Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट में विधानसभा की आरक्षित सीटों के दशकों तक एक ही रहने और रोटेशन नहीं होने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई। CJI सूर्यकांत ने कहा- हम संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते। कोर्ट ने कहा, आरक्षित सीटों के रोटेशन का फैसला विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को लेकर अहम सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत में उस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें दशकों से एक ही विधानसभा क्षेत्र को SC/ST उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रखने और सीटों का रोटेशन नहीं किए जाने को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की दलील थी कि आजादी के बाद से करीब 74-75 वर्षों में कुछ विधानसभा क्षेत्र लगातार आरक्षित बने हुए हैं। इससे दूसरे समान जनसंख्या वाले क्षेत्रों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
विधानसभा की आरक्षित सीटों पर SC का अहम फैसला।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा के आधार पर मतदान करें। अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब संविधान और कानून में विधानसभा की आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान नहीं है, तो क्या अदालत संसद या संबंधित प्राधिकारियों को ऐसा करने का निर्देश दे सकती है?
'हम संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते'
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, "हम संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते।" उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद को दोबारा विचार करने के लिए आवाज उठाई जा सकती है, लेकिन ऐसा फैसला विधायिका को ही करना होगा। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत है कि अनुसूचित जाति की अधिक आबादी वाले विधानसभा क्षेत्रों में आरक्षण केंद्रित हो गया है और वहां रोटेशन नहीं हो रहा है। लेकिन इस आधार पर कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। यह विधायिका और संवैधानिक प्राधिकारियों के विचार करने का विषय है।जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने क्या कहा?
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी खास समुदाय की अधिक आबादी वाले क्षेत्र को आरक्षित करने से समाज में जाति के आधार पर विभाजन की भावना पैदा होगी या नहीं, यह विधायिका को देखना है। केवल इस आधार पर कानून को संविधान के खिलाफ नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 330 लोकसभा और अनुच्छेद 332 राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। ये अनुच्छेद आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करने से संबंधित हैं, लेकिन यह तय नहीं करते कि कौन-सा विधानसभा क्षेत्र आरक्षित होगा।
जस्टिस बागची ने कहा कि परिसीमन कानून की धारा 9(1)(c) इस बारे में मार्गदर्शन देती है कि जिन क्षेत्रों में संबंधित समुदाय की आबादी अधिक है, उन निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के पीछे यह विचार भी है कि संबंधित समुदाय का प्रतिनिधि उस समुदाय की पहचान और परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ सके।
'राजनीतिक विचारधारा के आधार पर वोट कर सकते हैं'
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि किसी निर्वाचन क्षेत्र को 74-75 साल तक लगातार आरक्षित रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ ही परिवारों को बार-बार इसका लाभ मिल रहा है और इससे समुदाय के व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह मान लेना सही नहीं है कि किसी क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय के लोग केवल अपनी जाति या समुदाय के उम्मीदवार को ही वोट देंगे। मतदाता ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा के उम्मीदवार को चुन सकते हैं। उन्होंने कहा, "आपका वोट देने का अधिकार प्रभावित नहीं हो रहा है। आप किसी भी समुदाय के उम्मीदवार को वोट दे सकते हैं। लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि आप अपने समुदाय के उम्मीदवार को वोट नहीं दे सकते, तो इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।"
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति के चुनाव लड़ने का अधिकार केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। वह अन्य गैर-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ सकता है। बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाता राजनीतिक दलों की विचारधारा के आधार पर भी फैसला करते हैं। ऐसे में केवल उम्मीदवार की जाति को मतदान का आधार मानना उचित नहीं होगा।
अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी का सवाल
याचिकाकर्ता के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक एक ही सीट को आरक्षित रखना मनमाना और अनुचित है। उन्होंने कहा कि दूसरी ऐसी विधानसभा सीटें भी हैं, जहां संबंधित समुदाय की आबादी समान है, लेकिन उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत को मुख्य रूप से यह देखना है कि क्या व्यवस्था में स्पष्ट मनमानी है। किसी नीति या सीटों के चयन के मानदंड से अदालत सहमत हो या असहमत, इससे अपने आप वह असंवैधानिक नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करनी है, तो यह विधायिका और संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों के विचार का विषय है।
निकायों के आरक्षण से अलग है विधानसभा का मामला
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान है। ऐसे में विधानसभा की आरक्षित सीटों के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था होनी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि पंचायतों और नगर निकायों के लिए संविधान में अलग प्रावधान हैं। मौजूदा मामला अनुच्छेद 330, 332, जनप्रतिनिधित्व कानून और परिसीमन से जुड़ा है। अदालत संविधान या कानून में ऐसा प्रावधान नहीं जोड़ सकती, जो मौजूदा कानूनी ढांचे में मौजूद नहीं है। जस्टिस बागची ने कहा कि पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए रोटेशन की शक्ति संविधान के अलग अध्याय के तहत दी गई है। विधानसभा की आरक्षित सीटों के मामले में ऐसी व्यवस्था लागू करने का निर्देश अदालत नहीं दे सकती।CJI की टिप्पणी- 'गलत नंबर डायल कर रहे हैं आप'
सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प क्षण तब आया, जब याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी दलील जोर देकर रखी। इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की, 'आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। यह धरना-प्रदर्शन का मौसम है, आपको भी ऐसा ही करना चाहिए।' वकील ने जवाब दिया कि अगर उनकी आवाज विरोध जैसी लग रही है तो वह माफी चाहते हैं, उनका गला खराब है और उनका विरोध करने का कोई इरादा नहीं है। इस पर CJI ने कहा कि याचिकाकर्ता यह आवाज उठा सकते हैं कि संसद के लिए अब इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है, लेकिन ऐसा कदम विधायिका ही उठा सकती है।
क्या था याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क?
याचिकाकर्ता का कहना था कि 1952 से लेकर अब तक कुछ विधानसभा क्षेत्र लगातार आरक्षित बने हुए हैं। इससे चुनाव लड़ने के इच्छुक दूसरे उम्मीदवारों के विकल्प सीमित हो रहे हैं और आरक्षण का लाभ कुछ परिवारों तक सिमटने का आरोप है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि विधानसभा की SC/ST आरक्षित सीटों पर भी पंचायतों और नगर निकायों की तरह रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि मौजूदा कानूनी ढांचे में विधानसभा की आरक्षित सीटों का रोटेशन अनिवार्य करने का निर्देश अदालत नहीं दे सकती। याचिकाकर्ता इस मुद्दे पर संसद और संबंधित विधायी प्राधिकारियों के समक्ष अपनी मांग रख सकता है।
