कभी सिनेमा हॉल, कभी मॉल का ट्रायल रूम तो कभी ऑफिस के खाली पड़े सोफे। ये तीनों जगहें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन आज की एक पीढ़ी ने इन्हें एक धागे से जोड़ दिया है। आराम के लिए। रोने के लिए। कुछ मिनट सो लेने के लिए।
क्यों काम से ब्रेक लेकर सोने में नहीं झिझक रही जेन Z (Photo: iStock)
हाल ही में सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें ऑफिस जाने वाली Gen Z पीढ़ी काम के दबाव से कुछ वक्त चुरा झपकी लेते दिखाई देते हैं। कोई ऑफिस के वेटिंग एरिया में लगे खाली सोफे पर झपकी ले लेता है तो कोई रेस्ट रूम में जाकर कुछ देर अकेला बैठ जाता है। कोई कार पार्किंग में खड़ी अपनी कार में आंखें बंद कर लेता है तो कोई कैंटीन में सुस्ताता दिख जाता है।
कुछ तो बाकायदा हाफ डे का ब्रेक लेकर पास के सिनेमाहॉल या फिर मॉल पहुंच जाते हैं। वहां ट्रायल रूम जैसे एकांत या फिर सिनेमाघर के अंदर जाकर कुछ मिनट की सुकून भरी नींद ले रहे हैं।
पहली नजर में यह काम से जी चुराना और आलस जैसा लगता है, लेकिन मनोवैज्ञानिक इसे एक अलग नजर से देख रहे हैं। दरअसल, यह सिर्फ नींद की कमी नहीं है। यह लगातार 'ऑन' रहने की थकान है। ऐसे में हमें समझना होगा कि ऑफिस से भाग नहीं रही Gen Z। वो तो बस थोड़ी देर के लिए दुनिया से 'लॉग आउट' होना चाहती है।
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Gen Z सुबह आंख खुलके साथ ही मोबाइल की स्क्रीन पर लग जाती है। ऑफिस का काम लैपटॉप पर चलता है। दोस्ती मोबाइल पर। मनोरंजन भी स्क्रीन पर। यहां तक कि आराम करने का तरीका भी किसी ऐप से तय होता है। ऐसे में दिमाग को वह खाली जगह ही नहीं मिलती, जहां वह कुछ मिनटों के लिए खुद को रीसेट कर सके।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की कई बड़ी कंपनियां अब इस जरूरत को समझ रही हैं। जापान में 'इनमुरी' यानी सार्वजनिक जगह पर थोड़ी देर झपकी लेना लंबे समय से मेहनती लेबर की पहचान माना जाता रहा है। अमेरिका और यूरोप की कई कंपनियों ने 'नैप पॉड' तक बनाए हैं, क्योंकि शोध बताते हैं कि 15 से 20 मिनट की छोटी नींद ध्यान, निर्णय क्षमता और रचनात्मकता बढ़ा सकती है।
लेकिन Gen Z की कहानी सिर्फ नींद तक सीमित नहीं है। वह थकान को छिपाना नहीं चाहती। अगर रोना आता है, तो वह रो लेती है। अगर मानसिक रूप से थक गई है, तो छुट्टी मांग लेती है। अगर काम के बीच आधे घंटे का ब्रेक चाहिए, तो वह उसे कमजोरी नहीं मानती।
यही बात पुरानी पीढ़ियों को असहज करती है। उनके लिए नौकरी का मतलब था चुपचाप काम करना, चाहे भीतर कितना भी दबाव क्यों न हो। Gen Z इस नियम को बदल रही है। उसके लिए मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है, जितना मासिक वेतन।
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Gen Z की इस लाइफस्टाइल ने इस सवाल को हवा दे दी है कि क्या हमारे वर्कप्लेस इंसानों के लिए बने हैं या मशीनों के लिए? अगर कोई कर्मचारी ऑफिस में छिपकर सोने की जगह खोज रहा है, तो शायद समस्या उस कर्मचारी से ज्यादा उस वर्क कल्चर में है, जहां थकान स्वीकार करना अभी भी कमजोरी माना जाता है।
जिस तरह से Gen Z इन आदतों को आम कर रही है, हो सकता है आने वाले सालों में ऑफिस की सबसे जरूरी सुविधा कॉफी मशीन नहीं, कुछ मिनट सुकून देने वाला एक कमरा हो। व्यवस्था बनाने वालों को समझना होगा कि कई बार इंसान को काम से नहीं, लगातार काम करते रहने के दबाव से छुट्टी चाहिए होती है।
