देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन यानी परिसीमन (Delimitation) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस गंभीर मुद्दे पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने अपनी बेबाक राय रखी है। उन्होंने कहा कि संविधान में जो प्रावधान दिए गए हैं, उन्हें लागू किया जाना चाहिए। अगर देश की राजनीतिक पार्टियां इसे लागू नहीं करना चाहती हैं, तो उन्हें एक साथ आकर संविधान में नया बदलाव करना चाहिए, लेकिन इस तरह फैसलों को बीच में लटकाकर रखना सही नहीं है।
परिसीमन पर बोले राज्यसभा उपसभापति हरिवंश (फाइल फोटो)
एक साक्षात्कार के दौरान उपसभापति ने पुरानी सरकारों का जिक्र करते हुए बताया कि भारत के राजनीतिक इतिहास में परिसीमन की प्रक्रिया को पहले भी दो बार टाला जा चुका है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में तत्कालीन परिस्थितियों के कारण इसे आगे बढ़ाया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कब तक संविधान में दर्ज बातों को अनिश्चित काल के लिए टालते रहेंगे? क्या हम इस तरह की अनिर्णय की स्थिति को सही ठहराना चाहते हैं?
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मैं हमेशा संविधान के सम्मान का पक्षधर हूं-हरिवंश
हरिवंश ने स्पष्ट किया कि वे एक निष्पक्ष संवैधानिक पद पर हैं और संविधान के सम्मान के पक्षधर हैं। संसद को यह तय करना होगा कि वह संविधान के अनुसार कदम बढ़ाना चाहती है या सभी दलों की सहमति से नया रास्ता चुनना चाहती है। यह पूरी चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब 33 प्रतिशत महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को परिसीमन से जोड़ने पर सवाल उठ रहे हैं।
नियमों के अनुसार, महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली जनगणना और उसके बाद के परिसीमन पर निर्भर है। हाल ही में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़े विधेयक पर भी संसद में काफी गहमागहमी देखी गई थी। अब देखना यह होगा कि राजनीतिक दल इस संवैधानिक गतिरोध को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
