रॉयल रसोई (Royal Rasoi): जब भी नवाबी साख, नफासत और जायके की हो, तो वाजिद अली शाह का नाम सबसे ऊपर आता है। कला और संगीत के दीवाने अवध के इन आखिरी नवाब को जितना शौक ठुमरी और कत्थक का था, उससे कहीं ज्यादा इश्क उन्हें लजीज खाने से था। उन्हें ये इश्क विरासत में मिला था। वाजिद अली शाह के दादा गाजीउद्दीन हैदर अवध के पहले नवाब थे। लजीज व्यंजनों से उनको इतना इश्क था कि एक बार भरे दरबार में उन्होंने अपने ही प्रधानमंत्री की पिटाई कर दी थी। लखनऊ को 'नवाबों और कबाबों का शहर' बनाने की शुरुआत भी उन्हीं के शाही दौर से हुई।
गाजीउद्दीन हैदर के दस्तरख्वान की कहानियां आज भी लखनऊ की गलियों में बड़े चाव से सुनी जाती हैं। टाइम्स नाउ नवभारत की खास सीरीज रॉयल रसोई के आज के अंक में हम आपको रूबरू करवाएं अवध के पहले नवाब की शाही रसोई से।
30 किलो घी में बनते थे नवाब साहब के खास पराठे
गाजीउद्दीन हैदर को साधारण खाना बिल्कुल पसंद नहीं था। उनके बावर्चीखाने में रोजाना ऐसे व्यंजनों का आविष्कार होता था, जो स्वाद के साथ-साथ दिखने में भी किसी अजूबे की तरह हों। उनके दस्तरख्वान पर सजे कोरमे, कबाब और बिरयानी में चांदी के वर्क और खास इत्र छिड़का जाता था, ताकि खाने की खुशबू पूरे महल में महक उठे। नवाब साहब का सबसे मशहूर किस्सा उनके खास 'पराठों' से जुड़ा है।
अवध के पहले नवाब गाजीउद्दीन हैदर (Source: Pinterest)
था ये कि नवाब का शाही बावर्ची रोज उनकी पसंद के छह खास पराठे बनाता था। ये छह पराठे पकाने के लिए 30 सेर यानी करीब 30 किलो घी लिया करता था। उसका कहना था कि एक पराठे में पांच सेर घी खप जाता है। यह कोई आम पराठा था भी नहीं। इसे इतनी परतों और नजाकत के साथ बेला और सेका जाता था कि इसका स्वाद मुंह में घुल जाता था।
पराठे के कारण नवाब ने कर दी थी प्रधानमंत्री की पिटाई
कई फूड हिस्टोरियन्स ने लिखा है कि एक बार इन पराठों को लेकर बड़ा हल्ला मचा। हुआ यूं कि नवाब के वजीर-ए-आजम मोतमउद्दौला आगा मीर ने शाही बावर्ची को फटकार लगा दी कि पराठों में इतना घी कौन लगाता है। उसने कहा कि अब से एक सेर हर पराठे के हिसाब से सिर्फ 6 सेर घी ही दिया जाएगा।
यह बात जब नवाब गाजीउद्दीन हैदर तक पहुंची तो वो अपना आपा खो बैठे। उन्हें इतना गुस्सा आया कि उन्होंने भरी सभा में आगा मीर को बुलाया और उन पर थप्पड़ों और घूसों की बरसात कर दी। इसके बाद फिर कभी किसी ने नवाब साहब के पराठों को छेड़ने की हिमाकत नहीं की। उनके लिए बदस्तूर 30 किलो घी में 6 पराठे पकते रहे।
आपको जानकर हैरानी होगी कि नवाब साहब इसका सिर्फ बेहद हल्का और मुलायम ऊपरी हिस्सा (पपड़ी) ही खाते थे। बाकी का हिस्सा उनके दरबारी और नौकरों में बांट दिया जाता था।
नवाब साहब के शौक से जन्मा शीरमाल
गाजीउद्दीन हैदर का ऐसा ही एक और दिलचस्प किस्सा है। कहा जाता है कि किसी खास मौके पर नवाब ने अपने शाही दस्तरख्वान के लिए एक बिल्कुल नई तरह की रोटी बनाने की इच्छा जताई थी। उन्होंने अपने शाही बावर्ची से कहा कि कुछ ऐसा बनाए जो उन्होंने पहले कभी ना खाया हो। जैसे ही यह खबर फैली, शाही बावर्चियों के साथ-साथ राज्य के दूसरे रसोइए भी नई-नई तरह की रोटियां बनाने में जुट गए। हर कोई चाहता था कि उसकी बनाई रोटी नवाब को सबसे ज्यादा पसंद आए।
निर्धारित दिन सभी रोटियों को शाही दस्तरख्वान पर सजाया गया। जब नवाब वहां पहुंचे तो उनकी नजर सबसे पहले एक सुनहरे पीले रंग की रोटी पर पड़ी। उसकी खूबसूरती ने उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। उन्होंने बिना देर किए उसका एक टुकड़ा तोड़ा, चखा और उसी पल फैसला सुनाया कि इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। यही सुनहरी रोटी आगे चलकर शीरमाल के नाम से मशहूर हुई और अवध की शाही रसोई की पहचान बन गई।
अवधी खाने की स्वादिष्ट मिसाल है शीरमाल
इस सुनहरी शीरमाल को बनाने वाला शख्स था महमदू। महमदू तब फिरंगी महल के पास छोटी सी रसोई चलाता था जहां मुसाफिरों के लिए खाना बनता। महमदू ही वो शख्स है जिसने मशहूर लखनवी निहारी का आविष्कार भी किया था।
महमदू ने नवाब साहब के सामने जो शीरमाल परोसा था उसके आटे को पानी की जगह दूध में गूंथा, केसर और देसी घी मिलाया, फिर उसे तंदूर में पकाया। इस अनोखी रोटी का स्वाद और खुशबू नवाब गाजाउद्दीन हैदर को इतनी पसंद आई कि उन्होंने तुरंत इसे अपने शाही दस्तरख्वान का हिस्सा बना लिया था।
आज भी नवाब के नाम पर निकलता है निवाला
दिलचस्प बात यह है कि लखनऊ के कई पुराने बावर्ची आज भी शीरमाल को तंदूर में डालने से पहले उसका एक छोटा-सा टुकड़ा तोड़कर निकाल देते हैं। निवाला निकालने की यह परंपरा उस खास दिन की याद में निभाई जाती आ रही है, जब नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने पहली बार शीरमाल का एक टुकड़ा भर चखा था और उसके स्वाद के मुरीद हो गए थे।
