सोशल मीडिया का प्रेशर और रियल लाइफ का तनाव, कुछ यूं सुकून छीनने लगे हैं त्योहार

क्या त्योहार अब खुशियों का जरिया कम और दिखावे की प्रतियोगिता ज्यादा बन गए हैं? महंगे गिफ्ट्स, सोशल मीडिया की परफेक्ट रील्स और लोगों की उम्मीदों के दबाव में हम अक्सर अपनी असली खुशी भूल जाते हैं।

त्योहारों का मतलब अपनों के साथ खुशियां बांटना, मेल-जोल बढ़ाना और सुकून के पल बिताना होता है। लेकिन आजकल त्योहार असली खुशी देने के बजाय एक प्रतियोगिता जैसे लगने लगे हैं। महंगी गिफ़्टिंग, घर की सजावट और सोशल मीडिया पर परफेक्ट तस्वीरें शेयर करने की होड़ ने त्योहारों के असली मायने ही बदल दिए हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, 'लोग क्या कहेंगे' की इस मानसिकता ने फेस्टिव सीजन को तनाव और दिखावे का जरिया बना दिया है।

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सोशल मीडिया का प्रेशर और रियल लाइफ का तनाव, कुछ यूं सुकून छीनने लगे हैं त्योहार (AI Generated and newsroom verified image)

पहले लोग त्योहारों पर दिल से मिलते थे, लेकिन अब सब कुछ स्टेटस सिंबल बन गया है। हर कोई पड़ोसी, रिश्तेदार या कजिन से बेहतर दिखने की होड़ में लगा रहता है। इस दिखावे के चक्कर में लोग अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च कर देते हैं और मानसिक शांति खो बैठते हैं।

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