Empty Nest Syndrome: हर मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर अपनी गृहस्थी बसाएं। जीवन में कुछ ऐसा करें कि उनका खूब नाम हो। इसलिए जब बच्चे बड़े होकर पढ़ाई, नौकरी या शादी के लिए घर छोड़ते हैं, तो माता-पिता को गर्व तो होता है। इस गर्व और खुशी की भावना के साथ ही पेरेंट्स के दिल के एक कोने में एक अजीब खालीपन भी घर कर जाता है। यही भावनात्मक खालीपन एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम कहलाता है।
एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम क्या है? (Photo: Pexels)
क्यों होता है एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम? (What is Empty Nest Syndrome)
एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम को समझने का सबसे आसान तरीका है इस अंग्रेजी शब्द का हिंदी मतलब जानना। एम्प्टी नेस्ट का मतलब होता है खाली घोंसला। खाली घोंसले..मतलब कि घर में बच्चों का ना होना। दरअसल बच्चे जब छोटे होते हैं तो माता-पिता की पूरी दिनचर्या उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। यही बच्चे जब बड़े होने पर शादी या नौकरी के लिए घर छोड़ कहीं और सेटल हो जाते हैं तो पेरेंट्स एक अजीब से सूनेपन का शिकार होने लगते हैं। इसी पेरेंट्स की इसी परेशानी को चिकित्सा की भाषा में एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम कहा जाता है।
कैसे पेरेंट्स होते हैं एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम के शिकार
ऐसा नहीं है कि सारे माता-पिता इस सिंड्रोम के शिकार होते हैं। इनमें से ज्यादातर वो होते हैं जो अपने बच्चों से कुछ ज्यादा ही गहरा भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं। उन्हें कभी अकेला रहने की आदत ही नहीं होती। जिन पेरेंट्स का सामाजिक दायरा कम होता है वो भी बच्चों के चले जाने के बाद इस सिंड्रोम के शिकार हो जाते हैं। उन पेरेंट्स में एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम का खतरा सबसे अधिक होता है जो अपनी पूरी पहचान ही बस एक मम्मी और पापा के तौर पर बना लेते हैं। उनके भविष्य की सारी योजनाएं बच्चों के हिसाब से ही होती हैं।
एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम के लक्षण (Photo: Pexels)
एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम से कैसे निपटें?
बच्चों से दूरी का दर्द हर पेरेंट्स के लिए एक चुनौती होती है। उस तकलीफ को अपनी कमजोरी ना बनने दें। फिर भी अगर आपको लगता है कि आप एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम की गिरफ्त में आ चुके हैं तो इन तरीकों से आप खुद को संभाल सकते हैं:
1. सोशल दायरा बढ़ाएं: सबसे पहले तो आपको अपना सामाजिक दायरा बढ़ाना होगा। लोगों से मिलते जुलते रहना होगा। नए दोस्त बनाने होंगे। पड़ोसियों के साथ समय बिताएं।
2. व्यस्त रहें: खाली समय में सबसे ज्यादा अपनों की याद आती है। ऐसे में खुद को जितना हो सके व्यस्त रखें। व्यस्तता हर मर्ज की दवा साबित होती है।
3. अपने शौक पूरे करें: आपको अपनी हॉबी पर फोकस करना होगा। आप जो काम करना चाहते हैं या फिर जो करने का आपका शौक है उसे करें। कुछ शौक जो आपने बच्चों की जिम्मेदारी के चलते छोड़ दिये थे उन्हें दोबारा से जीना शुरू कर दें।
4. बच्चों से बात करते रहें: बच्चे भले दूसरे शहर या देश में चले गए हैं लेकिन आप फोन या इंटरनेट के जरिए उनसे जुड़े रह सकते हैं। आप उनसे बराबर बात करते रहें। वीडियो कॉल की व्यवस्था हो तो और भी अच्छा।
5. पार्टनर से बॉन्डिंग बढ़ाएं: बच्चों के जाने का बाद आपका जीवनसाथी ही आपके साथ रह जाता है। ऐसे में जरूरी है कि उसके साथ आप रिश्ते को और मजबूत करें। साथ में टूर प्लान करें। साथ में बच्चों से मिलने भी जाया करें।
यहां हमें समझना होगा कि एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं है। यह एक तरह की स्वाभाविक भावनात्मक स्थिति है। इसे सही तरीके से समझ कर इससे पार पाया जा सकता है। हमेशा याद रखें कि बच्चों का दूर जाना स्वाभाविक है और इसे आप जितनी जल्दी समझ जाएंगे आपके लिए उतना ही बेहतर होगा।
