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आज से तीन दिन के भारत दौरे पर नेपाली विदेश मंत्री, 1950 से अब तक संबंध कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खानाल आज से तीन दिवसीय भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस दौरान व्यापार, ऊर्जा, संपर्क और सीमा विवाद सहित कई अहम मुद्दों पर बातचीत हो सकती है। इस बीच चलिए जानते हैं 1950 से आज तक दोनों देशों के बीच संबंध कैसे रहे हैं।

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शिशर खनाल के दौरे से भारत-नेपाल के रिश्ते होंगे रिन्यू
Authored by: Digpal Singh
Updated Jun 5, 2026, 16:00 IST
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नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खानाल (Shishir Khanal) आज यानी शुक्रवार 5 जून को अपनी तीन दिन की आधिकारिक यात्रा पर भारत आ रहे हैं। उनके इस दौरे को दोनों देशों के रिश्तों में सुधार के लिए एक बड़ा कूटनीतिक बदलाव भी माना जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हाल के समय में दोनों देशों के संबंध काफी ठंडे पड़े हैं। यहां व्यापार, निवेश, संपर्क मार्ग, ऊर्जा जैसे मुद्दों पर बातचीत होगी। दोनों देशों के संबंध तो सदियों पुराने हैं, लेकिन हाल के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिससे संबंधों को फिर से री-स्टार्ट करने की जरूरत है। आजादी के बाद से आज तक भारत-नेपाल के संबंध कैसे रहे हैं और दोनों देशों का एक-दूसरे के लिए क्या महत्व है? आज नेपाली विदेश मंत्री की भारत यात्रा के अवसर पर इन्हीं पहलुओं को समझते हैं।

आपसी रिश्ते और हालिया अपडेट

भारत और नेपाल का बॉर्डर एक खुली सीमा है। दोनों देशों के लोग हमेशा से बिना वीजा के सीमा के आर-पार सिर्फ एक पहचान पत्र के जरिए आते-जाते रहते हैं। लेकिन हाल में नेपाल की तरफ से इसमें कुछ फेरबदल किया गया है। अब भारतीय नागरिक सिर्फ आधार दिखाकर नेपाल में एंट्री नहीं ले सकते। नेपाल सरकार का कहना है कि बिना वोटर आई कार्ड या किसी अन्य वैध सरकारी पहचान पत्र के भारतीयों को नेपाल में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलेगी। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने हाल ही में संसद में एक भाषण दिया, जो भारत और नेपाल दोनों देशों में काफी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा, 'जांच कराने से पता चला कि न सिर्फ भारत, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारत के क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है।' ज्ञात हो कि दोनों देशों के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना सीमा विवाद है। नेपाल इन इलाकों को अपना बताता है, जबकि यह सभी इलाके सदियों से भारत का हहिस्सा हैं।

1950-1980 के दशक तक

भारत और नेपाल के संबंध भले ही दोस्ताना रहे हों, लेकिन इनमें एतिहासिक तनाव भी रहा है और इससे आगे बढ़कर यह कार्यात्मक आर्थिक परस्पर निर्भरता का एक मॉडल भी है। अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने और विभाजन का दंश झेलने के बाद नए भारत की नींव रखी जा रही थी। उधर नेपाल में राजशाही कायम थी। भारत और नेपाल के संबंधों की नींव 1950 की शांति और मित्रता संधि से रखी गई। इस संधि के अनुसार दोनों देशों के बीच खुली सीमा रखी गई और नेपाली नागरिकों को भारत में नागरिकों जैसे अधिकार मिले। इसके तहत नेपाली नागरिक भारत में बिना वीजा के रह और काम भी कर सकते हैं। हालांकि, इस दौरान भारत के प्रभाव को संतुलित करने के लिए नेपाल के राजतंत्र ने अक्सर 'चीन कार्ड' खेला। इससे राजनीतिक तनाव भी पैदा हुआ और 1989 की व्यापार नाकेबंदी जैसी घटनाएं हुईं।

1990 से 2014 तक का समय

भारत ने 1990 से 2006 के बीच नेपाल में लोकतंत्र के लिए चलने वाले आंदोलनों का समर्थन किया और 2006 के व्यापक शांति समझौते में अहम भूमिका निभाई। इसी समझौते के तहत नेपाल के माओवादी मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हुए। इसी दौरा में दोनों देशों के बीच विकास को लेकर सहयोग भी बढ़ा। इसके तहत साल 1996 के महाकाली संधि जैसे एग्रीमेंट हुए, ताकि नेपाल के हाइड्रोपावर शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया जा सके।

दोनों देशों के रिश्ते में सबसे खराब दौर 2016-20 तक

नेपाल के नए संविधान पर भारत ने ठंडी प्रतिक्रिया दी। इसके कारण दोनों देशों की सीमा पर महीनों तक अघोषित नाकेबंदी रही। इस नाकेबंदी से मानवीय संकट पैदा हुआ और नेपाल में भारत-विरोधी भावनाएं भी और गहरी हुईं। फिर 2020 के मैप विवाद ने दोनों देशों के रिश्तों को और नुकसान पहुंचाया, जब नेपाल ने अपने आधिकारिक नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख जैसे भारतीय क्षेत्रों को अपना दिखाया।

ऊर्जा और डिजिटल बदलाव (2024–मार्च 2026)

दोनों देशों के बीच जनवरी 2024 में एक एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत भारत को अगले 10 साल तक नेपाल से 10 हजार मेगावाट बिजली आयात करनी थी। इस तरह से भारत, नेपाल के लिए सबसे स्थित ऊर्जा बाजार बन गया। डिजिटल युग में भारत के UPI को नेपाल के नेशनल पेमेंट्स इंटरफेस (NPI) के साथ जोड़ने से नेपाल को और लाभ मिला। अब भारत में काम करने वाले लाखों नेपाली नागरिकों के लिए अपने घर पैसा भेजना आसान हो गया।

NPI UPI

NPI UPI

नेपाल में लोकतंत्र अभी शैशवावस्था में है। वहां पर अक्सर बड़े-बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिलते हैं। इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध इन बदलावों से लगभग अछूते रहते हैं। साल 2025 का Gen-Z विरोध प्रदर्शन भी इसमें शामिल है।

दोनों देशों का एक-दूसरे के लिए महत्व

भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच में बसा नेपाल एक बफर स्टेट है। यहां पर राजनीतिक स्थितरता भारत के लिए बहुत जरूरी है, ताकि चीनी सेना भारतीय सीमाओं की तरफ नजर न डाले। दोनों देशों के बीच 1751 किमी लंबी सीमा है, लेकिन लोग बिना वीजा के दोनों तरफ आ-जा सकते हैं। भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट का नेपाल के साथ गहरा रिश्ता है, इस रेजिमेंट में 32000 नेपाली नागरिक शामिल हैं। दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते हैं, सीमा के आर-पार शादियां आम बात हैं।

हिंदू और बौध संस्कृति दोनों को जोड़ते हैं। पशुपतिनाथ, जनकपुर और लुम्बिनी दोनों देशों के संबंधों को प्रागढ़ बनाते हैं। भारत, नेपाल का बहुत बड़ा व्यापारिक साझीदार है। क्योंकि नेपाल समुद्र से नहीं जुड़ा है, इसलिए वह इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट के लिए भारत के कोलकाता, हल्दिया और विशाखापट्टनम जैसे पोर्ट्स पर निर्भर है। इसके अलावा नेपाल को लगभग 100 फीसद पेट्रोलियम भारत से ही निर्यात होता है। इसके अलावा भोजन, मशीनिरी और दवाएं भी भारत ही नेपाल को देता है। भारत में नेपाल के लगभग 80 लाख लोग रोजी रोटी कमाते हैं और अपने देश भेजते हैं।

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