Rang De Basanti: शहीद होने से पहले क्यों बसंती रंग में 'रंग जाना' चाहते थे भगत सिंह, क्या होता है रंग दे बसंती
Mera Rang De Basanti Chola: जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई तो उनके आखिरी बोल यही थे कि मेरा रंग दे बसंती चोला। ये गीत गाते हुए धरती मां के तीनों सपूतों ने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। आप सोच रहे होंगे कि ये बसंती चोला आखिर है क्या जिसकी तमन्ना करते हुए उन तीनों शहीदों ने जीवन त्याग दिया।
- Authored by: Suneet Singh
- Updated Jan 24, 2026, 11:41 AM IST
Rang De Basanti: पूरा देश आज बसंत पंचमी का उत्सव मना रहा है। यह खास दिन सर्दियों की विदाई और बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। हर कोई बसंत के रंग में रंगा नजर आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बसंती रंग क्या होता है और क्या है मेरा रंग दे बसंती चोला का मतलब?
सबसे पहले ये जानिए कि क्या होता है बसंती रंग। बसंत के आगमन पर खेतों में सरसों के फूल लहलहाते हैं। सरसों के फूल का जो रंग होता है वही बसंती कहलाता है। आसान भाषा में समझें तो हल्के पीले रंग को बसंती कहा जाता है। बसंत पंचमी पर खासतौर पर पीले या बसंती रंग के कपड़े पहने जाते हैं। भारत में यह बसंती या पीला रंग आस्था का प्रतीक भी है।
सरसों के फूलों का रंग होता है बसंती
आस्था का यह रंग कैसे बना देशभक्ति का रंग
जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई तो उनके आखिरी बोल यही थे कि मेरा रंग दे बसंती चोला। ये गीत गाते हुए धरती मां के तीनों सपूतों ने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। आप सोच रहे होंगे कि ये बसंती चोला आखिर है क्या जिसकी तमन्ना करते हुए उन तीनों शहीदों ने जीवन त्याग दिया।
क्या होता है बसंती चोला
हिंदुस्तानी सभ्यता में बसंत के मौसम का रंग पीले के साथ ही केसरिया को भी माना गया है। यही केसरिया रंग हमारे तिरंगे में सबसे ऊपर है जो साहस, बलिदान और आजादी का रंग भी है। पुराने जमाने में जब कोई राजा युद्ध पर निकलता तो उसके सिर पर केसरिया साफा होता था। केसरिया साफा इस बात का प्रतीक था कि वह अपने बलिदान के लिए भी तैयार है।
वीरता का प्रतीक भी है बसंती रंग (Photo: AI Image)
वहीं चोला का मतलब पहनावे से है। लेकिन कविताओं और नगमों में चोला उन कपड़ों के लिए भी इस्तेमाल हुआ है जो शहीद पहनते हैं। इस तरह से मेरा रंग दे बसंती चोला का मतलब हुआ कि मैं अपने देश के लिए जान देने को तैयार हूं।
इंकलाब का नारा कैसे बना मेरा रंग दे बसंती
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 9 अगस्त 1925 को भारत के वीर क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन रुकवा कर ब्रिटिश सरकार का खजाना लूट लिया था। यह लूट काकोरी कांड के नाम से मशहूर हुई। अंग्रेजी खजाना लूटने का प्लान बनाया था अमर क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों ने। साल 1927 में बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान और राजेंद्र लाहिड़ी को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर मौत की सजा सुनाई।
राम प्रसाद बिस्मिल गोरखपुर की जेल में बंद थे। वह कवि भी थे। जेल में बंद होकर भी अपनी कलम से लोगों में देशप्रेम की अलख जगाए रहे। जेल में बंद रहने के दौरान ही राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा था मेरा रंद दे बसंती चोला।
दरअसल जब बिस्मिल ने यह गीत लिखा तब मौसम बसंत का था। एक साथी ने रामप्रसाद बिस्मिल को बसंत पर कुछ लिखने को कहा। बाहर बसंत का मौसम था और बिस्मिल के मन में आजादी और स्वराज का सपना। जब दोनों मिले तो गोरखपुर जेल के बैरक नंबर 11 में एक तराना गूंजा - मेरा रंग दे बसंती चोला। कुछ इस तरह से क्रांति की कलम से इस अमर रचना का जन्म हुआ।
राम प्रसाद बिस्मिल ने जेल में लिखा था रंग दे बसंती
भगत सिंह का आखिरी अरमान था बसंती चोला
गोरखपुर की काल कोठरी में लिखा यह नगमा देखते देखते क्रांतिकारियों के साहस और बलिदान का तराना बन गया। 23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह को फांसी दी गई तो वह अपने बैरक से फांसी के फंदे तक राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा यही गीत गाते हुए पहुंचे। महज 23 साल की उम्र में वतन पर जां निसार करने वाले भगत सिंह का आखिरी अरमान भी इसी बसंती चोले में रंगने का था।
भगत सिंह की फांसी के बाद साप्ताहिक अभ्युदय नाम के अखबार ने छापा कि भगत सिह ने रंग दे बसंती चोला गाते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। अखबार ने भगत सिंह का आखिरी गान नाम से वह पूरा गीत भी छापा जिसे 1927 को गोरखपुर जेल के बैरक नंब 11 में राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा था। बिस्मिल का वह गीत कुछ इस तरह से था:
भगत सिंह के अंतिम गीत थे रंग दे बसंती
मेरा रंद दे बसंती चोला, माए रंग दे
मेरा रंग दे बसंती चोला
बड़ा ही गहरा दाग है यारों
जिसका गुलामी नाम है
उसका जीना भी क्या जीना
जिसका देश गुलाम है
सीने में जो दिल था यारों आज बना वो शोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
इसी रंग में गांधी जी ने,
नमक पर धावा बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में वीर शिवा ने
मां का बंधन खोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में भगत दत्त ने
छोड़ा बम को गोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में पेशावर में
पठानों ने सीना खोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में बिस्मिल अशफाक ने
सरकारी खजाना खोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में वीर मदन ने
गवर्नमेंट पर धावा बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में पद्मकांत ने
मार्डन पर धावा बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला.
फिल्मों के जरिए पूरे भारत हिंदुस्तान में गूंजा बसंती चोला
साल 1965 में फिल्म शहीद में सुनाई दिया रंग दे बसंती चोला। गीत लिखा था मशहूर गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन ने। आवाज से सजाया था मुकेश, महेंद्र कपूर और राजेन्द्र मेहता ने। गीत खूब पॉपुलर हुआ। रिलीज होते ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया। पूरा हिंदुस्तान एक सुर में गाने लगा..मेरा रंग दे बसंती चोला।
इस गाने के बनने की कहानी भी खास है। हुआ ये था कि शूटिंग से पहले फिल्म के कलाकार पंजाब में भगत सिंह के गांव गए थे और वहां उनके परिवार से मिले। प्रेम धवन भी टीम के साथ थे। भगत सिंह की मां से प्रेम धवन को पता चला कि मेरा रंग दे बसंती चोला उनका पसंदीदा गीत था। वह जेल में अकसर इसे गाते रहते थे। मुंबई लौट कर प्रेम धवन ने फिल्म के लिए अपने शब्दों में लिखा रंग दे बसंती चोला। फिल्म शहीद की रंग दे बसंती कुछ इस तरह से था:
शहीद फिल्म के जरिए लोगों तक पहुंचा मेरा रंग दे बसंती चोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है
देख के वीरों की कुर्बानी अपना दिल भी बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला...।
जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे
जिसे पहन झांसी की रानी मिट गई अपनी आन पे
आज उसी को पहन के निकला हम मस्तों का टोला
मेरा रंग दे बसंती चोला...।
साल 2006 में आई फिल्म रंग दे बसंती में भी राम प्रसाद बिस्मिल के लिखे रंग दे बसंती चोला को नए रंग में पेश किया गया था। यह गीत भी खूब पॉपुलर हुआ। जाते-जाते आपको उसी गीत के साथ छोड़े जा रहे हैं:
