मिर्जा गालिब..उर्दू शायरी का सबसे मुक्कमल नाम। हिंदुस्तान के लिए तो शेर-ओ-शायरी का पर्याय है यह नाम। दरअसल गालिब एक ऐसी अमर रूह का नाम है जिसने दर्द को भी खूबसूरती में बदल दिया। उनकी शख्सियत में फकीरी भी थी और नवाबी ठाठ भी। मिर्जा गालिब ने शायरी और नज्मों की जो दुनिया बुनी उसमें दर्द, इश्क, हाजिरजवाबी और जिंदगी के फलसफे सब एक साथ दिखाई देते हैं।
वे जितने बड़े शायर थे, उतने ही जिंदादिल इंसान भी। मुश्किल हालात, आर्थिक तंगी और निजी दुखों के बावजूद उनकी हाजिरजवाबी कभी कम नहीं हुई। गालिब जिंदगी को सिर्फ जीते नहीं थे, उसे महसूस करते थे। शायद यही वजह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी उनके अशआर आज भी दिलों में उसी तरह धड़कते हैं, जैसे पुरानी दिल्ली की किसी शाम में जलता हुआ धीमा चिराग।
मिर्जा गालिब को शायरी के अलावा अगर किसी चीज से सबसे ज्यादा मोहब्बत थी, तो वह थे आम। रसीले, मीठे और स्वादिष्ट आमों के लिए उनका प्रेम इतना गहरा था कि उनके खतों, किस्सों और दोस्तों की यादों में इसका जिक्र बार-बार मिलता है।
गालिब के लिए आम उनके जीवन के आनंद और दिलकश मिजाज का हिस्सा बन चुका था। आम का मौसम शुरू होने से पहले ही गालिब अपने दोस्तों और चाहने वालों को खत लिखकर याद दिलाना शुरू कर देते थे कि आम भेजना मत भूलना। उनके शागिर्द और जीवनीकार ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली ने अपनी किताब यादगार ए गालिब में भी गालिब के आम प्रेम का जिक्र किया है। हाली खुद हर साल टोकरियों में भर-भरकर उन्हें आम भेजा करते थे।
गालिब की रगों में बहती थी आम की मिठास
गालिब के उपलब्ध खतों में से एक खत में आम का जिक्र कुछ यूं है-
"मेरी मेज सजी रहे और मेरी रूह को भी तस्कीन मिले, और यह दोनों बातें आमों से ही पूरी हो सकती हैं।"
आम के बारे में गालिब की सोच भी बेहद दिलचस्प थी। एक बार मौलाना फजले हक ने उनसे पूछा कि अच्छा आम कैसा होना चाहिए। गालिब ने तुरंत जवाब दिया - एक तो मीठा हो और दूसरा भरपूर हो। यानी आम कम नहीं, दिल खोलकर मिलने चाहिए।
बहादुर शाह जफर, गालिब और आम
गालिब की आम के लिए चाहत और उनकी हाजिरजवाबी का एक दिलचस्प किस्सा आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के साथ भी जुड़ा है। हुआ यूं कि आषाढ़ महीने की किसी सुबह बादशाह दिल्ली के लाल किले में अपने कुछ कारिंदों के साथ आम के बाग में टहल रहे थे, गालिब भी साथ थे। पेड़ों पर तरह-तरह के आम लगे थे। ये आम केवल बादशाह और शाही परिवार के सदस्यों को ही मयस्सर थे।
थोड़ी देर में बादशाह ने देखा कि गालिब कहीं पीछे रह गए हैं और वे पेड़ पर लगे आमों को छू-छू कर देख रहे हैं। बादशाह ने पूछा- ये आप क्या कर रहे हैं मिर्जा नौशा? इस पर गालिब ने मुस्कुराते हुए कहा - सुना है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। यह जवाब सुन बादशाह चौंके और पूछा- तो?? गालिब तुरंत बोल पड़े- तो मैं देख रहा हूं कि किसी आम पर मेरे बाप-दादों या मेरा नाम लिखा है कि नहीं।
शाही बाग से गालिब के लिए आते थे आम
गालिब की यह बात सुनकर बादशाह भी हंसे बिना नहीं रह सके और विदा होते समय उन्हें टोकरियों भर आम भेंट किए। इसके बाद तो रवायत सी बन गई कि हर साल आम के मौसम में बादशाह गालिब को आम भेजना नहीं भूलते थे।
पेंशन तो नहीं मिली, आम खूब मिले
गालिब को यूं तो हर तरह के आम पसंद थे लेकिन बंगाल के मालदा आम उनके दिल के बेहद करीब रहे। ब्रिटिश हुकूमत में कुछ समय बाद जब अंग्रेजी सरकार ने उनकी पेंशन रोक दी, तब वह उसे दोबारा शुरू करवाने के सिलसिले में एक बार कोलकाता गए। कंपनी के अफसरों से कई दिन तक बात करने के बाद भी पेंशन तो नहीं मिली, लेकिन आम खूब मिले। कोलकाता में गालिब के मेजबान मिर्जा अली सौदागर ने उन्हें तरह-तरह के आम खिलाए, जिनमें मालदा के प्रसिद्ध आम भी शामिल थे।
आम के लिए चुनते थे लंबा रास्ता
पेंशन के चक्कर में उन्हें अकसर दिल्ली से कलकत्ते जाना पड़ता था। तमाम किताबों में जिक्र है कि गालिब जान-बूझकर लंबा रास्ता तय करते थे और लखनऊ होते हुए जाते थे। वह लंबा रास्ता सिर्फ आम के लालच में चुनते। लखनऊ में दशहरी आम खूब मिलते थे। इसी कारण से वह लखनऊ होते हुए कलकत्ता जाते। दसहरी भी गालिब के पसंदीदा आमों में शुमार था।
आम के लिए लखनऊ होकर कलकत्ता जाते थे मिर्जा
आम और गालिब की खास दावत
लखनऊ हमेशा से तहजीब, खाने-पीने और मेहमाननवाज़ी के लिए ही मशहूर रहा है। यहां की फिज़ाओं में आम के प्रति एक खास दीवानगी भी घुली रहती थी। कभी इस शहर में ‘आम और ग़ालिब’ के नाम से खास महफिलें सजाई जाती थीं, जहां आम और अदब का खूबसूरत संगम देखने को मिलता था।
इन महफिलों में शहर के नामचीन शायर और शायराएं एक जगह जमा होते, स्वादिष्ट आमों का लुत्फ उठाते और शेर-ओ-शायरी के रंग बिखेरते थे। यह दावत से कहीं ज्यादा अदब और जायके का जश्न हुआ करता था। आम की ये खास महफिल मिर्जा गालिब की याद और आम के लिए उनकी मोहब्बत को समर्पित की जाती थीं।
'गधे आम नहीं खाते..'
गालिब की सोहबत में जो कोई रहता वह भी आम खाना पसंद करता। जो नहीं करता वो कुछ दिनों की बैठकी में करने लगता। लेकिन मिर्जा के एक खास मित्र इस मामले में अलग थे। गालिब के इन मित्र का नाम था हकीम रजीउद्दीन खान। वह गालिब के दोस्त और हकीम दोनों थे। रजीउद्दीन को आम बिल्कुल पसंद नहीं थे। वो गालिब को भी आम खाने से मना करते थे।
बेशक, गधे आम नहीं खाते..
हकीम रजीउद्दीन खान और आम से जुड़ा एक मजेदार किस्सा बहुत मशहूर है। आगरा में किसी एक शाम गालिब और रजीउद्दीन के बीच आम पर बहस चल रही थी। तभी चौखट के बाहर सड़क से कुछ गधे गुजरे और आम के छिलकों को सूंघकर आगे बढ़ गए। हकीम साहब तुरंत बोले - देखें, गधे तक आम नहीं खाते। गालिब तो गालिब ठहरे। तुरंत पलकर जवाब दिया- हां देख रहा हूं, बेशक गधे आम नहीं खाते। गालिब की याद में सजने वाली महफिलों में आज भी ये किस्सा खूब याद किया जाता है।
जब मिर्जा को खलने लगा आम ना खाने का मलाल
उम्र बढ़ने के साथ गालिब की परेशानियां भी बढ़ने लगी थीं। उन्हें अपनी सेहत से ज्यादा उतने आम ना खा पाने का दर्द ज्यादा था। उम्र में 60 साल की दहलीज पार करने के बाद गालिब ने अपने एक अजीज दोस्त को खत लिखकर बताया था कि, 'अब पहले की तरह ढेर सारे आम नहीं खा पाता। अब एक बैठक में दस-बारह ही खा पाता हूं। अगर बड़े आम हों तो मुश्किल से छह-सात। अफसोस जवानी के दिन बीत गए, बीतने ही थे, अब तो जिंदगी के दिन भी खात्मे की ओर हैं।'
गालिब की 'आम' नज्म
गालिब का आम प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने आमों पर एक मसनवी (लंबी कविता) भी लिखी, जिसका नाम था - दर-सिफ़त-ए-अम्बा। मिर्जा गालिब ने यह कविता फारसी में लिखी थी। 1855 के आसपास लिखी गई यह कविता आम के स्वाद, रंग और गुणों का बखान करती है। इसमें गालिब ने आम की तारीफ बेहद कलात्मक और हास्यपूर्ण अंदाज में किया है।
मिर्जा गालिब की दर-सिफ़त-ए-अम्बा का हिंदी भावानुवाद इस प्रकार है:
दिल अगर दर्द और सुरों से भरा हो,
तो फिर वह राज़ों का खज़ाना क्यों न खोले।
कलम का कागज़ पर बहना ऐसा है,
जैसे फूलों की डाल पर फूल खिलना।
मुझसे पूछते हो क्या लिखूं?
तो ऐसी बातें लिखूं जो बुद्धि को बढ़ाएं।
लेकिन चलो, आमों का ही ज़िक्र हो जाए,
और कलम खजूर की डाल की तरह रस बरसाए।
आम के मुकाबले कौन ठहर सकता है?
उसकी डाल और फल मानो चौगान और गेंद हों।
बेल क्यों मन में अरमान रखे,
मैदान भी यही है और गेंद भी यही।
आम के आगे बेल तो धूल चाटती है,
जलन में उसके फफोले पड़ जाते हैं।
जब अंगूर किसी काम का न रहा,
तो मजबूरी में शराब बन गया।
यह भी दिल हारने जैसा है,
शर्म से पानी-पानी हो जाना।
मुझसे पूछो, तुम्हें क्या खबर,
आम के सामने गन्ने की क्या औकात!
उसमें न फूल हैं, न डालियां, न फल,
पतझड़ आए तभी उसकी बहार आती है।
और तुलना कहां तक करोगे?
इतनी मिठास तो प्राणों में भी नहीं।
अगर आत्मा में इतनी मिठास होती,
तो फ़रहाद ग़म में भी खुश रहता।
जान देने में वह बेमिसाल था,
पर इतनी आसानी से जान न देता।
मुझे तो यह फल ऐसा लगता है,
मानो सृष्टि के दवाखाने में
फूलों की आग पर शक्कर पकाई गई हो,
और रस की डोर से इसका रेशा बना हो।
या फिर जन्नत के बागों से
फरिश्तों ने शहद से भरे बंद मर्तबान भेजे हों।
या ख़िज्र ने अमृत से इसे सींचा हो,
तभी यह पेड़ इतना अद्भुत फल देता है।
वरना हम कहां और यह पेड़ कहां!
किसी बादशाह के पास सोने जैसा संतरा था,
रंग तो पीला था पर उसमें न खुशबू थी, न रस।
अगर वह एक बार आम देख लेता,
तो अपना सोने का फल फेंक देता।
आम पत्तों और स्वाद की दुनिया की रौनक है,
हवा और पानी की नस्ल का अभिमान है।
जन्नत की राह चलने वालों का यह राशन है,
तूबा और सिदरा के पेड़ों का प्यारा अंश।
आम डालियों, पत्तों और फलों का राजा है,
और बसंत का दुलारा है।
खासकर वह आम जो सस्ता न हो,
जो शाही बागों की डाल पर पला हो।
और अंत में गालिब अपने संरक्षक की प्रशंसा करते हुए दुआ देते हैं कि
ईश्वर उन्हें हमेशा खुश और समृद्ध रखे
और गालिब पर भी उनकी कृपा बनी रहे।
गालिब की जान शायरी में बसती थी। अगर शायरी के बाद किसी और चीज को उन्होंने अपनी रूह में उतारा तो वह थे आम। उनकी शायरी में भी आम की मिठास और मौसमों का रंग साफ महसूस किया जा सकता है।
शराब शायरी और आम, यूं हुई गालिब की जिंदगी तमाम
गालिब जिंदगी के हर मौसम को पूरे शौक और दिलदारी के साथ जीने वाले इंसान थे। लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा इंतजार गर्मी के मौसम का होता। दरअसल यही मौसम उनके लिए आम लेकर आता। गालिब आम की महफिलें रोशन किया करते। दोस्तों के बीच बैठकर आम खाना, बातें करना और शेरो-शायरी का दौर चलाना, ताउम्र गालिब की सबसे पसंदीदा अदाओं में शुमार रहा।
अंत में यही कहेंगे कि गर्मियों की आमद हो, आम का जिक्र हो और मिर्जा गालिब से जुड़ा ये शेर याद न आए तो कैसे अदब-पसंद हुए हम:
मुझसे पूछो तुम्हें ख़बर क्या है
आम के आगे नेशकर क्या है..
