दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 2024 यूजीसी नेट परीक्षा कथित पेपर लीक (UGC NET paper leak) मामले में जांच बंद करने को लेकर सीबीआई (CBI) को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सीबीआई से पूछा है कि जब उसकी अपनी जांच रिपोर्ट में यह दर्ज है कि एक आरोपी अभ्यर्थियों से लीक प्रश्नपत्र दिलाने के नाम पर पैसे वसूल रहा था, तब एजेंसी ने क्लोजर रिपोर्ट आखिर किस आधार पर दाखिल की। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में नीट यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक को लेकर पहले से राजनीतिक और कानूनी विवाद जारी है। इसी बीच यूजीसी नेट मामले में अदालत की टिप्पणी ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
यूजीसी नेट 2024 पेपर लीक के मामले में सीबीआई को लगी कोर्ट से फटकार
कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नीतू नागर ने 15 मई के आदेश में कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट के पैरा 16.30 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि “निखिल सोनी ने यूजीसी नेट 2024 के अभ्यर्थियों से परीक्षा का पेपर लीक कराने या उपलब्ध कराने का झांसा देकर पैसे वसूले।” अदालत ने कहा कि सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट से यह साफ है कि अपराध हुआ है, इसके बावजूद जांच अधिकारी ने इस पहलू की अनदेखी करते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। सुनवाई के दौरान सीबीआई के जांच अधिकारी (IO) ने अदालत से लिखित स्पष्टीकरण दाखिल करने के लिए समय मांगा। इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 21 मई के लिए तय कर दी।
क्या था यूजीसी नेट पेपर लीक का मामला?
यूजीसी नेट 2024 परीक्षा 18 जून 2024 को देशभर के 317 शहरों में आयोजित की गई थी। इस परीक्षा में 9 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। परीक्षा के अगले ही दिन केंद्र सरकार ने इसे रद्द कर दिया था। सरकार का कहना था कि गृह मंत्रालय से मिले इनपुट में परीक्षा की शुचिता प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। विवाद की शुरुआत एक स्क्रीनशॉट से हुई थी, जिसे परीक्षा वाले दिन दोपहर करीब 2 बजे एक टेलीग्राम चैनल पर साझा किया गया बताया गया। उस स्क्रीनशॉट में कथित तौर पर प्रश्नपत्र के सवाल मौजूद थे और संदेशों में दावा किया गया था कि पेपर परीक्षा से पहले लीक हो चुका है। इस ऑनलाइन गतिविधि का पता गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाले भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र ने लगाया था। इसके बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को जानकारी दी गई और सरकार ने परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया। 23 जून 2024 को मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। जांच एजेंसी ने डिजिटल ट्रेल, टेलीग्राम चैनलों और साझा किए गए स्क्रीनशॉट की फॉरेंसिक जांच की।
सीबीआई की जांच में क्या सामने आया था?
जनवरी 2025 में राउज एवेन्यू कोर्ट में दाखिल अपनी क्लोजर रिपोर्ट में सीबीआई ने कहा कि पेपर लीक का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। एजेंसी के मुताबिक जिस स्क्रीनशॉट के आधार पर परीक्षा रद्द की गई थी, वह “डॉक्टर्ड” यानी छेड़छाड़ किया गया था। सीबीआई ने दावा किया कि फॉरेंसिक विशेषज्ञों की जांच में पता चला कि एक स्कूली छात्र ने मोबाइल एप्लिकेशन की मदद से कथित स्क्रीनशॉट तैयार किया था। जांच एजेंसी के अनुसार स्क्रीनशॉट को इस तरह एडिट किया गया था कि यह लगे कि प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले उपलब्ध था। हालांकि अदालत ने अब उसी क्लोजर रिपोर्ट के एक हिस्से का हवाला देते हुए सवाल उठाया है कि यदि आरोपी अभ्यर्थियों से पेपर लीक कराने के नाम पर पैसे वसूल रहा था, तो क्या यह अपने आप में अपराध नहीं बनता है।
शिक्षा मंत्रालय की ओर से दाखिल हुआ आवेदन
सुनवाई के दौरान शिक्षा मंत्रालय की ओर से एक आवेदन दाखिल किया गया, जिसमें मंत्रालय के सचिव को व्यक्तिगत पेशी से छूट देने की मांग की गई थी। आवेदन में कहा गया कि संबंधित अधिकारी अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी के संवैधानिक पद पर नियुक्त हो चुके हैं और व्यस्तता के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो सकते। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक वरुण भारद्वाज को अदालत में पेश होने के लिए अधिकृत किया गया। अदालत ने इस आवेदन को स्वीकार कर लिया। इसके बाद अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारी से लिखित स्पष्टीकरण मांगा। अब 21 मई को सीबीआई को अदालत के सामने अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
