"कितना आसान था तेरे हिज्र में मरना जाना,
उर्दू शायरी की दुनिया के सबसे 'तबाह' शायर
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते"
अगर सोशल मीडिया पर उर्दू शायरी की दुनिया का कोई एक नाम सबसे ज्यादा शेयर किया जाता है, तो वह जौन एलिया हैं। आज उनकी शायरी सिर्फ मुशायरों या किताबों तक सीमित नहीं रही है। इंस्टाग्राम स्टोरी, व्हाट्सऐप स्टेटस, कैफे की दीवारों और युवाओं की प्लेलिस्ट तक, हर जगह जौन मौजूद हैं। दिलचस्प बात यह है कि जौन को पढ़ने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने शायद कभी एक पूरी गजल भी नहीं पढ़ी।
जौन एलिया को शायरी की दुनिया में 'बर्बादी का पोस्टर बॉय' भी माना जाता है। इसके पीछे उनकी खुद को तबाह करने की ईमानदार स्वीकारोक्ति और उनका असाधारण जीवन दर्शन है।
इश्क नहीं, बेचैनी के शायर थे जौन
जौन एलिया को सिर्फ 'टूटे दिल का शायर' कहना उनके साथ नाइंसाफी होगी। जौन की शायरी में आधुनिक इंसान की बेचैनी, अकेलापन और अस्तित्व का संकट गहराई से मौजूद है। उनके यहां मोहब्बत है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा खुद से लड़ाई है। तभी तो जौन खुद लिखते हैं—
मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस,
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं..
यही एक शेर शायद उनकी पूरी शख्सियत का परिचय बन गया।
एक ऐसा शख्स जो अपनी हार से भागा नहीं
1931 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में जन्मे जौन एलिया का असली नाम सैयद हुसैन जौन असगर था। बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान चले गए। उनकी मोहब्बत और उनका वतन दोनों छूट गया। उनके अंदर से ये दर्द कभी खत्म ही नहीं हुआ।
उर्दू के वरिष्ठ आलोचक रजा नईम, जिन्होंने जौन पर विस्तार से लिखा है, मानते हैं कि जौन की शायरी में 'घर' जगह से बढ़कर एक खोया हुआ एहसास है। शायद इसलिए उनके यहां उदासी कभी बनावटी नहीं लगती।
शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई,
लेकिन यकीन सबको दिलाता रहा हूं मैं..
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मोहब्बत में हार को नहीं बनाया ग्लैमर
आज बहुत से लोग जौन एलिया को एक टॉक्सिक लवर की तरह पेश करते हैं। अगर ऐसे लोग जौन के इत्मिनान से समझेंगे तो पाएंगे कि वे ऐसे आशिक थे जो मोहब्बत में हार का जश्न नहीं मनाते, उसकी कीमत समझते थे। उनका मशहूर शेर देखिए-
बहुत नजदीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या?
इस एक शेर में प्रेम की खुशी कम और उसके खो जाने का डर ज्यादा है। जौन इसलिए अलग थे क्योंकि वे खुद को भी नहीं बख्शते थे। ज्यादातर शायर अपनी तकलीफ का दोष दुनिया पर डालते हैं। जौन ऐसा नहीं करते। वे अपनी कमियों को भी उतनी ही ईमानदारी से लिखते हैं।
इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊं,
वगरना यूं तो किसी की नहीं सुनी मैंने..
यही आत्मस्वीकृति उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।
सोशल मीडिया ने जौन को दिया नया जन्म
पत्रकार और लेखक रक्षंदा जलील, जिन्होंने उर्दू साहित्य पर खूब काम किया है, मानती हैं कि डिजिटल दौर में जौन एलिया की लोकप्रियता इसलिए बढ़ी क्योंकि उनकी शायरी छोटी, तीखी और तुरंत जुड़ जाने वाली है।
आज इंस्टाग्राम पर हजारों पोस्ट सिर्फ उनके दो या चार मिसरों के सहारे लाखों लोगों तक पहुंचती हैं। वैसे इसकी एक कीमत भी चुकानी पड़ी। जौन के अंदाज-ए-बयां को काफी हद तक सिर्फ 'सैड कोट्स' तक सीमित कर दिया गया।
क्या सचमुच जौन 'बर्बादी के पोस्टर बॉय' थे?
शायद नहीं। वो तो बर्बादी का जश्न मनाने वाले शायर थे। उस इंसान की आवाज थे जो अपनी कमजोरियों से भागता नहीं। उनका सबसे मशहूर शेर भी यही कहता है-
अब नहीं कोई बात खतरे की,
अब सभी को सभी से खतरा है..
यह सिर्फ प्रेम की बात नहीं, बल्कि पूरे समाज की बेचैनी का बयान है।
जौन को पढ़ना, खुद को पढ़ना है
जौन एलिया के नगमों की पहली किताब शायद उनके 60 साल की उम्र पार करने के बाद छपी। लेकिन आज उनकी शायरी युवा पीढ़ी की सबसे पसंदीदा आवाजों में शामिल है। शायद इसलिए कि वे टूटे हुए दिल की कहानी नहीं लिखते। वो अपनी शायरी में उस इंसान की कहानी बुनते थे जो अपने भीतर के खालीपन, अकेलेपन और अधूरेपन से हर दिन जूझ रहा है। और शायद इसी एहसास को उनका यह शेर सबसे खूबसूरती से बयान करता है-
जिंदगी किस तरह बसर होगी,
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में..
जौन एलिया को अगर सिर्फ बर्बादी के पोस्टर बॉय कह दिया जाए, तो उनकी शायरी का दायरा बहुत छोटा हो जाएगा। सच तो यह है कि वे उस पीढ़ी के शायर हैं जिसने हमें सिखाया कि टूटना भले हमारे हाथ में ना हो, मगर हम उसे ईमानदारी से स्वीकार तो कर ही सकते हैं। शायद किसी टूटे हुए इंसान की सबसे बड़ी बहादुरी भी यही है।
तो जो लोग जौन को मुकम्मल तरीके से नहीं समझ पाए हैं, उनके लिए जौन खुद लिख गए हैं-
मैं जो हूं जौन एलिया हूं जनाब
इसका बेहद लिहाज कीजेगा..
