर लिया था। आखिरकार वर्ष 1737 में बाजीराव ने दिल्ली के बाहरी इलाके में मुगलों को हरा दिया और मराठा नियंत्रण के तहत दक्षिण के पूर्व मुगल प्रदेशों का अधिकांश भाग अपने कब्जे में कर लिया।
मराठों के साथ-साथ अफगानों ने भी अवध के नवाब शुजा-उद-दौला को अपने शिविर में शामिल करने की कोशिश की। लेकिन शुजा-उद-दौला ने अफगान-रोहिल्ला गठबंधन में शामिल होने का फैसला लिया। मराठाओं के लिए यह रणनीतिक रूप से एक बड़ा नुकसान था।
आखिरकार अगस्त, 1760 में मराठा शिविर दिल्ली पहुंचा और उसने शहर पर धावा बोल दिया। इसके बाद यमुना नदी के किनारे एक मुठभेड़ और कुंजपुरा में एक युद्ध हुआ, जिसमें मराठों ने लगभग 15,000 की अफगान सेना को हराकर युद्ध जीत लिया। इसके बाद पानीपत शहर में मराठों के खिलाफ अब्दाली के नेतृत्व में दो महीने की लंबी घेराबंदी हुई, जिसके फलस्वरूप मराठा शिविर में लंबे समय बाद भोजन समाप्त हो गया और लोग मारे जाने लगे।
मराठा प्रमुखों ने अपने सेनानायक सदाशिव राव भाउ (Sadashiv Rao Bhau) से आग्रह किया कि उन्हें भूख से मरने के बजाय युद्ध में मरने की इजाजत दी जाए। आखिरकार अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व वाली सेना को जीत मिली।