सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संभल जामा मस्जिद कमेटी की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसने ट्रायल कोर्ट के मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के आदेश को बरकरार रखा था। यह मामला हिंदू पक्षकारों की ओर से दायर सिविल सूट से जुड़ा है।
संभल जामा मस्जिद विवाद (फाइल फोटो)
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने मामले की सुनवाई की। मस्जिद कमेटी की ओर से सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी और एडवोकेट निजाम पाशा, हिंदू पक्षकारों की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलीलें रखीं।
क्या है सम्भल जामा मस्जिद का पूरा विवाद?
हिंदू पक्ष की ओर से 2024 में चन्दौसी की कोर्ट में सिविल सूट दाखिल किया गया था। इसमें संभल जामा मस्जिद में धार्मिक अनुष्ठान और पूजा करने के लिए प्रवेश का अधिकार मांगा गया है। हिंदू पक्ष का दावा है कि इस स्थान पर मूल रूप से हिंदू मंदिर था, जिसे 16वीं शताब्दी में तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया।ट्रायल कोर्ट ने 19 नवंबर 2024 को मस्जिद परिसर का स्थानीय निरीक्षण करने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था। इसके बाद संभल में हिंसा हुई थी, जिसमें छह लोगों की मौत हुई।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मई 2025 को ट्रायल कोर्ट के सर्वे के आदेश को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस स्तर पर यह नहीं माना जा सकता कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल मुकदमा प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 के तहत प्रतिबंधित है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को अंतिम रूप से तय नहीं किया था और इसे आगे मुकदमे की कार्यवाही के दौरान उठाने की गुंजाइश रखी थी।
यूपी सरकार ने कहा- विवाद के मेरिट में नहीं जाना चाहते
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश एएसजी केएम नटराज ने कहा कि राज्य सरकार मुख्य विवाद के मेरिट में नहीं जाना चाहती, क्योंकि मूल मुकदमा अभी ट्रायल कोर्ट में लंबित है।उन्होंने कहा कि मामला धार्मिक अधिकारों से जुड़ा होने के कारण राज्य दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है। हालांकि, उनकी दलीलों का मुख्य फोकस प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की व्याख्या पर रहा।नटराज ने एक्ट की धारा 2 और 3 का हवाला देते हुए कहा कि धारा 2 में ‘कन्वर्जन’ की व्यापक परिभाषा है, जबकि धारा 3 किसी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन पर रोक लगाती है।उन्होंने कहा कि यह देखना होगा कि संबंधित कार्यवाही वास्तव में किसी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन से जुड़ी है या नहीं। अगर कार्यवाही किसी धार्मिक चरित्र के परिवर्तन से संबंधित नहीं है, तो प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की रोक लागू नहीं होगी।हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार मूल धार्मिक विवाद के मेरिट पर कोई पक्ष नहीं ले रही है।
हिंदू पक्ष ने अपने समर्थन में क्या कहा?
हिंदू पक्ष की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने कहा कि संभल की मौजूदा मस्जिद प्राचीन स्मारक कानून के तहत संरक्षित है। उन्होंने दावा किया कि नवंबर 1920 में ही इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था।उन्होंने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा 4(3)(a) का हवाला देते हुए कहा कि एक्ट के प्रावधान प्राचीन स्मारकों पर लागू नहीं होते।जैन ने मध्य प्रदेश के भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अगर प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट हर स्थिति में पूरी तरह रोक लगाता है, तो सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच भोजशाला मामले को हाईकोर्ट में वापस नहीं भेजती।जैन ने यह भी दावा किया कि स्मारक में कथित बदलावों को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों ने भी टिप्पणियां की हैं। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि ये दलीलें मूल विवाद के मेरिट से जुड़ी हैं, जो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा नहीं है।
अयोध्या फैसले का भी हुआ जिक्र
हिंदू पक्ष ने अयोध्या फैसले में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर मस्जिद कमेटी की निर्भरता का भी जवाब दिया। जैन ने कहा कि अयोध्या फैसले में की गई ये टिप्पणियां ऑबिटर थीं और मुख्य विवाद का आधार नहीं थीं, क्योंकि अयोध्या मामले को खुद 1991 के एक्ट से बाहर रखा गया था।उन्होंने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी अंतिम रूप से यह नहीं कहा है कि संभल का मुकदमा प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत प्रतिबंधित नहीं है। यह सवाल आगे इश्यू फ्रेम करने या सीपीसी के ऑर्डर VII रूल 11 के तहत आवेदन के समय उठाया जा सकता है।
मस्जिद कमेटी की दलील- धारा 3 अपने आप में रोक लगाती है
मस्जिद कमेटी की ओर से सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी ने जवाबी दलील में कहा कि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा 3 अपने आप में पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन पर रोक लगाती है।उन्होंने कहा कि एक्ट की संवैधानिक वैधता और इसके प्रावधानों की व्याख्या का सवाल पहले से ही सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के सामने लंबित है।अहमदी ने तर्क दिया कि धारा 4(3) में प्राचीन स्मारकों को लेकर दिए गए अपवाद का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि ऐसे स्मारक धारा 3 के संरक्षण से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे।उन्होंने सवाल उठाया कि अगर प्राचीन स्मारकों को धारा 3 के दायरे से बाहर कर दिया जाए तो प्राचीन मंदिरों और मस्जिदों के धार्मिक चरित्र में बदलाव के खिलाफ 1991 के एक्ट में दी गई सुरक्षा का क्या होगा?अहमदी ने कहा कि अगर कोई प्राचीन स्मारक अभी भी पूजा स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रहा है, तो उसके धार्मिक चरित्र की सुरक्षा धारा 3 के तहत बनी रहनी चाहिए।
भोजशाला मामले पर भी दिया जवाब
अहमदी ने हिंदू पक्ष की ओर से भोजशाला मामले के दिए गए उदाहरण को अलग बताया। उन्होंने कहा कि भोजशाला मामले में मुख्य सवाल एएसआई के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका की मेंटेनेबिलिटी का था, जबकि संभल का मामला सीधे एक सिविल सूट में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के लागू होने से जुड़ा है।उन्होंने यह भी कहा कि भोजशाला मामले में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की व्याख्या का कोई रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच को नहीं भेजा गया था।अहमदी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या करीब 50 साल बाद दायर किए गए मुकदमे में बिना दूसरे पक्ष को नोटिस दिए एकतरफा तरीके से सर्वे का आदेश दिया जा सकता है।
दिसंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का भी हवाला
एडवोकेट निजाम पाशा ने प्राचीन स्मारक कानून की धारा 16 का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई प्राचीन स्मारक पूजा स्थल है, तो उसका इस्तेमाल उसके धार्मिक चरित्र के विपरीत नहीं किया जा सकता।उन्होंने दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूजा स्थलों से जुड़े मुकदमों में पारित अंतरिम आदेश का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश “any proceeding” को कवर करता है और इसलिए हाईकोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाकर गलती की।
सर्वे के तरीके पर भी पहले सवाल उठा चुकी है कमेटी
मस्जिद कमेटी पहले की सुनवाई में यह दलील दे चुकी है कि एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति बिना नोटिस दिए एकतरफा की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने यह भी स्पष्ट नहीं किया था कि स्थानीय जांच किन विशेष बिंदुओं पर की जानी है।कमेटी ने यह सवाल भी उठाया था कि जब हिंदू पक्ष की कथित शिकायत करीब 70 साल पुरानी है, तो अचानक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की इतनी जल्दबाजी क्यों की गई।कमेटी का तर्क था कि सीपीसी के ऑर्डर XXVI रूल 9 के तहत कमिश्नर नियुक्त करने का उद्देश्य अदालत की मदद के लिए स्थानीय जांच कराना है, न कि किसी पक्ष को अपने मामले के लिए “सबसे बेहतर सबूत” जुटाने का अवसर देना। अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।
