कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित करने की मांग पर SC में सुनवाई, कुछ उत्तर भारतीय राज्यों पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कुछ उत्तर भारतीय राज्यों ने अभी तक कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित नहीं किया है। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य शामिल हैं। वहीं, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित किया जा चुका है।

देश में कैंसर के मामलों की अनिवार्य और एक समान रिपोर्टिंग की मांग वाली याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता गौरव बंसल ने बताया कि कुछ उत्तर भारतीय राज्य कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित करने को तैयार नहीं हैं। नोटिफाएबल (अधिसूचित) बीमारी का मतलब ऐसी बीमारी है, जिसके मामले सामने आने पर स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी देना अनिवार्य होता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि देशभर से कैंसर का एक समान डेटा मिलने से नेशनल कैंसर रजिस्ट्री को इलाज की योजना बनाने और ज्यादा स्क्रीनिंग वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट

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सभी राज्यों के कैंसर का डेटा क्यों जरूरी?

एडवोकेट गौरव बंसल ने कहा कि देशभर में कैंसर के मामलों का एक समान डेटा जरूरी है, क्योंकि इसी आधार पर नेशनल कैंसर रजिस्ट्री यह तय कर सकती है कि बीमारी के इलाज की योजना कैसे बनाई जाए और किन इलाकों में ज्यादा स्क्रीनिंग की जरूरत है।

36 में से 17 राज्यों में कैंसर नोटिफाएबल बीमारी

सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में कहा था कि देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 17 पहले ही कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित कर चुके हैं। बाकी 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कोर्ट ने इस पर विचार करने को कहा था। कोर्ट ने इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की सिफारिशों पर विचार कर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।

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