Dhak in Bengal: बांग्ला संस्कृति की पहचान है ढाक, इसकी आवाज में भक्ति भी है और बंगाल की मिट्टी भी

Dhak in Bengal: ढाक क्यों मानी जाती है बांग्ला संस्कृति की पहचान। जानिए ढाक और ढाकी कलाकारों की परंपरा, दुर्गा पूजा से इसका गहरा रिश्ता, इसकी खास बनावट और बंगाल की मिट्टी से जुड़ी अनसुनी कहानी।

Dhak in Bengal: पश्चिम बंगाल की पहचान सिर्फ रसगुल्ले, साहित्य या दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। इस राज्य की असली धड़कन उसकी लोक संस्कृति में बसती है, और उसी संस्कृति की सबसे गूंजती हुई आवाज है - ढाक (Dhak)। जैसे ही दुर्गा पूजा का समय आता है, बंगाल की गलियों, पंडालों और मंदिरों में ढाक की थाप सुनाई देने लगती है। यह सिर्फ संगीत नहीं होता, बल्कि एक ऐसा एहसास होता है जो पूरे माहौल को भक्तिमय और जीवंत बना देता है।

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ढाक: भक्ति और मिट्टी की आवाज

ढाक बजाने वाले कलाकारों को 'ढाकी' कहा जाता है। ये कलाकार अक्सर साधारण ग्रामीण परिवारों से आते हैं लेकिन उनकी कला इतनी असाधारण होती है कि उनकी थाप सुनते ही हर बंगाली के मन में उत्सव का भाव जाग उठता है।

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