मोहब्बत जब इतिहास के पन्नों पर अपनी सबसे खूबसूरत इबारत लिखती है, तो उसका नाम मुमताज और शाहजहां बन जाता है। ये इतिहास गवाह है कि हिंदुस्तान के तख्त पर बैठे मुगल बादशाह शाहजहां की दुनिया में दौलत, ताकत और शानो-शौकत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसके दिल का सबसे अनमोल खजाना मुमताज थी। वह उसकी हमराज थी, उसकी सलाहकार थी और उसके जीवन का सबसे अहम हिस्सा भी।
17 जून 1631 को मुमताज महल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था (AI Image)
कहा जाता है कि मुमताज के बिना शाहजहां का एक दिन भी अधूरा सा लगता था। दोनों के बीच का प्रेम सत्ता और वैभव से कहीं ऊपर था। लेकिन नियति ने शायद इस प्रेम की मियाद बहुत कम लिखी थी। 17 जून 1631 को शाहजहां के चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय मुमताज ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
उस रात महज मुमताज का इंतकाल ही नहीं हुआ, शाहजहां भी हमेशा के लिए टूट गया था। मुमताज की मौत के बाद शाहजहां कई दिनों तक लोगों के सामने नहीं आया। उसकी आंखों की चमक बुझ गई और उसके बाल समय से पहले सफेद हो गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस तारीख को मुमताज का इंतकाल हुआ वो दिन कैसा था। आइए जानते हैं कहानी उस रात की जब शाहजहां की गोद में मुमताज महल ने तोड़ा था दम।
गर्भवती मुमताज ने तय किया 800 किमी का सफर
साल 1631 का जून महीना। मुगल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली बादशाह शाहजहां दक्कन में खानजहां लोदी के विद्रोह को कुचलने के लिए बुरहानपुर में डेरा डाले हुए थे। इतिहासकारों के अनुसार शाहजहां और मुमताज की मोहब्बत का आलम ये था कि दोनों एक दूसरे को अपने से दूर नहीं देख सकते थे। यही वजह थी कि गर्भावस्था के अंतिम दिनों में भी मुमताज आगरा से करीब 800 किलोमीटर दूर बुरहानपुर में शाहजहां के पास थीं। आगरा से धौलपुर, ग्वालियर, सिरोंज और हंदिया होते हुए तय किया गया यह सफर गर्भवती मुमताज को भारी पड़ा। असर गर्भ पर भी पड़ने लगा था।
इतिहासकार अफसार अहमद ने अपनी किताब ताजमहल में लिखा है कि 16 जून 1631 की रात मुमताज को लेबर पेन शुरू हुआ। दर्द धीरे-धीरे असहनीय होता गया। मंगलवार की सुबह से लेकर बुधवार की आधी रात तक वह लगातार पीड़ा से जूझती रहीं। शाही हकीम वजीर खान और खास दाई सति-उन-निसा मुमताज महल के साथ थे। हर कोई उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश कर रहा था।
करीब 30 घंटे के लंबे संघर्ष के बाद आधी रात को मुमताज ने अपनी चौदहवीं संतान, बेटी गौहर आरा, को जन्म दिया। लेकिन प्रसव के बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। अत्यधिक रक्तस्राव को रोकना उस दौर की चिकित्सा के लिए लगभग असंभव साबित हुआ। उनका शरीर कांपने लगा और जीवन धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ने लगा।
शाहजहां की गोद में ही निकले मुमताज के प्राण
जब शाहजहां को अपनी मुमताज की इस हालत का पता चला तो वह हरम की ओर दौड़ा। कमरे में पहुंचकर उसने अपनी प्रिय बेगम को हकीमों से घिरा पाया। मुमताज मौत के बेहद करीब थीं। कहते हैं कि बादशाह की आवाज सुनकर उन्होंने आखिरी बार अपनी आंखें खोलीं। आंखों से आंसू और मुंह से कुछ शब्द निकल रहे थे। शाहजहां उनके सिरहाने बैठ गया। दाइयों ने मुमताज का सिर शाहजहां की गोद में रख दया। उखड़ती सांसों से मुमताज ने शाहजहां से दो वादे लिये और उसी गोद में दम तोड़ दिया।
शाहजहां ने पूरे किये दोनों वादे
मुमताज की मौत के ग़म में पूरे साम्राज्य में शोक का ऐलान हुआ। पूरे मुगल साम्राज्य में दो साल तक मुमताज की मौत का ग़म मनाया गया। इन सबके बीच ये जानता भी जरूरी है कि आखिर मुमताज ने मौत से ठीक पहले शाहजहां से दो वादे कौन से लिये थे।
कई इतिहासकार लिखते हैं कि मुमताज ने शाहजहां से कहा कि वो दारा शिकोह का खास ख्याल रखें और उनकी याद में कुछ ऐसा करें जिन्हें सदियां याद करें। दारा शिकोह के मोह में शाहजहां ने क्या क्या झेले ये किसी से छिपा नहीं है। वहीं दूसरे वादे को पूरा करते हुए शाहजहां ने आगरा में यमुना के किनारे ताजमहल नाम का ऐसा मास्टरपीस बनवाया जिसे दुनिया आज भी मोहब्बत की सबसे बड़ी निशानी मानती है।
