आज वर्ल्ड फोटोग्राफी डे है। पिछले करीब दो दशक में जब भी फोटो की बात आती है तो सेल्फी शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। सेल्फी मतलब कि खुद से खुद की फोटो खींचना। आज सेल्फी लेने के लिए हमें सिर्फ फोन उठाना पड़ता है। कैमरा सामने की तरफ किया। चेहरा स्क्रीन पर देखा और क्लिक। अब करीब 150 साल पीछे चलिए। साल 1880 के आसपास का त्रिपुरा। न कोई स्मार्टफोन था, न फ्रंट कैमरा और न ही सेल्फी स्टिक। कैमरे में सेल्फ टाइमर के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता था। तब तस्वीर लेना खुद में एक चुनौती भरा काम था।
World Photography Day 2026 पर पढ़ें कहानी भारत के पहले सेल्फी की
उसी दौर में त्रिपुरा के महाराजा बीर चंद्र माणिक्य और उनकी पत्नी महारानी खुमान चानू मन्मोहिनी देवी की एक फोटो सामने आई। पहली नजर में यह किसी शाही कपल का सामान्य पोर्ट्रेट लगती है। हालांकि तस्वीर को थोड़ा गौर से देखिए। महाराजा का एक हाथ महारानी के कंधे पर है। दूसरे हाथ में एक छोटा सा तार नजर आता है। यही तार इस पूरा कहानी की सबसे अहम कड़ी है।
यह तार कैमरे से जुड़ा था। तार को खींचते ही कैमरे का शटर खुल गया और एक तस्वीर खिंच गई। यानी कैमरा सामने था और दोनों उसके सामने थे। तस्वीर जब बनकर तैयार हुई तो तस्वीर लेने वाले भी उसके अंदर दिखे। यह तस्वीर भारत के इतिहास में सबसे पहली सेल्फी के तौर पर हमेशा के लिए दर्ज है।
तारीख और तस्वीर से बड़ी है कहानी
वैसे इस तस्वीर को भारत की पहली सेल्फी कहकर छोड़ देना इसके साथ नाइंसाफी होगी। दरअसल ये सेल्फी लेने वाले बीर चंद्र माणिक्य के लिए फोटोग्राफी महज शौक नहीं, जुनून थी। ऐसा जुनून कि उन्होंने अपने महल को लगभग एक छोटे फोटो लैब में तब्दील कर लिया था।
उन्होंने महल में अपना स्टूडियो और डार्करूम बनाया था। कैमरे से जुड़ी चीजें, कांच की प्लेटें और फोटोग्राफी में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स यूरोप से मंगवाए थे। वह खुद विदेश से फोटो डेवलप करने की बकायदा ट्रेनिंग लेकर लौटे थे।
कैमरे को लेकर उनका जुनून इस कदर था कि वह फोटो बनाने की पूरी प्रक्रिया जानते थे। कैमरा कैसे काम करता है? तस्वीर कैसे बनती है? नेगेटिव कैसे तैयार होता है? प्रिंट कैसे निकलेगा? उनके पास इन सारे सवालों का जवाब था।
तब आसान नहीं थी फोटोग्राफी
आज अगर कोई फोटो ठीक न आए, तो हम दूसरी खींच लेते हैं। उस समय ऐसा नहीं था। आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले फोटोग्राफी काफी समय लेने वाला और तकनीकी से भरा काम था।आज के एक सेकंड के क्लिक और उस समय की प्रक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर था। महाराजा और महारानी को कैमरे के सामने सही स्थिति में बैठना था। कैमरा पहले से तैयार करना था। फ्रेम तय करना था और फिर खुद शटर चलाना था। बावजूद इसके उन्होंने ये किया और अपनी उस तस्वीर को अमर कर दिया।
महल में बनाया कैमरा क्लब
बीर चंद्र की दिलचस्पी सिर्फ निजी फोटोग्राफी यानी कि तस्वीरें खींचने भर में नहीं थी। वह चाहते थे कि फोटोग्राफी महल की चारदीवारी से बाहर भी जाए। इसी सोच से उन्होंने द कैमरा क्लब ऑफ द पैलेस ऑफ अगरतला (The Camera Club of the Palace of Agartala) बनाया। मई 1890 में प्रकाशित जर्नल ऑफ द फोटोग्राफिक सोसाइटी ऑफ इंडिया में इस क्लब का जिक्र है।
इस जर्नल में त्रिपुरा के राजपरिवार की तस्वीरों से जुड़ी जानकारी प्रकाशित हुई थी। खास बात यह थी कि कुछ तस्वीरें महाराजा की बताई गई थीं और कुछ महारानी मन्मोहिनी देवी की। तस्वीरों पर खूब प्रयोग किये गए थे। तस्वीरों पर सारे प्रयोग महल के उस आलीशन लैब में होते जिसे दरबार के लोग 'फोटो का कारखाना' कहते थे। महाराजा बीर चंद्र के लिए फोटोग्राफी शौक, जुनून, कला और भविष्य सरीखी थी।
अपनी हमसफर को बनाया 'पार्टनर'
महाराजा ने इस कला को खूब सीखा और उसपर खूब प्रयोग भी किया। उन्होंने अपनी जीवन संगिनी महारानी मन्मोहिनी देवी को भी अपने इस जुनून का हिस्सेदार बनाया। खुद बीर चंद्र ने रानी को फोटोग्राफी सिखाई। ना सिर्फ तस्वीरें खींचना बल्कि उन्हें डेवलप करना भी सिखाया।
सिद्धार्थ घोष की किताब Chobi Tola: Bangalir Photography Chorcha में 1890 के फोटोग्राफिक रिकॉर्ड के आधार पर महारानी मन्मोहिनी देवी के काम की चर्चा मिलती है। घोष के अनुसार, मन्मोहिनी देवी ने कई तस्वीरों के प्रिंट तैयार किए, जबकि महाराजा ने दूसरी तस्वीरों को विकसित किया। इसी कारणवश मन्मोहिनी देवी को भारत की शुरुआती महिला फोटोग्राफरों में एक बेहद महत्वपूर्ण नाम माना जाता है।
शाही पोट्रेट से कितना अलग थी ये सेल्फी?
उस दौर के शाही पोर्ट्रेट आमतौर पर काफी औपचारिक होते थे। राजा सीधे बैठे होते।रानी एक तय मुद्रा में होतीं। चेहरे पर गंभीरता और फ्रेम में आने वाली हर चीज व्यवस्थित ङोती। लेकिन बीर चंद्र और मन्मोहिनी देवी की यह तस्वीर थोड़ी अलग है। दोनों एक-दूसरे के करीब हैं। महाराजा का हाथ महारानी के कंधे पर है। महारानी भी उनके करीब बैठी हैं। इसमें औपचारिक शाही दूरी कम और करीबी ज्यादा दिखाई देती है। यह एक ऐसा निजी पल, जिसे कैमरे ने 1880 के आसपास हमेशा के लिए रोक दिया।
कैमरा और डेढ़ सौ साल पहले का भारत
फोटोग्राफी भारत में 19वीं सदी के मध्य तक पहुंच चुकी थी, लेकिन कैमरा आम आदमी की चीज नहीं था। उपकरण महंगे थे। तकनीकी जानकारी चाहिए थी। केमिकल्स और प्लेटों की जरूरत होती थी। शुरुआती दौर में फोटोग्राफी पर यूरोपीय फोटोग्राफरों का काफी प्रभाव था। भारतीय राजपरिवारों में भी कुछ लोगों ने इसे अपनाया। बीर चंद्र इन्हीं शुरुआती भारतीय शासकों में थे।
फोटोग्राफी के इतिहास पर शोध करने वाले जॉन फाल्कनर ने भी बीर चंद्र को भारतीय शासकों में फोटोग्राफी अपनाने वाले शुरुआती और अहम शख्सों के तौर पर माना है। मतलब कि यह कहानी सिर्फ एक राजा के शौक की नहीं थी। यह उस समय की नई तकनीक को भारतीय समाज में अपनाने की कहानी भी थी।
फोटोग्राफी बन गई शाही विरासत
बीर चंद्र और मन्मोहिनी देवी के परिवार में फोटोग्राफी की रुचि आगे भी चलती रही। उनके तीन बेटे थे- समरेंद्र चंद्र देव बर्मन, राधा किशोर और ब्रजेंद्र किशोर। तीनों ने फोटोग्राफी का शौक विरासत में पाया। फोटोग्राफी इस शाही परिवार की विरासत बन गई। इस विरासत का बहुत बड़ी परछाईं उस 'सेल्फी' में भी नजर आती है।
पुरानी तस्वीरों की सबसे बड़ी खूबी यही तो होती है के वो समय को रोक देती है। 1880 की यह सेल्फी भी ऐसा ही करती है। उसमें बस राजा और रानी नहीं दिखाई देते। तब का जाना पहचाना भारत भी दिखाई देता है। एक ऐसा भारत जो नई तकनीक को देख रहा था। उसे सीख रहा था। उसके साथ प्रयोग कर रहा था और और उसे अपने तरीके से बदल भी रहा था।
त्रिपुरा के महाराजा बीर चंद्र माणिक्य की कहानी इसी वजह से खास है। वह उस दौर के उन भारतीयों में थे जिन्होंने कैमरे को समझने की कोशिश की। उसके लिए जगह बनाई। अपनी पत्नी को सिखाया। स्टूडियो बनाया। डार्करूम बनाया। फोटोग्राफी क्लब बनाया। प्रदर्शनियां आयोजित कीं। फिर एक दिन कैमरे के सामने जाकर खुद उसका शटर दबा दिया।
..और आज जब हम लेते हैं सेल्फी
आज हम एक दिन में जितनी तस्वीरें खींच लेते हैं, शायद बीर चंद्र ने अपने पूरे जीवन में उतनी भी न खींची हों। फिर भी उनकी एक तस्वीर ने इतिहास रच दिया। आज सेल्फी हमारी डेली लाइफ का हिस्सा है। कभी खुशी का पल है। कभी किसी सफर की याद। कभी किसी दोस्त के साथ बिताया समय तो कभी सिर्फ यह बताने का तरीका कि मैं यहां था।
बीर चंद्र और मन्मोहिनी देवी की तस्वीर भी शायद मूल रूप से ऐसी ही थी। बस फर्क इतना था कि उन्हें नहीं पता था कि यह तस्वीर आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी खास होने वाली है। उन्हें यह भी नहीं पता था कि 146 साल बाद लोग उस तस्वीर को देखकर कैमरे के पीछे छिपी तकनीक खोजेंगे। महाराजा के हाथ में पकड़े उस छोटे से तार को गौर से देखेंगे और कहेंगे कि, 'देखिए, सेल्फी का जमाना शुरू होने से बहुत पहले कोई भारतीय राजा खुद अपनी तस्वीर ले चुका था।'
यही इतिहास की सबसे खूबसूरत बात है। कभी-कभी भविष्य की कोई बड़ी चीज अपने समय में बिल्कुल मामूली प्रयोग लगती है। 1880 में त्रिपुरा के उस महल में भी ऐसा ही हुआ था। एक कैमरा रखा गया। राजा और रानी उसके सामने बैठे। एक तार खिंची। शटर चला और एक तस्वीर हमेशा के लिए इतिहास बन गई। वही तस्वीर आगे चलकर भारत की पहली सेल्फी भी कहलाई।
