रघुपति राघव राजा राम किसने लिखा था, क्या महात्मा गांधी ने जोड़ा- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम? आखिर क्या है पतित पावन सीता राम का मतलब
Raghupati Raghav Raja Ram Meaning in Hindi, Mahatma Gandhi Death Anniversary: महात्मा गांधी ने 1930 में दांडी मार्च के दौरान ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान का राग अलापा तो लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, हर कोई इस राम धुन पर एक साथ झूमता दिखा। वहां से बापू ने इस भजन को मजहबी एकता का हथियार बनाया और अपनी सभाओं में शामिल कर लिया।
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 30, 2026, 09:56 AM IST
Raghupati Raghav Raja Ram: 30 जनवरी 1948 की तारीख। समय शाम के 5 बजकर 17 मिनट। नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में एक के बाद एक तीन गोलियों की आवाज सुनाई दी। गोली चलाने वाला शख्स था नाथू राम गोडसे और निशाना थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी। गोडसे की बंदूक से निकली गोली ने 78 साल के निहत्थे बापू के प्राण छीन लिये। महात्मा गांधी के आखिरी शब्द थे हे राम। अपना सभाओं में राम धुन से लोगों में एकता की अलख जगाने वाले बापू राम का नाम लेते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए।
कौन सी राम धुन गाते थे बापू
महात्मा गांधी का मानना था कि जब साधारण सा लड्डू भगवान को चढ़ाने के बाद प्रसाद बन जाता है तो फिर इंसान भी ईश्वर का स्मरण कर पवित्र हो सकता है। इसी कारण वह अपनी सभाओं में अकसर एक खास राम धुन गाया करते थे। आइए जानते हैं क्या थी यह राम धुन:
रघुपति राघव राजा राम
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान
राम रहीम करीम समान
हम सब हैं उसकी संतान
सब मिल मांगे यह वरदान
रहे हमारा मानव ज्ञान
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
महात्मा गांधी की राम धुन (Photo: AI Image)
यह राम धुन बापू की सभाओं में नियमित रूप से गाई जाती थी। भजन का मकसद था कि लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया जाए। उन दिनों जिस तरह से हिंदू-मुसलमान मजहब के नाम पर एक दूसरे से नफरत पाले हुए थे, तब यह भजन उन्हें एक सूत्र में पिरोने का काम करता था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये भजन किसने लिखा था? क्या गांधी जी ने खुद यह राम धुन लिखी थी या फिर किसी और का लिखा गाते थे?
किसने लिखा था रघुपति राघव राजा राम
रघुपति राघव राजा राम की रचना को लेकर कई तरह के दावे किये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि मराठी संत स्वामी रामदास ने 17वीं सदी में इसकी रचना की थी। वहीं कुछ लोग मानते हैं कि भक्ति साहित्य के प्रतिष्ठित नाम पंडित लक्ष्मणाचार्य ने यह राम धुन लिखी थी। एक मत यह भी है कि यह भजन गोस्वामी तुलसीदास का है। इस बात का दावा करने वाले कहते हैं कि तुलसीदास एक बार गुजरात के डाकोर स्थित विष्णु मंदिर पहुंचे। मंदिर में भगवान की प्रतिमा के सामने खड़े होकर तुलसीदास प्रार्थना करने लगे कि उन्हें नारायण के दर्शन श्रीराम के रूप में हों। कहा जाता है कि जब तक उन्हें श्रीराम के दर्शन नहीं हुए, वह इसी राम धुन को गाते रहे।
किसने लिखा था रघुपति राघव राजा राम?
इन दावों में से क्या सही है इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। लेकिन एक बात पुख्ता तौर पर कही जाती है कि गांधी जी जो राम धुन गाते थे वो वह मूल भजन से अलग थी। ज्यादातर लोग मानते हैं कि पंडित लक्ष्मणाचार्य ने इस भजन को लिखा था और गांधीजी उन्हीं के लिखे मूल भजन को संशोधित करके गाया करते थे।
क्या थे रघुपति राघव राजा राम के मूल शब्द
गांधी जी ने जब इस भजन को अपनी सभाओं में गाना शुरू किया तो उससे पहले भी यह भजन लोगों के बीच गाए गुनगुनाए जाते थे। हालांकि उस भजन में शब्द कुछ और थे। आइए पढ़ें मूल भजन क्या था:
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीता राम
क्या गांधी जी ने बदला था रघुपति राघव राजा राम भजन
इस भजन की मूल रचना में 'सुंदर विग्रह मेघाश्याम, गंगा तुलसी शालीग्राम' लिखी गई थी। गांधी जी इस भजन की जो प्रति गाते थे उसमें सुंदर विग्रह मेघाश्याम, गंगा तुलसी शालीग्राम की जगह ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान आता था।
कहा जाता है कि गांधीजी ने इस लोकप्रिय भजन को संशोधन के साथ अपनी सभाओं में इस्तेमाल किया। हालांकि इस बात के साक्ष्य कहीं नहीं मिलते कि गांधीजी ने ही इस भजन के मूल स्वरूप को बदला था। उनसे पहले भी भजन का यह संशोधित रूप था या नहीं ये पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह तय है कि भजन के इस नए स्वरूप को बापू के कारण ही लोगों के बीच मान्यता और स्वीकृति मिली।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान (Photo: AI Image)
महात्मा गांधी ने 1930 में दांडी मार्च के दौरान ईश्वर अल्लाह तेरों नाम, सबको सन्मति दे भगवान का राग अलापा तो लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, हर कोई इस राम धुन पर एक साथ झूमता दिखा। वहां से बापू ने इस भजन को मजहबी एकता का हथियार बनाया और अपनी सभाओं में शामिल कर लिया।
बॉलीवुड पर चढ़ा 'रघुपति राघव राजा राम' का रंग
इस भजन की लोकप्रियता का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि बॉलीवुड ने भी इसका बार-बार इस्तेमाल किया। खासतौर पर 1947 में विभाजन के बाद की हिंदी फिल्मों में इसने लोगों की भावनाओं को काफी हद तक प्रभावित किया।
बॉलीवुड में सबसे पहले रघुपति राघव राजा राम सुनाई दिया साल 1942 में आई फिल्म भरत मिलाप में। इसके बाद श्री राम भक्त हनुमान(1948), जागृति(1954) और पूरब और पश्चिम(1970) जैसी कई फिल्मों में इस भजन का इस्तेमाल हुआ। 8 दशकों से भी ज्यादा समय तक यह भजन बॉलीवुड की फिल्मों में अलग-अलग तरह से दिखता रहा है। आखिरी बार यह साल 2025 में आई फिल्म वनवास में सुनाई दिया।
बॉलीवुड और रघुपति राघव राजा राम
मिलेनियल्स के बीच कैसे पॉपुलर हुआ यह भजन
मिलेनियल्स के बीच गांधी जी के इस भजन को पॉपुलर करने का श्रेय 1998 में आई करण जौहर की फिल्म कुछ कुछ होता है को भी काफी हद तक जाता है। फिल्म में विदेश से लौटी स्टाइलिश टीना(रानी मुखर्जी) राहुल (शाहरुख खान) को इम्प्रेस करने के लिए बापू का वही भजन रघुपति राघव राजा राम गाती है।
फिल्म में इस भजन का रीमिक्स और फंकी रैप वर्जन भी था। इस वर्जन ने युवाओं के दिल जीत लिये थे। करण जौहर ने इस नए वर्जन में कुछ हिप्पियों को रघुपति राघव राजा राम गाते दिखाया। दरअसल 60-70 के दशक से हिप्पियों को शांति का प्रतीक माना जाता है। तब इन्हीं हिप्पियों ने अमेरिका वियतनाम युद्ध के दौरान शांति और अहिंसा का मशहूर आंदोलन चलाया था जिसे दुनिया आज 'फ्लावर पावर मूवमेंट' के नाम से जानती है। ये हिप्पी सैनिकों और दूसरे लोगों को फूल देकर गांधीजी के अहिंसा की राह पकड़ने की विनती करते थे। इस मूवमेंट का खूब असर पड़ा था।
अमेरिका में मची रघुपति राघव की धूम
साल 1963 की बात है। मशहूर अमेरिकन सिंगर और सोशल एक्टिविस्ट पीटर सीगर कोलकाता आए थे। यहां उनका एक म्युजिकल कॉन्सर्ट था। पीटर सीगर महात्मा गांधी के बड़े प्रशंसक और फॉलोवर थे। उन्होंने लाइव परफॉर्मेंस के दौरान स्टेज से रघुपति राघव राजा राम गाया। यह भजन सुनते ही वहां मौजूद सैकड़ों की भीड़ झूम उठी। पीटर को इस भजन के जादू का शायद अंदाजा था।
अमेरिकी सिंगर पीट सीगर ने भी गाया रघुपति राघव
जब पीटर कोलकाता से अपने वतन अमेरिका लौटे तो उन्होंने महात्मा गांधी के रघुपति राघव को फिर से रिकॉर्ड किया और 1964 में अपने नए एल्बम में Strangers and Cousins में भी शामिल किया। एल्बम रिलीज हुआ तो चार्टबस्टर साबित हुआ। अमेरिका में भी इस भजन को खूब पसंद किया गया।
आज भी क्यों जरूरी है 'रघुपति राघव राजा राम'
महात्मा गांधी जो यह राम धुन गाते थे उसका संदेश आज हर हिंदुस्तानी तर पहुंचना बहुत जरूरी है। दरअसल जिस तरह से बड़ी संख्या में हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, उन्हें शायद यह भजन एकता का पाठ पढ़ा सके। इस भजन में सीख है कि ईश्वर के नाम भले ही अलग हों, लेकिन उसकी सत्ता और करुणा एक ही है। राम और अल्लाह को एक ही पंक्ति में रखकर यह भजन धर्मों के बीच खींची गई दीवारों को तोड़ता है और मानवता को सबसे ऊपर रखता है।
नफरत की दीवार तोड़ती है ये राम धुन (Photo: AI Image)
आज जब लोगों के बीच धर्म और मजहब के नाम पर नफरत बढ़ती जा रही है तब यह भजन उस विचार की लौ को तेज करता है कि धर्म का उद्देश्य जोड़ना है, तोड़ना नहीं। कोई धर्म छोटा या बड़ा नहीं है। कोई महान या दोयम नहीं है। सब एक समान हैं। सच्चा धर्म वही है, जो सबको सन्मति, शांति और न्याय की राह पर ले जाए। तो हमेशा यह बात याद रखें कि इंसान पहले है, धर्म बाद में। इसी सीख के साथ आप भी सुनें देश को एक धागे में पिरोने वाला भजन- रघुपति राधव राजा राम:
