दोपहर तक राजस्थान की धरती धूप में तप रही थी। हवा में गर्म रेत थी और दूर तक फैली जमीन एक बूंद पानी की राह देख रही थी। फिर पश्चिम से बादल उठे। हवा का मिजाज बदला, पेड़ों की पत्तियां हिलीं और बिजली ने आसमान पर चमकती हुई लकीर खींच दी।
पहली बूंद गिरी तो मिट्टी की खुशबू पूरे आंगन में फैल गई।
कहीं मोर बोला। नीम की डाल पर झूला पड़ गया। हरे लहरिये, मेहंदी वाली हथेलियों और चूड़ियों की खनक के बीच ढोलक बजी। एक स्त्री ने गीत शुरू किया और धीरे-धीरे बाकी आवाजें भी उसके साथ जुड़ती चली गईं।
गीत में बादल था, लेकिन कहानी केवल बारिश की नहीं थी। उसमें पीहर की याद थी, परदेस गए पति का इंतजार था और भाई के लिए एक प्यार भरी पुकार थी- सावन आ गया है, अब मुझे लेने आओ।
आज भी कोई मौसम अचानक पुरानी तस्वीर, भूली हुई बातचीत या किसी खास इंसान की याद दिला देता है। उस दौर की स्त्रियों के लिए सावन भी कुछ ऐसा ही था- यादों का पूरा फोल्डर एक साथ खुल जाता था।
मरुधरा में बादल अपने साथ उम्मीद लाते हैं
जहां पानी हमेशा से अनमोल रहा हो, वहां बादल केवल मौसम नहीं बदलते। वे जिंदगी में नई उम्मीद लेकर आते हैं।
बारिश होगी तो खेतों में पड़े बीज जागेंगे, पशुओं को चारा मिलेगा, तालाब भरेंगे और कुओं का पानी ऊपर आएगा। इसलिए बादल दिखना सिर्फ ठंडी हवा आने की खबर नहीं था, जीवन के थोड़ा आसान हो जाने का भरोसा भी था।
राजस्थानी लोकगीतों में बादल कभी मेहमान बनकर आते हैं, कभी प्रिय की तरह पुकारे जाते हैं और कभी उनसे शिकायत होती है- इतनी उम्मीद जगाकर बिना बरसे क्यों चले गए?
बादल का यूं लौट जाना वैसा था, जैसे किसी ने मिलने का वादा किया हो और आप शाम तक उसकी राह देखते रह जाएं।
बादल कभी संदेश तो कभी विरह का प्रतीक हैं
पीहर यानी वह जगह, जहां वह फिर बेटी थी
शादी के बाद स्त्री का घर बदल जाता था, उसकी यादें नहीं। बादल घिरते ही उसे पीहर का आंगन याद आने लगता। वही पेड़, जिस पर बचपन में झूला पड़ता था। मां की रसोई, पिता का दुलार और बहनों-सखियों के साथ खुलकर हंसना।
पीहर उसके लिए केवल एक घर नहीं था। वह उसकी अपनी जगह थी- जहां उसे हर समय बहू या पत्नी की भूमिका में नहीं रहना पड़ता था। वहां वह कुछ दिन फिर से केवल बेटी बन सकती थी।
सावन और तीज के कई गीतों में यही मनुहार सुनाई देती है। बेटी अपने ‘बीरा’ यानी भाई को याद करती है। सीधे शब्दों में उसका भाव है- सबके भाई उन्हें लेने आ गए, तुम कब आओगे?
उस समय विवाहिता का अपनी इच्छा से पीहर चले जाना आसान नहीं था। उसे बुलावे या मायके से किसी के आने की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। इसलिए भाई का इंतजार केवल कोई सुंदर रस्म नहीं, स्त्री के जीवन की सच्चाई भी था।
सिंजारा कहता था- तुम हमें आज भी याद हो
तीज के आसपास पीहर से आने वाला सिंजारा केवल घेवर, मेहंदी, लहरिया और चूड़ियों की पोटली नहीं था। वह बेटी तक पहुंचा मायके का प्यार था। उसका सीधा-सा संदेश था- तुम दूर जरूर हो, लेकिन हमें आज भी याद हो।
जिसके घर सिंजारा पहुंचता, उसके आंगन में त्योहार उतर आता। जिसे लेने भाई आ जाता, उसके लिए पीहर का रास्ता भी गीत बन जाता। लेकिन जिसकी देहरी पर कोई नहीं आता, उसके लिए वही सावन एक धीमी शिकायत में बदल जाता।
मौसम जितना सुंदर, किसी की कमी उतनी गहरी
सावन को प्रेम और मिलन का मौसम माना जाता है, लेकिन राजस्थानी लोकगीतों में इसका सबसे गहरा रंग विरह का है। पति नौकरी, व्यापार, सैनिक सेवा या रोजी-रोटी के लिए दूर गया हो तो मौसम की हर चीज उसकी याद दिलाती थी। मोर की पुकार सुनकर लगता- काश, वह भी इसे सुन रहा होता। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए दूर तक रास्ता दिखता, लेकिन उसके बाद का अंधेरा और गहरा लगता।
शायद खूबसूरत मौसम अकेलेपन में ज्यादा मुश्किल होता है। आसपास पेड़ों पर झूले पड़े हों, सखियां गा रही हों और मिट्टी महक रही हो, लेकिन जिसके साथ यह सब बांटना था, वही पास न हो।
राजस्थानी गीत इस भावना को बहुत सीधी तरह से कहते हैं- सबको लेने कोई आया, मेरे आंगन की राह अब भी सूनी है।
प्रेम का संदेश लाता है ये पक्षी
कुरजां: जब एक पक्षी के हाथ भेजा गया संदेश
आज कोई दूर हो तो उसे मैसेज भेजा जा सकता है। कभी ऐसा संभव नहीं था। तब लोकगीतों ने बादलों और पक्षियों को मन की बात सौंप दी।
राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत कुरजां इसी विरह से जन्मा है। इसमें स्त्री कुरजा पक्षी को अपनी बहन की तरह संबोधित करती है और उससे कहती है कि वह उसके प्रिय तक संदेश पहुंचा दे। अलग-अलग इलाकों में इसके बोल बदलते हैं, लेकिन मूल भावना यही रहती है- दूर बसे प्रिय से मिला दो या कम से कम उसे मेरा हाल बता दो। ‘कुरजां’ लोकगीत का संकलित पाठ
यहां कुरजां केवल एक पक्षी नहीं रहता। वह दो दूर बैठे लोगों के बीच उम्मीद की डोर बन जाता है। वह उन रास्तों पर उड़ सकता है, जिन्हें स्त्री खुद पार नहीं कर सकती थी।
इसी तरह कुछ गीतों में कागा प्रिय के आने की खबर देता है, सुवा यानी तोता संदेश ले जाता है और मोर की आवाज मन में दबे विरह को फिर जगा देती है।
म्हाने आवे हिचकी: क्या वह भी मुझे याद कर रहा है
राजस्थानी लोकगीत 'म्हाने आवे हिचकी' एक बेहद प्यारे लोकविश्वास को भाव देता है। माना जाता था कि अचानक हिचकी आए तो कोई दूर बैठा आपको याद कर रहा है।
इस विश्वास का वैज्ञानिक आधार भले न हो, लेकिन विरह में डूबे मन को यह छोटी-सी उम्मीद देता था- शायद मैं ही उसे याद नहीं कर रही, वह भी मुझे याद कर रहा है।
आज किसी का नाम अचानक फोन की स्क्रीन पर दिख जाए तो एक पल को दिल की धड़कन बदल जाती है। उस समय हिचकी शायद वैसा ही संकेत थी- बिना किसी नोटिफिकेशन के आई किसी अपने की याद।
'हिचकी' के कई पारंपरिक और रिकॉर्डेड रूप मिलते हैं, जिनमें 'म्हाने आवे हिचकी' आज भी खूब सुना जाता है।
पीपली और सुपना: पेड़, सपना और अधूरा मिलन
लोकगीत पीपली में पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं रहता। उसके साथ स्त्री की प्रतीक्षा, स्मृतियां और प्रिय की याद जुड़ जाती हैं। लोकगीतों की दुनिया में पेड़ अक्सर उस साथी की तरह मिलता है, जिसने किसी को जाते भी देखा और लौटने की प्रतीक्षा भी की।
सुपना यानी सपने से जुड़े गीतों में वह मिलन संभव हो जाता है, जो असल जीवन में नहीं हो पाया। स्त्री सपने में अपने प्रिय से मिलती है, लेकिन आंख खुलते ही उसका साथ छूट जाता है। सपना कुछ पलों की खुशी देता है और टूटने के बाद विरह पहले से ज्यादा गहरा कर जाता है।
पीउ-पीउ बोले मोरियो: मोर बोला तो मन भी जाग उठा
सावन में मोर का बोलना धरती के लिए खुशी का संकेत है, लेकिन विरहिणी के लिए यही आवाज प्रिय की याद बन जाती है। पीउ-पीउ बोले पिया मोरियो जैसे गीतों में मोर की पुकार मौसम और मन को एक साथ जगा देती है। मोर ‘पीउ-पीउ’ बोल रहा है और स्त्री को हर आवाज में अपने ‘पिया’ का नाम सुनाई देता है।
यही लोकगीतों की खूबसूरती है- प्रकृति जो बोलती है, मन उसका अर्थ अपनी स्थिति के अनुसार निकाल लेता है। किसान को उसी आवाज में बारिश की खुशी सुनाई देती है और विरहिणी को अपने प्रिय की पुकार।
पणिहारी गीत: पानी की राह पर खुलती मन की गांठें
पणिहारी गीत उन स्त्रियों की दुनिया से निकले हैं, जो रोज पानी भरने के लिए कुएं या बावड़ी तक जाती थीं। सिर पर मटकी, सामने लंबा रास्ता और साथ में गांव की दूसरी स्त्रियां। पानी भरना मेहनत का काम था, लेकिन यही समय उन्हें घर की चारदीवारी से बाहर निकलने, सखियों से मिलने और खुलकर बातचीत करने का मौका भी देता था।
कुएं तक जाते हुए गाए गए इन गीतों में प्रेम, परिवार, हंसी-मजाक और रोजमर्रा की परेशानियां साथ चलती थीं। एक तरह से ये उस दौर की वॉइस नोट्स थीं- फर्क सिर्फ इतना था कि इन्हें फोन में नहीं, यादों में रिकॉर्ड किया जाता था।
स्त्रियों के मन के भाव हैं तीज के गीत
झूले की हर पींग में थोड़ी-सी आजादी थी
हरियाली तीज सावन के इन भावों को उत्सव में बदल देती है। पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, मेहंदी रचती है, लहरिया पहना जाता है और ढोलक पर गीत उठते हैं। झूले की हर ऊंची पींग रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से कुछ देर की छुट्टी जैसी थी।
तीज के गीतों में शिव-पार्वती का प्रेम भी है और पीहर जाने की इच्छा भी। श्रृंगार है, शिकायत है, सखियों की मस्ती है और शादीशुदा जीवन की खट्टी-मीठी बातें भी।
ये गीत किसी मंच पर वाहवाही पाने के लिए नहीं गाए जाते थे। वे साथ बैठने, हंसने और बिना किसी डर के मन की बात कहने का बहाना थे।
ढोलक के आसपास बनता था स्त्रियों का अपना संसार
इन लोकगीतों में स्त्रियां वह सब कह पाती थीं, जिसे सामान्य बातचीत में कहना आसान नहीं था। सास से शिकायत, ननद से नोकझोंक, पति की बेरुखी, मां की याद और भाई का इंतजार- हर भावना को गीत में जगह मिलती थी। इनमें केवल आंसू नहीं थे। हंसी, चुहल, व्यंग्य और रिश्तेदारों की मीठी खिंचाई भी खूब होती थी।
जब ढोलक पर कई आवाजें मिलती थीं तो किसी एक स्त्री का दुख केवल उसका नहीं रहता था। बाकी स्त्रियां भी उसमें अपनी कहानी पहचान लेती थीं। वह उस समय का अपना सपोर्ट सिस्टम था- बिना ग्रुप चैट और ऑनलाइन कम्युनिटी के।
ढोला-मारू: सदियों पुरानी लॉन्ग डिस्टेंस लव स्टोरी
राजस्थान की प्रसिद्ध प्रेमकथा 'ढोला-मारू' में भी दूरी, संदेश और लंबे इंतजार की कहानी मिलती है। मारू अपने बचपन के साथी ढोला से बिछुड़ी हुई है। उसके संदेश ढोला तक नहीं पहुंच पाते। आखिरकार लोकगायक उसकी बात लेकर उसके पास जाते हैं।
यहां गीत केवल मनोरंजन नहीं, दो बिछुड़े लोगों को मिलाने का माध्यम बन जाता है।
ढोला-मारू की मारू और सावन गीतों की विरहिणी लगभग एक ही सवाल पूछती हैं कि जब खुद प्रिय तक नहीं पहुंच सकते तो अपने मन की बात किसके हाथ भेजें?
मीरा का सावन: बूंदों में सुनाई देती हरि के आने की आहट
मीरा के पद 'बरसै बदरिया सावन की' में सावन का एक अलग रंग दिखाई देता है। यहां प्रतीक्षा किसी सांसारिक प्रिय की नहीं, कृष्ण की है। मीरा कहती हैं कि सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की। बादलों का उमड़ना और रिमझिम बूंदों का गिरना उन्हें हरि के आने का संकेत लगता है।
मीरा का पद बरसै बदरिया सावन की - लोकगीत की स्त्री अपने पति को पुकारती है और मीरा कृष्ण को। प्रिय का स्वरूप बदल जाता है, लेकिन प्रतीक्षा की बेचैनी वही रहती है। दोनों के लिए सावन मन में खाली पड़ी किसी जगह को फिर से जगा देता है।
ये गीत उस दौर की अनफिल्टर्ड डायरी थे
राजस्थानी लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं थे। वे उन स्त्रियों की अनफिल्टर्ड डायरी थे, जिनके पास शायद कागज पर अपनी जिंदगी दर्ज करने का अवसर नहीं था।
जो बात अकेले कहने पर शिकायत मानी जा सकती थी, वह सामूहिक गीत में आसानी से कही जा सकती थी। यहां स्त्री केवल दुखी और असहाय दिखाई नहीं देती। वह मजाक करती है, सवाल पूछती है, नाराज होती है और अपने रिश्तों में अपना अधिकार भी मांगती है।
धुनें बच गईं, क्या उनके पीछे का आंगन भी बचेगा
आज पीहर जाने के लिए बादल या कुरजां के हाथ संदेश भेजने की जरूरत नहीं है। एक वीडियो कॉल में मां का चेहरा दिखाई देता है और भाई तक कुछ सेकंड में मैसेज पहुंच जाता है।
सोशल मीडिया और डिजिटल रिकॉर्डिंग ने पुराने गीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया है। मांगणियार, लंगा और दूसरे लोक कलाकार इन धुनों को दुनिया भर के मंचों तक ले जा रहे हैं। पुराने गीत नए संगीत और रीमिक्स के साथ भी सुने जा रहे हैं।
सावन के मौसम नहीं मन के हर भाव का चित्रण है
लेकिन सवाल यह है कि गीत के साथ उसकी कहानी भी बचेगी या नहीं।
क्या वह आंगन याद रहेगा, जहां दादी से मां और मां से बेटी ने गीत सीखा था? क्या वह कुआं याद रहेगा, जिसकी राह पर पणिहारी गीत जन्मे? क्या सिंजारे में रखा लहरिया देखकर बेटी के मन में जागने वाली पीहर की याद भी अगली पीढ़ी समझ पाएगी?
बारिश थम चुकी है। भीगी मिट्टी की खुशबू अब भी आंगन में है। नीम की डाल से बंधा झूला हवा में धीरे-धीरे हिल रहा है। स्त्रियां अपने घर लौट चुकी हैं, लेकिन गीत की आखिरी टेक जैसे वहीं ठहरी हुई है-
सावन आ गया है बीरा, अब मुझे लेने आओ।
दौर बदल गया है, लेकिन घर लौटने की इच्छा, किसी अपने की याद और प्रतीक्षा की टीस आज भी वैसी ही है। शायद इसीलिए राजस्थानी सावन गीत पुराने होकर भी पुराने नहीं लगते। उनकी बोली अलग हो सकती है, लेकिन उनके एहसास आज भी पूरी तरह अपने लगते हैं।
