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रामधारी सिंह दिनकर: जब तिरुपति मंदिर में कविता पढ़ दक्षिणा में मांग ली अपनी ही मौत

Ramdhari Singh Dinkar: रामधारी सिंह दिनकर के पौत्र अरविंद कुमार सिंह के मुताबिक उन्होंने तिरुपति में अपनी मौत की दुआ मांगी थी, जो उसी रात कबूल भी हो गई।

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जब दिनकर ने मांगी मौत की दुआ, कुछ घंटों में हो गई कबूल (AI Generated Image)
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 15, 2026, 11:41 IST

Ramdhari Singh Dinkar: हिंदी साहित्य में अगर किसी कवि ने ओज, राष्ट्रप्रेम और विद्रोह को सबसे असरदार तरीके से शब्द दिए, तो वह नाम है रामधारी सिंह दिनकर का। राष्ट्रकवि कहलाने वाले दिनकर जिनकी कविताएं आज भी लोगों में जोश भर देती है, अपने अंतिम दिनों में इतने टूट गए थे कि तिरुपति जाकर खुद अपनी मौत मांग बैठे। ये बात है सन 1974 की। 66 के हो चुके दिनकर काफी बीमार रहने लगे थे। एक दिन अचानक उन्होंने तिरुपति मंदिर जाने का निर्णय लिया। वो गए भी। वो यात्रा उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुई।

रामधारी सिंह दिनकर के पौत्र अरविंद कुमार सिंह के मुताबिक उन्होंने तिरुपति में अपनी मौत की दुआ मांगी थी, जो कबूल भी हो गई। डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की किताब 'अपने समय का सूर्य: रामधारी सिंह दिनकर' भी इस घटना की तसदीक करती है। कहा जाता है कि जब दिनकर ने तिरुपति जाने का तय किया तो उनके एक शिष्य ने मुस्कराते हुए कहा- बाबा, भगवान से जो अपने लिए मांगेंगे, मेरे लिए भी मांग लीजिएगा। इस पर दिनकर की आंखें भर आईं। उन्होंने धीमे स्वर में जवाब दिया- मैं जो अपने लिए मांगने जा रहा हूं, वह किसी और के लिए कभी नहीं मांग सकता।

क्या हुआ था उस दिन?

23 अप्रैल को जब दिनकर तिरुपति पहुंचे तो उनके आने की खबर तेजी से फैल गई। उन्हें देखने और सुनने की इच्छा रखने वालों की भीड़ मंदिर में बढ़ गई। शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो चुके दिनकर ने लोगों के आग्रह पर मंदिर में भगवान विष्णु के समक्ष श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का वर्णन करती अपनी कविताओं का पाठ किया। उन्होंने अपनी कालजयी कविता रश्मिरथी का पाठ भी किया। काव्य-पाठ के बाद उन्होंने भगवान से किसी सम्मान, यश या लंबी उम्र की नहीं, पीड़ा से मुक्ति और मृत्यु का वरदान मांगा। मंदिर से निकल दिनकर जा पहुंचे समुंद्र के किनारे और समुद्र देव से कहा-

सुनूं क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा..

सुनूं क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा..

इसके बाद वहां भी उन्होंने अपनी कविताएं पढ़ीं। कविताएं खत्म करने के बाद दिनकर ने दोनों हाथ उठाए और समुद्र बोले- मैंने आपको और आपके दामाद को यानी कि भगवान विष्णु को अपनी कविता सुनाई, दक्षिणा स्वरूप मैं आपसे अपनी मृत्यु मंगाता हूं।

ये किसी को भी हैरान कर देती है कि उसी रात दिनकर जब वापस मद्रास लौटे तो उन्हें देर रात दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। वह तारीख थी 24 अप्रैल 1974। समाज को समझने की जिस तड़प ने उन्हें हिंदी का 'राष्ट्रकवि' बनाया था उसी की मौत को कोई ठीक से समझ ही नहीं पाया। इस तरह से अस्त हुआ हिंदी साहित्य का वो सूर्य जिसने पूरी जिंदगी शब्दों से लोगों में जीने का साहस भरा, लेकिन अंत में ईश्वर से केवल मौत के रूप में पीड़ा से मुक्ति मांगी।

अपनी कलम से क्रांति रचने वाला कवि

रामधारी सिंह दिनकर 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में जन्मे थे। पिता का साया जल्दी उठ गया था। बावजूद इसके वो खूब पढ़े। पढ़ने के साथ लिखने का हुनर आया। और जब उनकी कलम चली तो क्या खूब चली। उनकी रचनाओं में जहां एक तरफ सौंदर्य था तो दूसरी तरफ भरपूर क्रांति भी थी। क्रांति के रंग को तो उन्हें जिस खूबसूरती से कागज पर उतारा कि वो हमेशा के लिए अमर हो गए। इसकी बानगी उनकी उनकी प्रसिद्ध कृति 'हुंकार' की इन पंक्तियों में नजर आती है-

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..

जब उन्होंने 'रश्मिरथी' लिखी तो उसमें कर्ण के जरिए आत्मसम्मान और संघर्ष का ऐसा अद्भुत चित्र खींचा जिसने उन्हें हिंदी साहित्य का राष्ट्रकवि बना दिया। 1952 में रचे इस महाकाव्य में दिनकर ने महाभारत के महान योद्धा कर्ण को संघर्ष, स्वाभिमान, अपमान और सामाजिक असमानता के खिलाफ खड़े होने वाले नायक के रूप में पेश किया। उन्होंने सिखाय कि जन्म नहीं, व्यक्ति के कर्म उसकी पहचान बनाते हैं।

"क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,

उसको क्या, जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो.."

रश्मिरथी आज भी बहुत से युवाओं को कंठस्थ है। इस कविता को पढ़ते वक्त मानों माथे की लकीरें तन जाती हैं। भुजाएं कांपने लगती हैं। रगें जोश के रक्त से भर आती हैं। 'रश्मिरथी' ने कर्ण को भारतीय साहित्य में नई प्रतिष्ठा दिलाई और यह आज भी हिंदी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले महाकाव्यों में शामिल है।

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