साल 2022 में में 'आजादी का अमृत महोत्सव' के तहत ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत की गई थी। अभियान का उद्देश्य था कि लोगों से अपने घरों पर तिरंगा फहराने की अपील की गई, ताकि राष्ट्रीय ध्वज केवल सरकारी भवनों या औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों के दैनिक जीवन का भी हिस्सा बने। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लाल किले की प्राचीर पर, विदेशों में भारतीय दूतावासों में या देश के वीरों की अंतिम यात्रा का हिस्सा हमारा राष्ट्रीय ध्वज कहां बनता है? आइए जानते हैं
कहां बनता है तिरंगा
चकाचौंध से दूर, उत्तर कर्नाटक के धारवाड़ जिले में हुबली के पास बसा एक छोटा सा गांव 'बेंघेरी' (Bengeri) इस ऐतिहासिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी को पिछले कई दशकों से अपने कंधों पर उठाए हुए है। यहां स्थित कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ' (KKGSS) भारत की एकमात्र ऐसी संस्था है, जिसे भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) और फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत आधिकारिक तौर पर देश का राष्ट्रीय ध्वज बनाने का कानूनी एकाधिकार प्राप्त है।
स्वतंत्रता सेनानियों के एक सपने से हुई थी शुरुआत
इस ऐतिहासिक सफर की नींव 1 नवंबर 1957 को रखी गई थी। स्वतंत्रता सेनानी वेंकटेश मगडी और खादी के समर्थकों के एक समूह ने ग्रामीण भारत को स्वावलंबी बनाने और महात्मा गांधी के खादी आंदोलन को जीवित रखने के विचार से KKGSS का गठन किया था। मात्र 10,500 रुपये के निवेश से शुरू हुई यह संस्था आज 17 एकड़ में फैली हुई है। साल 2004 में संस्था ने पूर्ण शुद्धता और नियमों के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज बनाने का बीड़ा उठाया और साल 2006 में BIS ने KKGSS को देश में राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण और आपूर्ति के लिए एकमात्र अधिकृत केंद्र का प्रमाणपत्र सौंपा।
khadi gramodyoga center
बागलकोट से हुबली: सूत से राष्ट्रध्वज बनने की पूरी यात्रा
पहले भारतीय ध्वज संहिता (Flag Code of India) का नियम बेहद सख्त था, राष्ट्रीय ध्वज केवल हाथ से काते गए और हाथ से बुने गए सूती, रेशमी या ऊनी खादी के कपड़े से ही बन सकता था। इसमें किसी भी प्रकार का सिंथेटिक या पॉलिस्टर कपड़ा इस्तेमाल करना गैर-कानूनी था। लेकिन 30 दिसंबर 2021 को सरकार ने इन नियमों में संशोधन किए और ऊन, सिल्क और खादी के अलावा मशीन से काते कपास, पॉलिएस्टर से तैयार झंडे को भी अनुमति दी गई। इससे तिरंगे की कीमत में कमी आई।
चरण 1: सूत की कताई एवं बुनाई (तुलासीगेरी): खादी कपड़े का निर्माण
बागलकोट जिले के तुलासीगेरी गांव में कुशल बुनकर अपने हाथों से सूती खादी का मजबूत कपड़ा तैयार करते हैं। यह कपड़ा साधारण नहीं होता, बल्कि डेनिम से भी अधिक मजबूत माना जाता है।
चरण 2: गुणवत्ता जांच (हुबली): 18 क्वालिटी टेस्ट
तुलासीगेरी से तैयार कपड़ा बेंघेरी (हुबली) स्थित KKGSS के मुख्य परिसर में लाया जाता है, जहां धागों की मजबूती, वजन और बनावट के 18 कड़े मानकों पर इसे परखा जाता है।
चरण 3: रंगाई एवं स्क्रीन प्रिंटिंग: केसरिया, सफेद, हरा और अशोक चक्र
कपड़े को तीन हिस्सों में विभाजित कर फ्लैग कोड के तय शेड के अनुसार केसरिया, सफेद और हरे रंग में रंगा जाता है। सफेद हिस्से के ठीक केंद्र में स्क्रीन प्रिंटिंग तकनीक से दोनों तरफ गहरे नीले रंग का 24 तीलियों वाला अशोक चक्र अंकित किया जाता है।
चरण 4: सिलाई और पैकिंग
विशेषज्ञ कारीगर तीनों पट्टियों को 3:2 के सटीक आयताकार अनुपात में जोड़ते हैं। इसके बाद तिरंगे के केसरिया रंग को भीतर की ओर रखकर खास तरह से मोड़ा जाता है ताकि वह रंग फीका न पड़े। जिसके बाद इसे पैक कर देश भर में भेजा जाता है।
जहां 1 मिमी की गलती भी बर्दाश्त नहीं
इस पूरी निर्माण इकाई का असली दिल महिला कारीगर हैं। इस केंद्र में काम करने वाले कताई, बुनाई, रंगाई और सिलाई के विशेषज्ञों में अधिकांश महिलाएं हैं। कर्मचारियों की बात करें तो यहां 100 से अधिक विशेषज्ञ महिला कताई और बुनाई कारीगर हैं। जो 6x4 इंच से लेकर 21x14 फीट तक के 9 तय आकार के तिरंगों को बनाने में योगदान देती हैं। जिसको लेकर नियम इतने सख्त हैं कि रंग या माप में 1 मिलीमीटर की भी गड़बड़ी होने पर पूरा ध्वज खारिज कर दिया जाता है।
बेंघेरी के इस केंद्र में काम करने वाले कारीगरों के लिए यह केवल एक नौकरी या रोजगार नहीं है, बल्कि एक पवित्र काम की तरह है। BIS के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि तिरंगे के माप, कपड़े के धागों की संख्या या रंग में जरा सा भी दोष पाया जाता है, तो उसे कानूनी अपराध माना जाता है जिसमें भारी जुर्माना या सजा का प्रावधान है। यही कारण है कि यहां का हर कर्मचारी हर सिलाई और हर धागे को देश के प्रति अपनी भक्ति मानकर ही पिरोता है। अगली बार जब भी आप आकाश में फहराते हुए तिरंगे को देखें और उसे सलाम करें, तो कर्नाटक के हुबली स्थित इस छोटे से गांव बेंघेरी की उन कर्मठ महिला कारीगरों को भी याद जरूर करें, जिनके हुनर से देश का यह राष्ट्रीय गौरव आकार लेता है।
