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Power Corridor: आखिर कैसे बनते हैं अतीक और मुख्तार जैसे माफिया? पूर्व DGP अशोक कुमार ने समझाया पूरा सिस्टम, साझा किया 37 सालों का अनुभव

टाइम्स नाउ नवभारत के विशेष पॉडकॉस्ट पावर कॉरिडोर में डॉ रमा सोलंकी से बात करते हुए उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे अशोक कुमार ने अपने 37 वर्षों की पुलिस सेवा के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि छोटा अपराधी कानून से डरता है, लेकिन संगठित अपराधी धीरे-धीरे व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाना सीख जाते हैं और यही उन्हें अधिक खतरनाक बनाता है।

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पॉवर कॉरिडोर में उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी से खास बातचीत।
Reported by: Dr Rama SolankiEdited by: Shiv Shukla
Updated Jul 21, 2026, 19:07 IST
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नई दिल्ली: देश में बड़े अपराधियों का उदय केवल उनकी व्यक्तिगत ताकत का परिणाम नहीं होता, बल्कि समाज, राजनीति, पुलिस तंत्र और आपराधिक न्याय व्यवस्था की कमजोरियां भी उन्हें मजबूत बनाती हैं। ये कहना है उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे अशोक कुमार का। टाइम्स नाउ नवभारत के विशेष पॉडकॉस्ट पावर कॉरिडोर में डॉ रमा सोलंकी से बात करते हुए उन्होंने अपने 37 वर्षों की पुलिस सेवा के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि छोटा अपराधी कानून से डरता है, लेकिन संगठित अपराधी धीरे-धीरे व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाना सीख जाते हैं और यही उन्हें अधिक खतरनाक बनाता है।

पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान अशोक कुमार ने अपने करियर के कई चर्चित मामलों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारी का सबसे बड़ा दायित्व केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाना और पुलिस तंत्र के भीतर मौजूद भ्रष्टाचार पर भी कार्रवाई करना है। उन्होंने कहा कि यदि कोई पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है या भ्रष्टाचार में शामिल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

पीड़िता को दिलाया न्याय

अशोक कुमार ने अपने करियर के सबसे भावुक मामलों का जिक्र करते हुए बताया कि उनकी किताब 'खाकी में इंसान' की पहली कहानी शाहजहांपुर की एक गैंगरेप पीड़िता पर आधारित है। उन्होंने बताया कि पंचायत चुनाव के दौरान वोट नहीं देने से नाराज दबंगों ने महिला के पति और ससुर के सामने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। महिला ने हिम्मत जुटाकर शिकायत दर्ज कराई, लेकिन आरोपियों को जल्द ही जमानत मिल गई। इसके बाद उन्होंने पुलिस की मिलीभगत से महिला के पति को झूठे मादक पदार्थ मामले में फंसा कर जेल भेज दिया।

पूर्व डीजीपी ने बताया कि महिला सीधे उनके पास पहुंची। उन्होंने मामले की दो स्तरों पर जांच कराई। नियमित जांच में पति को दोषी बताया गया, जबकि खुफिया जांच में सामने आया कि पूरा गांव जानता था कि महिला सच बोल रही है और उसके पति को झूठे मुकदमे में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि सच्चाई सामने आने के बाद उन्होंने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की और महिला के पति को जेल से बाहर निकलवाया। उनके अनुसार, यदि पुलिसकर्मी गलती करते हैं तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

इस दौरान उन्होंने हरिद्वार में एसएसपी रहते हुए सामने आए एक ऐसे मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें जेल के भीतर से उगाही का रैकेट संचालित हो रहा था। शिकायत मिलने पर उन्होंने पूरी योजना बनाकर जांच कराई। जांच में जेल प्रशासन की मिलीभगत सामने आई, जिसके बाद संबंधित जेलर को गिरफ्तार कर उसी जेल में भेज दिया गया। उनका कहना था कि जेल के भीतर से इस तरह का नेटवर्क बिना प्रशासनिक सहयोग के चल ही नहीं सकता।

जनता से सीधे संवाद को बताया अच्छी पुलिसिंग की कुंजी

अशोक कुमार ने कहा कि उन्होंने नौकरी के पहले दिन से यह सिद्धांत अपनाया कि अच्छी पुलिसिंग तभी संभव है, जब अधिकारी जनता से सीधे मिले। उन्होंने कहा कि कई अधिकारी अपनी ऐसी छवि बना लेते हैं कि आम लोग उनके पास जाने से डरते हैं, जबकि उन्होंने हमेशा लोगों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे। उनका कहना था कि यदि पुलिस अधिकारी आम नागरिकों की बात सुनेंगे, तभी उन्हें सही जानकारी मिलेगी और न्याय दिलाने में आसानी होगी।

उत्तराखंड नहीं खुद से नहीं किस्मत से पहुंचे

पूर्व डीजीपी ने बताया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश छोड़कर उत्तराखंड कैडर नहीं चुना था, बल्कि परिस्थितियों ने उन्हें वहां पहुंचाया। उनके अनुसार राज्य बनने के शुरुआती दौर में अधिकांश अधिकारी उत्तराखंड नहीं जाना चाहते थे क्योंकि वहां संसाधनों की कमी थी और बड़े राज्य जैसी सुविधाएं नहीं थीं। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि जीवन में मेहनत और प्रतिभा के साथ किस्मत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। केवल मेहनत पर्याप्त नहीं होती, सही समय और अवसर भी जरूरी होते हैं।

90 के दशक में सांप्रदायिक तनाव सबसे बड़ी चुनौती था

अशोक कुमार ने कहा कि 1990 के दशक में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक तनाव था। राम जन्मभूमि आंदोलन, मंडल आंदोलन और उसके बाद की परिस्थितियों में पुलिस लगातार अलर्ट रहती थी। उन्होंने बताया कि त्योहारों के दौरान कई-कई दिन तक पुलिस अधिकारियों को सोने का समय नहीं मिलता था। अधिकारी चौक-चौराहों पर तैनात रहते थे ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा न हो। उस समय पुलिस के पास आधुनिक तकनीक नहीं थी और अधिकांश काम पूरी तरह मैन्युअल तरीके से करना पड़ता था।

योगी सरकार में अपराध कम होने का किया दावा

पूर्व डीजीपी ने कहा कि वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है। उन्होंने कहा कि खासकर योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपराध और सांप्रदायिक तनाव में कमी आई है। उन्होंने कहा कि पहले होली, दिवाली और ईद जैसे त्योहार पुलिस के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होते थे, जबकि अब स्थिति पहले से काफी बेहतर दिखाई देती है।

अतीक और मुख्तार जैसे अपराधियों पर क्या बोले?

पूर्व डीजीपी ने कहा कि अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे अपराधी अचानक पैदा नहीं होते। उनके मुताबिक समाज, राजनीति, पुलिस, मीडिया और आपराधिक न्याय व्यवस्था, सभी की कमजोरियां मिलकर ऐसे अपराधियों को मजबूत बनाती हैं। उन्होंने कहा कि छोटा अपराधी कानून से डरता है, लेकिन बड़ा अपराधी धीरे-धीरे जेल,पुलिस और सिस्टम के भीतर अपनी पकड़ बना लेता है। जब उसे यह भरोसा हो जाता है कि व्यवस्था को प्रभावित किया जा सकता है, तब उसका डर खत्म हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे अपराधी अक्सर जाति और समुदाय का समर्थन हासिल कर खुद को रॉबिनहुड की छवि में पेश करने की कोशिश करते हैं, जिससे पुलिस के लिए कार्रवाई और कठिन हो जाती है।

मोबाइल, CCTV और AI ने बदल दी पुलिसिंग

अशोक कुमार ने बताया कि शुरुआत में मोबाइल फोन आने पर लगा था कि अपराधियों को फायदा मिलेगा, लेकिन बाद में यही तकनीक पुलिस के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गई। उन्होंने कहा कि मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रेल के जरिए पूरे गैंग तक पहुंचना आसान हो गया। बाद में सोशल मीडिया और सीसीटीवी कैमरों ने भी जांच प्रक्रिया को और मजबूत किया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अब अपराधी भी तकनीक को समझने लगे हैं और कई बार वारदात के समय मोबाइल साथ नहीं रखते। ऐसे मामलों में सीसीटीवी फुटेज सबसे अहम सबूत बन जाती है।

उत्तराखंड पुलिस की सफलता का बताया राज

पूर्व डीजीपी ने दावा किया कि उनके कार्यकाल में उत्तराखंड पुलिस का अपराध समाधान (वर्कआउट) प्रतिशत देश में सबसे बेहतर था। उन्होंने कहा कि चोरी जैसे मामलों में भी पुलिस ने 70 प्रतिशत से अधिक मामलों का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि किसी एक मामले को सुलझाने के लिए पुलिस कई बार हजारों सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालती थी। अपराधियों की गाड़ियों को टोल प्लाजा से लेकर दूसरे जिलों तक ट्रैक किया जाता था, जिससे अपराधियों तक पहुंचना आसान हो जाता था।

उत्तर प्रदेश से क्या सीख सकता है उत्तराखंड?

अशोक कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था में रिकॉर्ड प्रबंधन और अपराधियों की ट्रैकिंग का सिस्टम पहले से मजबूत था। उत्तराखंड बनने के बाद उन्होंने इसी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि अपराधियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना, डेटा का बेहतर इस्तेमाल करना और अपराधियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना आधुनिक पुलिसिंग की सबसे बड़ी जरूरत है।

नई किताब में बताएंगे सफलता के 'लाइफ स्किल्स'

पूर्व डीजीपी ने बताया कि उनकी नई पुस्तक 'Life Skills to Reach the Top' जल्द प्रकाशित होने वाली है। उन्होंने कहा कि केवल आईक्यू (IQ) किसी व्यक्ति को जीवन में शीर्ष तक नहीं पहुंचा सकता। उनके अनुसार भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EQ), समय प्रबंधन, तनाव प्रबंधन और सकारात्मक दृष्टिकोण जैसी जीवन कौशल सफलता के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं, खासकर आईआईटी जैसे संस्थानों के छात्रों को केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन कौशल पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए।

करियर चुनने वालों को दी सलाह

युवाओं को संदेश देते हुए अशोक कुमार ने कहा कि करियर का चुनाव केवल समाज या परिवार के दबाव में नहीं करना चाहिए। व्यक्ति को वही क्षेत्र चुनना चाहिए, जिसमें उसकी रुचि और क्षमता दोनों हों। उन्होंने बताया कि आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग करने के बावजूद उन्होंने महसूस किया कि उनका मन उस क्षेत्र में नहीं है, इसलिए उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और पुलिस सेवा को केवल नौकरी नहीं, बल्कि अपना जुनून माना। उन्होंने यह भी कहा कि पहले समाज में डॉक्टर और इंजीनियर बनने का ही दबाव होता था, लेकिन आज युवाओं के पास अनेक करियर विकल्प उपलब्ध हैं। इसलिए अभिभावकों को बच्चों की प्रतिभा को समझकर निर्णय लेना चाहिए।

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