सावन के सेलिब्रेशन में सजते हैं सूनेपन के सुर, सदियों से सावन का संगीत क्यों है कजरी?

अपने साजन की राह तकती औरतें सावन को कोसती रहतीं। चारों तरफ हरियाली होती, लेकिन उनके मन का सूखापन खत्म ही नहीं होता। यहीं से कजरी के सबसे बड़े भाव विरह ने जन्म लिया।

सावन दस्तक दे चुका है। ये मौसम अपने साथ ना जाने कितने ही रंग लेकर आता है। बारिश में भीगे ये सारे रंग हर इंसानी एहसास का मजमून होती हैं। सावन में आप अगर पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार जाएंगे तो एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। यहां के गांवों में सावन की आमद के साथ ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते हैं। नई औरतें और लड़कियां इकट्ठा होती हैं। झूला झूलती हैं। नाच गाना होता है। सावन की भीगी फुहारों का जश्न मनाया जाता है।

Sawan and Kajri folk

क्या है सावन और कजरी का संबंध?

हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि सावन के इस जश्न में महिलाएं जो गीत गाती हैं वो दर्द और इंतजार की स्याही से लिखे होते हैं। इनमें सावन की खुशी कम और किसी अपने के बिछड़ने का दर्द ज्यादा होता है। इन गीतों को कजरी कहा जाता है। यहां ये सवाल उठना लाजमी है कि आखिर सावन के सेलिब्रेशन में क्यों सजते हैं सूनेपन के सुर? इस सवाल का जवाब जानने से पहले जानिए कि कजरी आखिर हैं क्या।

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