शिवसेना के चुनाव चिह्न और नाम के लिए हुई 2 हजार करोड़ की डील: संजय राउत

  • Authored by: किशोर जोशी
  • Updated Feb 19, 2023, 11:22 AM IST

उद्धव ठाकरे गुट के नेता संजय राउत ने दावा किया है कि शिवसेना और उसका निशान (तीर-कमान) चिह्न छीना गया है और ऐसा करने के लिए इस मामले में अब तक 2,000 करोड़ रुपए की लेनदेन हुई है। उन्होंने कहा कि यह प्रारंभिक आंकड़ा है और 100 फीसदी सच है।

Uddhav Thackeray: उद्धव ठाकरे गुट के नेता व सांसद संजय राउत ने शिंदे (Eknath Shinde) सरकार और चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा आरोप लगाया है। मुंबई में मीडिया से बात करते हुए संजय राउत ने कहा कि शिवसेना (Shivsena) का नाम और चुनाव चिह्न खरीदने के लिए 2 हजार करोड़ रुपये का लेनदेन किया गया। हालांकि राउत अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं बता पाए। इससे पहले भी राउत लगातार शिंदे गुट और चुनाव आयोग को निशाने पर लेते रहे हैं।

Sanjay Raut on Chunav Aayog

संजय राउत ने बड़ा आरोप लगाया है

राउत का बड़ा आरोप

मीडिया से बात करते हुए संजय राउत ने कहा, 'देश को अवगत किया कि जिस तरह से शिवसेना और शिवसेना का निशान जो है तीर कमान, वो हमसे छीन लिया गया है वो सत्य नहीं है, न्याय नहीं है। वो एक व्यापार है और अब तक शिवसेना का नाम और निशान छीनने के लिए 2 हजार करोड़ की लेन-देन हुई है। ये मेरी प्राथमिक रिपोर्ट यानि एफआईआर है। ये निर्णय खरीदा हुआ निर्णय है। 6 महीने में 2 हजार करोड़ रुपये का लेन देन अभी तक हो चुका है सिर्फ नाम और चिह्न के लिए। जो सरकार, जो नेता जो सरकार, जो बेइमान लोगों का गुट विधायकों को खरीदने के लिए 50-50 करोड़ रुपये का दाम लगाता है और सांसद खरीदने के लिए 100 करोड़ का बोली लगाता है। हमारे पार्षद और शाखा प्रमुख खरीदने के लिए 1 करोड़ और 50 लाख का दांव लगाता है, वो तो पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न खरीदने के लिए कितने करोड़ की बोली लगा सकता है ये आप अंदाज लगा सकते हैं, मेरा अनुमान है 2 हजार करोड़ रुपये।'

निर्वाचन आयोग ने दिया है ये फैसला

दरअसल निर्वाचन आयोग ने शुक्रवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह को ‘शिवसेना’ नाम और उसका चुनाव चिह्न ‘तीर-कमान’ आवंटित किया। इसे उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। तीन सदस्यीय आयोग ने शिंदे द्वारा दायर छह महीने पुरानी याचिका पर सर्वसम्मत आदेश में कहा कि वह विधायक दल में पार्टी की संख्या बल पर निर्भर था, जहां मुख्यमंत्री को 55 में से 40 विधायकों और 18 में से 13 लोकसभा सदस्यों का समर्थन हासिल था।

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