Shayari of The Day (आज की शायरी): कहते हैं कि जब अपने जज्बात जाहिर करने को अल्फाज कम पड़ते हैं तो शायरी काम आती है। शायरी के जरिए भारी से भारी बात भी बड़ी आसानी से कह दी जाती है। बहुत से नामचीन शायरों ने इंसानी जज्बातों को बयां करने वाले एक से बढ़कर एक शेर लिखे हैं। आज की शायरी में आइए पढ़ें मोहसिन नकवी का एक बेहद मशहूर शेर:
आज की शायरी (Shayari of The Day)
"सिर्फ़ हाथों को न देखो कभी आंखें भी पढ़ो
कुछ सवाली बड़े ख़ुद्दार हुआ करते हैं"
इस शेर का भाव यह है कि किसी इंसान को परखते समय केवल उसकी बाहरी हालत या हालात को देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। शायर कहता है कि अगर कोई मदद मांग रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि वह भीतर से कमजोर या आत्महीन हो। कई बार हालात इंसान को हाथ फैलाने पर मजबूर कर देते हैं, लेकिन उसका स्वाभिमान और आत्मगौरव अब भी जीवित रहता है।
लोग अकसर मदद मांगने वाले व्यक्ति को कमतर समझ लेते हैं। लेकिन मोहसिन नकवी इस सोच को चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि कुछ सवाली ऐसे भी होते हैं जो बेहद ख़ुद्दार होते हैं, यानी जिनके भीतर गहरी आत्मसम्मान की भावना होती है। वे मजबूरी में मदद मांगते हैं, आदत या लालच में नहीं।
शेर हमें यह सिखाता है कि इंसान की असली स्थिति उसकी आंखों में झलकती है। आंखें वो सच कह देती हैं जो शब्द नहीं कह पाते। किसी की आंखों में झलकती उम्मीद, संकोच या दर्द यह बता सकता है कि वह व्यक्ति कितनी मजबूरी में खड़ा है। ऐसे लोगों के लिए मदद लेना भी एक मानसिक संघर्ष होता है।
मोहसिन नकवी के मशहूर शेर:
1. हर वक़्त का हंसना तुझे बर्बाद न कर दे
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर
2. कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूं लगते हो
3. यूं देखते रहना उसे अच्छा नहीं 'मोहसिन'
वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें
4. तुम्हें जब रू-ब-रू देखा करेंगे
ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे
5. कल थके-हारे परिंदों ने नसीहत की मुझे
शाम ढल जाए तो 'मोहसिन' तुम भी घर जाया करो
6. वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था
कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है
7. ये किस ने हम से लहू का ख़िराज फिर माँगा
अभी तो सोए थे मक़्तल को सुर्ख़-रू कर के
8. कितने लहजों के ग़िलाफ़ों में छुपाऊँ तुझ को
शहर वाले मिरा मौज़ू-ए-सुख़न जानते हैं
9. वो अक्सर दिन में बच्चों को सुला देती है इस डर से
गली में फिर खिलौने बेचने वाला न आ जाए
10. ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी
11. जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ
अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ
12. अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता
भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें
