Ex-SC Judge Sanjay Kishan Kaul- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने अदालतों के राजनीतिक मामलों में इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि न्यायपालिका का इस्तेमाल सत्तारूढ़ निकाय (सरकार) के खिलाफ विपक्ष की बंदूकें चलाने के लिए एक राजनीतिक मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए जस्टिस कौल ने जोर देकर कहा कि अदालत का हस्तक्षेप पूरी तरह से कानूनी मुद्दों तक ही सीमित होना चाहिए न कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तक।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कौल ने क्या-क्या कहा?
राजनीतिक मुद्दों को अदालत के बाहर सुलझाएं
जस्टिस कौल ने कहा कि अदालतों को संवैधानिक 'चेक एंड बैलेंस' यानी नियंत्रण और संतुलन के रूप में काम करना चाहिए, न कि राजनीतिक खींचतान का साधन बनना चाहिए। अतीत का अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा, मैंने चेन्नई और अन्य जगहों पर देखा है, जहां कई ऐसे मामले लाए गए। मैंने याचिकाकर्ताओं से कहा कि इसे अदालत में मत लाओ, यह एक राजनीतिक मुद्दा है। कृपया इसे अदालत के बाहर किसी अलग मंच पर ले जाएं। अगर यह कोई कानूनी मुद्दा उठाता है, तब अदालत इस पर विचार करेगी... संविधान निर्माताओं ने अदालत को एक चेक एंड बैलेंस के रूप में देखा था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका इस्तेमाल विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष पर निशाना साधने के लिए किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज इस समय वैचारिक रूप से काफी विभाजित है।
चुनाव आयोग (ECI) और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा
विपक्ष द्वारा संवैधानिक निकायों के खिलाफ न्यायपालिका का रुख करने के सवाल पर जस्टिस कौल ने कहा, अदालतों को खुद पर और चुनाव आयोग (ECI) जैसी अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास बना रहना सबसे महत्वपूर्ण है।
'भक्त बनाम हेटर' मानसिकता और न्यायपालिका पर दबाव
राजनीतिक रूप से अत्यधिक ध्रुवीकृत वातावरण पर चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस कौल ने कहा, समाज में भक्त (समर्थक) या हेटर (विरोधी) जैसी चरम सोच हावी हो रही है, जिससे मध्यम मार्ग की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
अदालती फैसलों को पक्षपात न समझें
लोग इतना जुड़ जाते हैं कि यह स्वीकार नहीं कर पाते कि सरकार द्वारा किए गए कुछ काम अच्छे भी हो सकते हैं, या अदालत का सरकार से असहमत होना कोई राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं है। यह अदालत का संवैधानिक काम है। उन्होंने सचेत किया कि अत्यधिक सार्वजनिक दबाव और ध्रुवीकृत माहौल के कारण जजों के लिए संवेदनशील मुद्दों पर फैसला लेना कठिन और प्रतिबंधात्मक हो जाता है।
कहा- मैंने न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की तारीफ की है
अपनी आत्मकथा 'विदाउट फियर ऑफ फेवर' के बारे में एएनआई को दिए एक साक्षात्कार में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने कहा, लोग मुझसे भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ के बारे में लिखने पर सवाल करते रहे हैं। मैंने उनकी प्रशंसा वहीं की है जहां मुझे लगा कि उन्हें प्रशंसा की आवश्यकता है; मैंने कहा कि उनमें न्यायिक क्षमता है। उनमें कड़ी मेहनत करने की क्षमता है। मैंने उनसे एक विशिष्ट पहलू पर सवाल किया था। कभी-कभी सोशल मीडिया पर बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर मैं उनसे असहमत था।
"लिखने से बेहतर है न लिखना...मैंने बहुत सोचा-समझा, हालांकि प्रकाशक मेरे सेवानिवृत्ति से पहले ही मुझे कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे थे क्योंकि उन्हें मेरे फैसले देखकर मेरी शैली पसंद आई थी...लेकिन मैंने वास्तव में इसे पिछले साल अप्रैल में ही शुरू किया। मैं इसे टालता रहा। इसके कुछ कारण थे। पहला, जब आप कुछ समय के लिए दूर रहते हैं तो आपका दृष्टिकोण अधिक निष्पक्ष हो जाता है। दूसरा, मैं नहीं चाहता था कि जिन व्यक्तियों के बारे में मुझे चर्चा करनी है वे पद पर हों क्योंकि इससे मेरे काम में बाधा उत्पन्न होगी।"
वे जो कर रहे थे, वह दूसरी बात है। तीसरी बात, मैंने इसलिए लिखा क्योंकि मुझे लगा कि लंबे समय से किसी ने कुछ नहीं लिखा है। यह जीवन की एक यात्रा है, कोई कानून की किताब नहीं। मुझे यह भी लगा कि पूरा सिस्टम—राजनीतिक सिस्टम, प्रेस, हर कोई—मुद्दे उठा रहा था। मुद्दों को दबाना संभव नहीं है। क्या हम अपने काम करने के तरीके को छिपाते हैं या उजागर करते हैं? इसके कुछ सकारात्मक पहलू हैं, कुछ नकारात्मक पहलू हैं। बात यही है।
INDIA ब्लॉक की याचिका और SIR विवाद
जस्टिस कौल की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब चुनाव आयोग (ECI) की विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया को लेकर कानूनी और राजनीतिक घमासान तेज है राहुल गांधी सहित इंडिया गठबंधन के नेताओं ने 12 अक्टूबर के विरोध मार्च के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त याचिका दायर की थी। इसमें SIR प्रक्रिया के न्यायिक ऑडिट, हटाए गए मतदाताओं के आंकड़े सार्वजनिक करने और विभिन्न राज्यों में इस अभ्यास पर रोक लगाने की मांग की गई है।
चुनाव आयोग (ECI) का जवाब
विवाद तब और बढ़ा जब मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने बिना पूर्ण सहमति के लिए गए फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करते हुए चुनाव आयोग ने एकतरफा कार्रवाई के आरोपों को खारिज कर दिया। ECI ने स्पष्ट किया कि 2025 और 2026 के दौरान जारी किए गए तीनों SIR आदेश आयोग के सर्वसम्मति से लिए गए फैसले थे। इसके अलावा चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया कि मतदाता पंजीकरण के फॉर्म 6 (Form 6) में कोई संशोधन नहीं किया गया है।
