इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए। सत्ता बदलती रही। बादशाह बदले। सल्तनतें बदलीं। युद्ध हुए। शहर उजड़े। लेकिन इन तमाम लड़ाइयों में सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई? औरतों ने। दरअसल युद्ध में दुश्मन की जमीन जीतना एक बात थी, लेकिन औरत के शरीर को जीत की निशानी समझना उससे कहीं ज्यादा भयावह मानसिकता थी।
स्वरा भास्कर को ट्रोल कर क्या साबित करना चाहता है समाज?
मध्यकालीन युद्धों और सत्ता संघर्षों में महिलाओं के साथ हिंसा, यौन शोषण, अपहरण और जबरन कब्जे के उदाहरण मिलते हैं। उस दौर में औरत का शरीर उसका शरीर था ही नहीं। वह सत्ता, बदले और विजय का मैदान बना दिया जाता था। आज वो दौर नहीं है। वैसी बर्बरता भी नहीं है। सब खत्म हो चुका है, लेकिन क्या वह मानसिकता भी खत्म हो गई है? इस सवाल का जवाब चाहिए तो स्वरा भास्कर के साथ सोशल मीडिया पर जो हो रहा है, उसे देखिए।
उस दौर में महिलाओं के साथ जैसी बर्बरता होती थी, स्वरा भास्कर संग हो रहा सलूक क्या उससे कम शर्मनाक है। उनके बयान से असहमति है तो बिल्कुल रखिए। उनके इतिहास-बोध पर सवाल उठाइए। उनके तर्क को गलत साबित कीजिए। लेकिन जब बहस उनके शरीर, चरित्र, मजहब, निजी जीवन और फिल्मी किरदारों तक पहुंच जाए तो यह सार्वजनिक अपमान बन जाती है।
तरीका बदला, निशाना नहीं
मध्यकाल में औरत की देह को उसके खिलाफ हथियार बनाया जाता था। आज स्वरा जैसी महिलाओं की तस्वीर, उनके शरीर, उनके चरित्र और उनकी निजी जिंदगी को हथियार बना दिया जा रहा है। तरीका बदल गया है लेकिन निशाना नहीं बदला।
तब किसी महिला को चुप कराने के लिए उसके शरीर पर हमला किया जाता था। आज उसे सोशल मीडिया में नंगा किया जाता है। उसके शरीर का मजाक उड़ाया जाता है। उसके चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब हथियार हाथ में होता था और आज मोबाइल है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मोबाइल पकड़े यही हाथ खुद को सभ्य समझते हैं।
इस तथाकथित सभ्य समाज को ये समझ क्यों नहीं आता कि किसी महिला की बात पसंद नहीं आई तो उसकी देह पर टिप्पणी क्यों? उसके धर्म को गाली क्यों? उसके चेहरे और वजन का मजाक क्यों? उसके पति या परिवार को क्यों घसीटना? आखिर किस तर्क की किताब में लिखा है कि महिला की राय का जवाब उसके शरीर से दिया जाए?
हम सच में कितना आगे आए हैं?
सदियां बीत गईं। राजा चले गए। दरबार चले गए। हथियार बदल गए। लेकिन अगर किसी औरत की आवाज दबाने के लिए आज भी उसकी देह और गरिमा को निशाना बनाया जा रहा है, तो हमें खुद से पूछना चाहिए- हम सच में कितना आगे आए हैं?
स्वरा भास्कर के जौहर पर दिए बयान को लेकर सोशल मीडिया पर बहस हो सकती है। उनके बयान से असहमति भी हो सकती है। इतिहास को लेकर उनकी समझ पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं। लेकिन लोगों ने इस बहस को गाली-गलौज, धर्म, चरित्र और शरीर पर टिप्पणी तक पहुंचा दिया। यह हरकत हमारे समाज की उस घटिया मानसिकता का आईना है, जिसमें किसी महिला की बात का जवाब उसके शरीर से दिया जाता है।
क्यों खत्म नहीं हो रही कुंठा
आपको स्वरा पसंद नहीं हैं, ठीक है। आपको उनका राजनीतिक नजरिया पसंद नहीं है, ठीक है। आपको उनकी फिल्मों में निभाए गए किरदार पसंद नहीं आए, ठीक है। आपको उनका जौहर पर विचार गलत लगता है। बिल्कुल ठीक, आप असहमति जताइए। उनसे असहमति जताने के हजार तर्क और तरीके हो सकते थे।
कोई कह सकता था कि स्वरा जौहर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ठीक से नहीं समझ रही हैं। कोई कह सकता था कि उस दौर की परिस्थितियों को आज की सामाजिक सोच से नहीं देखा जा सकता। कोई यह तर्क दे सकता था कि जौहर को सिर्फ आत्मदाह कहना उन महिलाओं के सामने मौजूद युद्ध, कैद, हिंसा और अपमान की भयावह परिस्थितियों को नजरंदाज करना है।
ये सारे तर्क जायज हैं, लेकिन किसी महिला को इसलिए गाली देना कि उसकी राय आपको पसंद नहीं आई? उसके धर्म को बीच में लाना? उसके पति के धर्म को लेकर टिप्पणी करना? उसके शरीर, चेहरे, वजन या शक्ल-सूरत पर भद्दी बातें करना? उसके पुराने फिल्मी किरदारों को निकालकर उसे नीचा दिखाना? यह आलोचना नहीं है। यह कुंठा है।
क्या किसी पुरुष के बयान पर भी हम उतनी ही जल्दी उसके पेट, चेहरे, बाल, कद या पत्नी के धर्म पर उतर आते हैं? अगर जवाब 'नहीं' है तो फिर हमें स्वीकार करना होगा कि हमारी 'मर्दाना' सोच बर्बरता के उस दौर से कभी निकल ही नहीं पाई है।
भीड़ को क्यों समझ नहीं आती छोटी सी बात
लोग आखिर किस मानसिकता से स्वरा भास्कर के मजहब को बहस में ला रहे हैं। धर्म किसी भी इंसान के तर्क का जवाब नहीं होता। अगर स्वरा की बात गलत है तो उसे गलत साबित करने के लिए उनके धर्म की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही बात उनके फिल्मी किरदारों पर भी लागू होती है। एक अभिनेत्री ने पर्दे पर कोई किरदार निभाया था। वह किरदार वह महिला नहीं है। अभिनेता और उसका किरदार एक ही व्यक्ति नहीं होते। अगर हम यह बुनियादी फर्क भी भूल जाएंगे तो फिर सिनेमा पर बातचीत कैसे होगी?
सबसे शर्मनाक तो है किसी महिला के शरीर और उसकी बनावट पर निशाना साधना। किसी महिला का वजन उसके विचारों का प्रमाण नहीं होता। उसका चेहरा उसके तर्क की गुणवत्ता तय नहीं करता। उसकी खूबसूरती या बदसूरती उसके बयान को सही या गलत नहीं बनाती। फिर हम बार-बार महिलाओं को उनके शरीर से क्यों मापते हैं? शायद इसलिए क्योंकि तर्क में जवाब देना मुश्किल है और शरीर पर टिप्पणी करना आसान।
बस एक स्वरा का मामला नहीं है ये
यह सिर्फ स्वरा भास्कर की कहानी नहीं है। यह हर उस महिला के साथ होता है जो सार्वजनिक जगह पर अपनी आवाज उठाती है और बदले में उसे यह याद दिलाने की कोशिश की जाती है कि 'अपनी औकात में रहो'। उसकी औकात बताने के लिए लोग तुरंत फैसला सुना देते हैं। फिर भीड़ आती है। कोई गाली देता है। दूसरा उससे ज्यादा गंदी गाली देता है। तीसरा धर्म जोड़ देता है। चौथा शरीर पर चला जाता है। देखते ही देखते बहस खत्म हो जाती है, भीड़ का तमाशा शुरू हो जाता है।
हमें तय करना होगा कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। ऐसा समाज जहां इतिहास पर बहस हो, लेकिन इंसान की गरिमा बची रहे या ऐसा समाज जहां असहमति का मतलब किसी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का लाइसेंस हो? आज निशाने पर स्वरा हैं। कल कोई और महिला होगी। परसों शायद हमारी अपनी बेटी, बहन, पत्नी या मां किसी मुद्दे पर अपनी राय रखेगी। तब क्या हम चाहेंगे कि उसके तर्क का जवाब भी उसके शरीर और चरित्र से दिया जाए? नहीं ना?
तो असहमति रखिए..कड़ी असहमति रखिए..इतिहास के नाम पर उन्हें चुनौती दीजिए। उनकी बात को गलत साबित कीजिए, लेकिन इंसानियत मत हारिए। क्योंकि किसी महिला की बात को गलत साबित करने के लिए अगर आपको उसके शरीर और चरित्र पर उतरना पड़ रहा है, तो शायद हार उसकी नहीं हुई है। हार खुद को सभ्य समझने वाले इस समाज की हुई है।
