West Bengal Assembly Election 2026: ममता बनर्जी लगातार चौथी बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) का चेहरा बनकर चुनाव मैदान में उतर चुकी हैं। पांच साल बाद चुनावी मैदान में ममता और भाजपा के सुवेंदु अधिकारी फिर से आमने-सामने होंगे। 2021 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में शिकस्त दी थी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो साभार: @AITCofficial)
ममता बनर्जी बनाम सुवेंदु अधिकारी
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के बीचों-बीच बसा भवानीपुर ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, ठीस वैसे ही जैसे नंदीग्राम को सुवेंदु अधिकारी का गढ़ कहते हैं। 5 साल पहले सुवेंदु अधिकारी के चैलेंज करने पर ममता नंदीग्राम पहुंच गई थीं, लेकिन इस बार सुवेंदु अधिकारी खुद भवानीपुर पहुंचे हैं ममता को टक्कर देने। सुवेंदु अधिकारी कभी ममता के करीबी और बेहद भरोसेमंद माने जाते थे। ममता सरकार में वो मंत्री भी रहे, लेकिन 2020 में सुवेंदु तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे।
सुवेंदु अधिकारी का नाम भाजपा की पहली ही लिस्ट में आ गया था और तृणमूल कांग्रेस ने तो एक बार में ही पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP के लिए राहत की बात बस ये थी कि नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को शिकस्त दे दी थी। भाजपा ने पिछले चुनाव में 77 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। पिछले कई साल से बंगाल में भाजपा की कोशिश रही है कि वो ममता के सियासी किले को ढहाकर वहां सरकार बनाने में कामयाब हो सके।
तेजी से बढ़ रहा भाजपा का ग्राफ
बंगाल की जनता पर ममता बनर्जी का एक अलग प्रभाव रहा है। SIR के मुद्दे पर वो सड़क से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गईं। पिछले दो बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। बंगाल में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा है। कानून व्यवस्था भी एक बड़ी चुनौती रही है।
कितने बार चुनाव गंवा चुकी हैं ममता बनर्जी?
अपने लंबे राजनीतिक करियर में, ममता केवल दो चुनाव हारी हैं, 1989 में जादवपुर में लोकसभा चुनाव और 2021 में नंदीग्राम से। 2011 की गर्मियों में बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद से, ममता ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के रूप में भवानीपुर को चुना और एक बार फिर वो यहीं से किस्मत आज़मा रही हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या ममता बनर्जी के लिए फिर से भवानीपुर सीट LUCKY साबित होगी?
2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ नंदीग्राम में विरोध प्रदर्शनों ने ममता बनर्जी को 2011 में सत्ता में लाने का रास्ता साफ किया था। ममता बनर्जी ने अपनी आत्मकथा MY UNFORGETTABLE MEMORIES यानी मेरी अविस्मरणीय यादें में अपने संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन, बचपन, और 2011 में वाम मोर्चा सरकार को सत्ता से बेदखल करने तक की अपनी यात्रा का जिक्र किया है।
भवानीपुर से ममता का है खास लगाव
ममता भवानीपुर को अपनी बड़ी बहन कहती हैं। 2011 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी भवानीपुर से उपचुनाव जीता था। उन्हें CPM उम्मीदवार नंदिनी मुखर्जी से 54,000 ज्यादा वोट मिले थे। इस चुनाव में उन्होंने लेफ्ट को हराया था और राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं।
एक तरफ ममता बनर्जी के पास अपनी साख बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ सुवेंदु अधिकारी की घेराबंदी करने की। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि भवानीपुर में ममता जीत पाएंगी या सुवेंदु अधिकारी एक बार फिर इतिहास दोहराकर 'दीदी' के किले में सेंध लगाएंगे?
भवानीपुर के चुनावी समीकरण
जिस भवानीपुर सीट पर ममता और सुवेंदु अधिकारी आमने-सामने हैं उस भवानीपुर में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 35.16 फीसदी हो गया है।भवानीपुर में करीब 20 फीसद मुस्लिम वोटर हैं। करीब 40 फीसदी बंगाली वोटर हैं और करीब 40 फीसदी मिलीजुली आबादी है, जिसमें गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी और बिहार से जाकर बसे हुए लोग हैं।
बताया जा रहा है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को आई फाइनल लिस्ट से पता चलता है कि भवानीपुर विधानसभा में 47,000 नाम काट दिए गए, जबकि 14,000 वोटर जांच के दायरे में हैं। ये लोग वोट दे पाएंगे या नहीं? इस पर सवाल है। SIR के खिलाफ सड़क पर मार्च से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपने केस की खुद पैरवी करने वाली ममता का दावा है कि अगर वोटर लिस्ट में एक भी नाम बचेगा, तब भी भवानीपुर से वही चुनाव जीतेंगी।
71 साल की ममता बनर्जी के लिए ये चुनाव कई मायनों में अब तक की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकती है। ममता के सामने क़ानून-व्यवस्था, बेरोज़गारी और विकास से जुड़े सवाल हैं, जिनका जवाब उन्हें देना पड़ेगा।
सनद रहे कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होगी। पहले चरण की वोटिंग 23 अप्रैल को है और दूसरे चरण की 29 अप्रैल को, जबकि वोटों की गिनती 4 मई को होगी। अब देखना होगा कि ममता बनर्जी अपने किले को चौथी बार बचाकर इतिहास रच पाएंगी या फिर भाजपा उनके किले में सेंध लगाने में कामयाब होती है।
