Dowry Deaths in India: कभी ट्विशा शर्मा, कभी दीपिका नागर, कभी पलक रजक… चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, लेकिन खबरों की भाषा नहीं बदलती। कहीं बहू फंदे से लटकती मिलती है, कहीं जलकर मर जाती है, कहीं 'मेंटल टॉर्चर' उसकी जिंदगी निगल जाता है। हर बार ससुराल वाले कहते हैं— लड़की कमजोर थी, एडजस्ट नहीं कर पाई, मानसिक रूप से ठीक नहीं थी। और हर बार एक सवाल हवा में तैरता रह जाता है- आखिर दहेज का यह दानव क्यों नहीं मरता?
हैरानी की बात यह है कि यह सब उस दौर में हो रहा है, जहां लड़कियां पढ़ी-लिखी हैं, नौकरी कर रही हैं, आत्मनिर्भर हैं। लेकिन शादी के बाद वही लड़की अचानक 'बोझ', 'कमजोर' या 'कम लाने वाली' क्यों बन जाती है? आखिर क्यों आज भी बेटे को 'इन्वेस्टमेंट' और बेटी को 'जिम्मेदारी' की तरह देखा जाता है?
दहेज अब सिर्फ कैश नहीं, 'स्टेटस सिंबल' बन चुका है
नए वक्त में होती तरक्की के साथ तो दहेज को खत्म हो जाना चाहिए था। पहले दहेज का जो मतलब कैश, गाड़ी, फर्नीचर या सोना था। वो अब बदल कर कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुका है।
डॉ. अंबरीष सक्सेना (प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ आर्टस एंड डिजाइन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी) का कहना है कि अब लोग सीधे दहेज नहीं मांगते, बल्कि 'स्टैंडर्ड' की भाषा बोलते हैं। शादी किस होटल में हुई? कितने लोगों को बुलाया गया? कौन सी कार दी गई? लड़के वालों को कितने महंगे गिफ्ट मिले? सोशल मीडिया पर शादी कितनी 'रॉयल' दिखी? अब इन सवालों से परिवार की प्रतिष्ठा तय की जाती है।
यानी दहेज अब सिर्फ लालच नहीं, दिखावे का हिस्सा भी बन चुका है। कई परिवार बड़ी सफाई से कहते हैं कि हमने कुछ नहीं मांगा, जो देंगे अपनी बेटी को ही देंगे। लेकिन इसी लाइन के भीतर सबसे बड़ा दबाव छिपा होता है। लड़की वाले अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं समाज उन्हें छोटा न समझ ले। यहीं से दहेज खत्म होने के बजाय और मजबूत हो जाता है।
स्टेटस सिंबल बनकर दहेज 21वीं सदी में ले रहा बेटियों की जान
बेटा 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' लगता है
पत्रकारिता और जनसंचार के प्रफेसर सुनीत मुखर्जी कहते हैं कि 21वीं सदी में भी दहेज के जिंदा रहने की सबसे बड़ी वजह शायद यही है कि समाज के एक हिस्से ने बेटे को इंसान कम और 'इन्वेस्टमेंट' ज्यादा बना दिया है। बेटे की पढ़ाई पर लाखों खर्च हुए हैं, उसे डॉक्टर बनाया गया, इंजीनियर बनाया गया, विदेश भेजा गया… और फिर शादी के समय उस खर्च की 'रिकवरी' शुरू हो जाती है।
सरकारी नौकरी वाला लड़का है तो पैकेज अलग। डॉक्टर है तो मांग अलग। विदेश में है तो 'रेट' और ऊंचा। यह बात जितनी कड़वी है, उतनी ही सच्ची भी कि कई घरों में शादी अब रिश्ता नहीं, डील बन चुकी है। लड़के की नौकरी और सैलरी के हिसाब से उसकी 'मार्केट वैल्यू' तय होती है।
और दुखद यह है कि इस सोच को सिर्फ अनपढ़ लोग नहीं, बल्कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे परिवार भी आगे बढ़ा रहे हैं।
बेटों और बेटियों को लेकर अलग मानसिकता भी दहेज की जड़ है
समाज बेटों को 'हक' और बेटियों को 'समझौता' सिखाता है
हमारे घरों में बचपन से लड़कों और लड़कियों की ट्रेनिंग अलग होती है। लड़कों को सिखाया जाता है कि घर की बहू 'एडजस्ट' करेगी। वहीं बेटियों को समझाया जाता है कि 'अब वही तुम्हारा घर है, थोड़ा झुकना पड़ता है।' यहीं से असमानता शुरू हो जाती है।
सामाजिक मामलों की जानकारी डॉ. रीना शर्मा कहती हैं कि शादी के बाद जब लड़की पहली बार अपने दुख के बारे में घरवालों को बताती है, तो अक्सर उसे यही जवाब मिलता है कि हर घर में ऐसा होता है, थोड़ा सह लो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। ऐसा नहीं है कि मां-बाप बेटी को प्यार नहीं करते या उसकी मदद नहीं करना चाहते, या उसका दर्द महसूस नहीं करते - लेकिन वे समाज के दबाव में होते हैं, उनसे डरे हुए होते हैं। उन्हें लगता है कि अगर बेटी वापस आ गई तो रिश्तेदार क्या कहेंगे। यही डर कई बार बेटी की जिंदगी से भी बड़ा हो जाता है।
धीरे-धीरे लड़की को लगने लगता है कि शायद गलती उसी की है। वह खुद को दोष देने लगती है। लगातार ताने, तुलना, अपमान और आर्थिक मांगें उसका आत्मविश्वास खत्म कर देती हैं।
दहेज की वजह से 2024 में 5737 बेटियों ने जान गंवाई
लोग क्या कहेंगे - का दबाव ले लेता है जान
भारतीय समाज में शायद सबसे भारी वाक्य यही है कि - लोग क्या कहेंगे। कई लड़कियां सिर्फ इसलिए हिंसा सहती रहती हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि शादी टूट गई तो समाज उन्हें दोष देगा। इसी वजह से वो मां-बाप से भी ज्यादा खुलती नहीं हैं। वहीं माता-पिता भी रिश्तेदारों की बातों से डरते हैं।
डॉ. रीना शर्मा का कहना है कि कई घरों में बेटी की टूटी शादी, उसकी टूटी जिंदगी से ज्यादा बड़ा कलंक मानी जाती है। यही वजह है कि लड़कियां आखिरी हद तक सहती रहती हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि शायद बच्चा होने के बाद सब बदल जाएगा, शायद पति सुधर जाएगा, शायद ससुराल वाले मान जाएंगे। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता।
दहेज एक अभिशाप समझा जाए तो ही इसे हटा सकेंगे
दहेज की आग गांवों तक सीमित नहीं रही
अक्सर लोग कहते हैं कि दहेज तो छोटे शहरों या गांवों की समस्या है। लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है। प्रफेसर सुनीत मुखर्जी कहते हैं कि आज बड़े शहरों में दहेज सिर्फ भाषा बदलकर मौजूद है। कहीं इसे 'गिफ्ट' कहा जाता है, कहीं 'शादी की मदद', कहीं 'स्टेटस' और कहीं 'सेटअप'।
प्रफेसर सुनीत मुखर्जी कहते हैं कि असल में दहेज का चेहरा मॉडर्न हो गया है, मानसिकता नहीं। महंगे प्री-वेडिंग शूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, लग्जरी गिफ्ट्स और सोशल मीडिया पर परफेक्ट शादी दिखाने की होड़ ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। अब शादी दो लोगों का रिश्ता कम और सोशल शो ज्यादा लगने लगी है।
असली बदलाव सोच से आएगा
डॉ. अंबरीष सक्सेना इस मामले को एक ही लाइन में स्पष्ट कर देते हैं कि दहेज सिर्फ अपराध नहीं, मानसिकता की बीमारी है। इसका इलाज सिर्फ कोर्ट या पुलिस स्टेशन में नहीं मिलेगा। बदलाव तब आएगा जब बेटे की शादी को 'कमाई का मौका' समझना बंद होगा। जब लड़कों को यह सिखाया जाएगा कि पत्नी कोई एटीएम या प्रोजेक्ट नहीं, बराबरी की साथी है।
यानी जब माता-पिता बेटियों को सिर्फ सहना नहीं, गलत के खिलाफ खड़ा होना भी सिखाएंगे। जब शादी को दिखावे का मंच नहीं, रिश्ते की शुरुआत माना जाएगा। और सबसे जरूरी - जब मायके बेटी को यह भरोसा देगा कि अगर उसके साथ गलत होगा, तो उसका घर हमेशा उसके साथ खड़ा रहेगा।
