Science News: जिस खनिज को दुनिया न जाने कबसे 'बेवकूफों का सोना' (Fool’s Gold) कहकर पुकारती रही, वह असल में भविष्य की ऊर्जा का सबसे कीमती खजाना साबित हो सकता है। वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी खोज की है, जो न केवल विज्ञान की किताबों को बदल सकती है, बल्कि हमारे स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों तक की बैटरी के संकट को हमेशा के लिए सुलझा सकती है।
खत्म हो सकती है लिथियम की किल्लत
'सफेद सोना' और 'बेवकूफों का सोना'
आज की आधुनिक दुनिया में लिथियम को 'सफेद सोना' (White Gold) कहा जाता है। यह इतना हल्का और रिएक्टिव होता है कि पानी के संपर्क में आते ही गर्मी पैदा करता है और आग पकड़ सकता है। यही कारण है कि एयरलाइंस में लैपटॉप और फोन को लेकर सख्त नियम होते हैं। लेकिन यही रिएक्टिविटी लिथियम को जादुई बनाती है; यह ऊर्जा को बहुत अच्छे तरीके से स्टोर और रिलीज कर सकता है। दूसरी तरफ है पाइराइट, जिसे अपनी सुनहरी चमक के कारण लोग अक्सर असली सोना समझ बैठते हैं, इसलिए इसे 'फूल्स गोल्ड' कहा जाता है। वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता शैली भट्टाचार्य और प्रोफेसर शिखा शर्मा ने जब 380 मिलियन साल पुरानी चट्टानों (Shale) की जांच की, तो उन्हें पाइराइट के अंदर लिथियम की भारी मात्रा मिली। यह खोज हैरान करने वाली थी क्योंकि अब तक माना जाता था कि लिथियम सिर्फ ज्वालामुखी वाली मिट्टी या खास ग्रेनाइट चट्टानों में ही मिलता है।
क्यों बढ़ रही है लिथियम की 'भूख'?
जैसे-जैसे दुनिया पेट्रोल-डीजल को छोड़कर इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और सौर ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, लिथियम की मांग रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी है। टेस्ला से लेकर टाटा तक, हर इलेक्ट्रिक कार की जान लिथियम-आयन बैटरी ही है। रिन्यूएबल एनर्जी में सूरज का तो कोई सानी नहीं है लेकिन ढलने के बाद सोलर पैनल की बिजली को स्टोर करने के लिए बड़ी-बड़ी लिथियम बैटरियों की जरूरत होती है। अभी तक लिथियम निकालने के लिए नई खदानें खोदनी पड़ती हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है। लेकिन अगर हम पाइराइट या औद्योगिक कचरे (जैसे पुरानी खदानों का मलबा) से लिथियम निकाल सकें, तो यह "सोने पर सुहागा" होगा।
पुरानी चट्टानों में छिपा भविष्य का ईंधन
शोधकर्ताओं ने अमेरिका के एपलाचियन बेसिन से 'मिडल-डेवोनियन शेल' के 15 नमूने लिए। ये चट्टानें उस समय बनी थीं जब वहां प्राचीन समुद्र हुआ करते थे। इन नमूनों में मौजूद पाइराइट के भीतर लिथियम का मिलना वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बन गया है। शैली भट्टाचार्य अब यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि लिथियम और सल्फर से भरपूर पाइराइट एक साथ कैसे जुड़े हैं। यह खोज इसलिए भी क्रांतिकारी है क्योंकि भविष्य की बैटरी तकनीक 'लिथियम-सल्फर' डिजाइनों पर केंद्रित है। अगर प्रकृति में ये दोनों पहले से ही साथ मिल रहे हैं, तो यह इंजीनियरिंग की दुनिया के लिए एक नया रास्ता खोल सकता है।
क्या यह खोज माइनिंग का अंत करेगी?
शैली भट्टाचार्य के अनुसार, "हम ऊर्जा संसाधनों का अत्यधिक दोहन किए बिना भी टिकाऊ ऊर्जा (Sustainable Energy) की बात कर सकते हैं।" इसका मतलब है कि हमें धरती को और ज्यादा खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर हम पुरानी खदानों के मलबे या 'शेल' चट्टानों से लिथियम निकालने में कामयाब हो जाते हैं, तो नई खदान शुरू करने का अरबों का खर्च बचेगा, यानी लागत कम होगी। माइनिंग से होने वाला प्रदूषण कम होगा और जिसे हम औद्योगिक कचरा समझकर फेंक देते थे, उसकी अब रिसाइकलिंग हो सकेगी। हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि यह शोध अभी शुरुआती दौर में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी यह देखना बाकी है कि क्या दुनिया के अन्य हिस्सों में भी पाइराइट के भीतर लिथियम इसी तरह मौजूद है।
