500 रुपये की एक घड़ी को लेकर दो पड़ोसियों के बीच शुरू हुआ विवाद आखिरकार 29 साल बाद अपने कानूनी मुकाम पर पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 की इस घटना से जुड़े आपराधिक मामले का निस्तारण करते हुए एकमात्र जीवित दोषी की सजा घटाकर उतनी कर दी,जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है।
सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि तीन दोषियों में से दो की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो चुकी है,जबकि तीसरे आरोपी मथू की उम्र अब 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है।
500 रुपये की घड़ी से शुरू हुआ था विवाद
मामले के अनुसार, पदम सिंह ने अपने पड़ोसी मनुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। बाद में मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और उसने उसे लौटाने की कोशिश की। इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो जल्द ही हाथापाई में बदल गई।कुछ समय बाद मनुआ ने रामू और मथू के साथ मिलकर पदम सिंह पर उस समय हमला कर दिया, जब वह एक सूखी नहर के किनारे खड़ा था। आरोपियों ने उसे नहर में धक्का दे दिया। अभियोजन के अनुसार,मथू ने सिंह के सिर पर भारी पत्थर से भी वार किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके बाद दून अस्पताल में इलाज के दौरान पदम सिंह की मौत हो गई।
निचली अदालत और हाईकोर्ट ने बरकरार रखी थी सजा
देहरादून की ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2002 में तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए पांच-पांच वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2012 में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। फिर उसी साल इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?
अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घटना 12 फरवरी 1997 की है और तब मथू की उम्र 33 वर्ष थी,जबकि अब लगभग तीन दशक बीत चुके हैं और उसकी उम्र 60 वर्ष से अधिक हो गई है। पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि मृतक और आरोपियों के बीच पहले बहस हुई,जो बाद में हाथापाई में बदल गई। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मृतक के चेहरे और खोपड़ी पर लगी चोटें सूखी और पथरीली नहर में गिरने से भी आई थीं। इस दौरान अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि मथू पहले ही करीब डेढ़ वर्ष की सजा काट चुका है।
सजा घटाकर पहले से काटी गई अवधि तक सीमित
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाएगा,लेकिन पांच वर्ष की सजा घटाकर उतनी ही मानी जाएगी, जितनी अवधि मथू पहले ही जेल में बिता चुका है। अदालत ने माना कि इतने लंबे समय के बाद यही आदेश न्याय के उद्देश्य को पूरा करेगा।
