आज आर्थिक आत्मनिर्भरता किसी भी तरह के रिश्ते में बहुत अहम हो चली है। लेकिन अच्छी नौकरी, अच्छी कमाई और आर्थिक सुरक्षा होने के बाद भी कई रिश्ते लंबे समय तक टिक नहीं पाते। सवाल उठता है कि आखिर कमी कहां रह जाती है? एक्ट्रेस श्वेता तिवारी ने अपने एक पुराने इंटरव्यू में इसी मुद्दे पर खुलकर बात की थी। उन्होंने कबूला किया था कि वो फाइनेंशियली सिक्योर तो थीं, लेकिन अपनी शादी में हमेशा इमोशनल सपोर्ट के लिए तरसती रहीं।
फाइनेंशियली मजबूत होने के बाद भी क्यों टूट जाते हैं रिश्ते? श्वेता तिवारी ने बताया कारण (Photo: Shweta Tiwari Instagram)
श्वेता ने बताया था कि उनकी मां हमेशा कहती थीं कि जो व्यक्ति खुद को सक्षम बनाने से पहले शादी करना चाहता है, वह शायद कभी जिम्मेदार नहीं बन पाएगा। उस समय उन्होंने इस सलाह को गंभीरता से नहीं लिया। बाद में उन्हें एहसास हुआ कि रिश्ते महज प्यार से नहीं, जिम्मेदारी से भी चलते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने पार्टनर से आर्थिक मदद नहीं चाहती थीं। उन्हें सिर्फ भावनात्मक सहारे की जरूरत थी। लेकिन जब इंसान अपनी सारी भावनात्मक जरूरतें एक ही व्यक्ति से पूरी करने की उम्मीद करने लगता है, तब रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है।
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इमोशनल और फाइनेंशियल स्ट्रेंथ दो अलग बातें हैं
इस मुद्दे पर बहुत सारे मनोचिकित्सक और रिलेशनशिप कोच ने अपनी राय रखी है। उनकी राय इंटरनेट पर उपलब्ध है। उनके मुताबिक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना और भावनात्मक रूप से संतुलित होना दो अलग-अलग बातें हैं। कोई व्यक्ति अच्छी कमाई कर सकता है, घर चला सकता है और बड़े फैसले ले सकता है, लेकिन फिर भी उसे ऐसा साथी चाहिए जो उसकी बात सुने, उसे समझे और मुश्किल समय में उसका साथ दे।
रिश्ते तब टूटते हैं, जब जिम्मेदारी एकतरफा हो जाती है
विशेषज्ञों के मुताबिक समस्या तब शुरू होती है, जब एक व्यक्ति रिश्ते का पूरा भावनात्मक, आर्थिक या व्यावहारिक बोझ अकेले उठाने लगता है। दूसरा साथी अगर लगातार जिम्मेदारी से बचता रहे, तो रिश्ता धीरे-धीरे दरकने लगता है।
यही वजह है कि शादी से पहले यह भी देखना जरूरी है कि सामने वाला व्यक्ति जिम्मेदार है या नहीं। क्या वह भविष्य बनाने की इच्छा रखता है? क्या वह मुश्किल समय में साथ निभा सकता है?
एक इंसान आपकी पूरी दुनिया नहीं हो सकता
मनोवैज्ञानिक एक बड़ी दिलचस्प सलाह देते हैं। उनका कहना है कि अपनी पूरी भावनात्मक जरूरत सिर्फ पार्टनर पर मत छोड़िए। जीवन में दोस्त, परिवार, काम, शौक और जरूरत पड़ने पर थेरेपी जैसे सहारे भी होने चाहिए। जब भावनात्मक सहारा कई जगहों से मिलता है, तब रिश्ते पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता और दोनों साथी अधिक सहज महसूस करते हैं।
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रिश्ते बराबरी से बनते हैं
श्वेता तिवारी की बात सिर्फ उनकी निजी कहानी नहीं है। यह उन लोगों के लिए भी एक सीख है जो मानते हैं कि अच्छी कमाई अपने आप एक सफल रिश्ता बना देती है। सच्चाई यह है कि बैंक बैलेंस रिश्ते को सुरक्षित बना सकता है, लेकिन उसे मजबूत नहीं बना सकता। मजबूत रिश्ता भरोसे, जिम्मेदारी, सम्मान और भावनात्मक संतुलन से बनता है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि एक अच्छा जीवनसाथी वह न होता है जो आपके साथ मिलकर जिम्मेदारियां भी निभाए। शायद इसी वजह से कहा जाता है कि रिश्ते पैसे से नहीं, साझेदारी से चलते हैं।
