तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कभी 'पोस्टर बॉय' और नंदीग्राम में ममता बनर्जी के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की धरा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करा दिया। सुवेंदु अधिकारी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों ही सीटों से जीत दर्ज की। भवानीपुर सीट तो इसलिए भी खास है, क्योंकि अधिकारी ने वहां से टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को पटखनी दी।
सुवेंदु अधिकारी ने ममता दीदी के गढ़ भवानीपुर में 15,105 वोट के भारी अंतर से चुनाव जीता, जबकि पिछले चुनावों के मुकाबले नंदीग्राम में 9,665 मतों के अंतर से जीत हासिल की। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि सुवेंदु की यह दोहरी सफलता और अपने गढ़ पूर्व मेदिनीपुर की सभी 16 सीट पर टीएमसी को करारी शिकस्त देना तथा भाजपा की जीत सुनिश्चित करना, उन्हें मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे अग्रिम पर ला खड़ा करता है। तभी तो अमित शाह की मौजूदगी वाली विधायक दल की बैठक में सुवेंदु अधिकारी के नाम पर सहमति बनती है और उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया।
Suvendu Adhikari
ममता के चिर प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे सुवेंदु
एक समय में ममता के सबसे करीबी सहयोगियों में शुमार सुवेंदु आज उनके लिए संभवत: सबसे दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल अपने सियासी भविष्य को नया आकार दिया, बल्कि शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का विश्वास भी जीता।
बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में सुवेंदु का उभरना उनकी आक्रामक शैली और कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और टीएमसी के शासन में "भ्रष्टाचार" जैसे मुद्दों पर उनके मजबूत रुख पर आधारित है। उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय मुख्य रूप से कृषि प्रधान पूर्व मेदिनीपुर जिले के तटीय और औद्योगिक क्षेत्रों में दबदबा कायम करने में बिताया। हालांकि, 2020 में वह तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए।
पिछले चुनाव में रखी गई BJP की जीत की नींव
सुवेंदु का भाजपा में शामिल होना बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ और वह जल्द ही राज्य में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में स्थापित हो गए। सुवेंदु का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव 2021 में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में ममता को चुनौती देना था, जहां उनकी जीत ने उन्हें पूरे राज्य लोकप्रियता दिलाई। उस जीत ने न केवल दशकों से इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से सक्रिय सुवेंदु परिवार के प्रभुत्व को मजबूत किया, बल्कि उनके बड़े बेटे को राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद तक भी पहुंचा दिया।
भाजपा की विचारधाराओं के अनुरूप ढलने और भविष्य में पार्टी में अहम पद हासिल करने के लिए सुवेंदु ने भूमि अधिग्रहण आंदोलन के एक समावेशी नेता से अपनी छवि को हिंदुत्व ब्रिगेड के प्रतीक के रूप में बदलने का काम किया। उन्होंने दावा किया कि अगर टीएमसी चुनाव जीतती है, तो वह "पश्चिम बंगाल को पूर्वी बांग्लादेश बना देगी।"
सुवेंदु ने 1995 में आजमाई थी चुनावी किस्मत
अपने प्रारंभिक वर्षों के दौरान आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षित सुवेंदु ने 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने 1995 में पहली बार चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाई और कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए, जिसका नेतृत्व उनके पिता शिशिर अधिकारी ने 1967 से 2009 तक किया था।
सुवेंदु ने 1999 में थामा था TMC का दामन
सुवेंदु 1999 में अपने पिता के साथ टीएमसी में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार असफल रहे - 2001 के विधानसभा चुनाव और 2004 के लोकसभा चुनाव में। अंततः सुवेंदु को 2006 में सफलता मिली, जब उन्होंने कोंटाई विधानसभा सीट जीती।
साल 2007 में नंदीग्राम में हुए कृषि भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और सुवेंदु को तृणमूल की अग्रणी पंक्ति में ला खड़ा किया। सुवेंदु जल्द ही टीएमसी के 'कोर ग्रुप' के सदस्य बन गए और उन्हें पार्टी की युवा कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2009 और 2014 में उन्होंने तामलुक से लोकसभा चुनाव जीता।
अभिषेक की एंट्री से सुवेंदु का मन हुआ था खट्टा!
ममता के 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्यादातर लोगों ने सुवेंदु ने उन्हें उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखा। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच अविश्वास का बीजारोपण उसी साल 21 जुलाई को टीएमसी की पहली वार्षिक शहीद दिवस रैली में हुआ, जब ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीति में प्रवेश की घोषणा की।
उस समय मात्र 24 साल के अभिषेक को तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया, जो टीएमसी युवा कांग्रेस के समानांतर संगठन था। इस फैसले से अधिकारी बेहद नाराज थे, क्योंकि पार्टी के संविधान में दो युवा संगठनों के लिए कोई जगह नहीं थी। साल 2014 में सुवेंदु को तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और कुछ महीनों बाद इस संगठन का युवा कांग्रेस में विलय कर दिया गया।
