मैटरनिटी लीव पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि गोद लेने वाली सभी माताओं को मातृत्व अवकाश मिलना उनका अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल बच्चे की उम्र के आधार पर लाभ से वंचित करना एक मनमाना और अव्यावहारिक वर्गीकरण है। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि गोद लेने की प्रक्रिया में बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, भावनात्मक, मानसिक और व्यावहारिक स्तर पर कई तरह के बदलाव होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मातृत्व अवकाश पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
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सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को असंवैधानिक करार दिया है। इस प्रावधान के तहत केवल उन दत्तक माताओं को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश दिया जाता था, जो तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ का उद्देश्य केवल जन्म देने वाली माताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के व्यापक अनुभव से जुड़ा है। दत्तक माताओं को भी बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव, देखभाल और नए माहौल में सामंजस्य स्थापित करने के लिए समय की आवश्यकता होती है, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा
अदालत ने कहा कि तीन महीने की उम्र की शर्त लगाकर मातृत्व लाभ को सीमित करना एक कृत्रिम और अव्यावहारिक वर्गीकरण है। यह भेदभावपूर्ण है और संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के खिलाफ जाता है। कोर्ट ने यह भी माना कि गोद लेने की प्रक्रिया में कई तरह के भावनात्मक, मानसिक और व्यावहारिक बदलाव शामिल होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
महिलाओं को होगा फायदा
इस फैसले को दत्तक माताओं के अधिकारों के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे उन महिलाओं को राहत मिलेगी, जो बड़े बच्चों को गोद लेती हैं और अब तक मातृत्व अवकाश के लाभ से वंचित रह जाती थीं।
