मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने हाल ही में अपनी नाबालिग बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी एक व्यक्ति की मौत की सजा को कम कर उम्रकैद की सजा सुनाई । कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, "फांसी की सजा की तुलना में ताउम्र जेल में रहना कहीं बड़ी सजा है।"
मद्रास हाईकोर्ट ने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति को उम्रकैद की सजा सुनाई। istock
क्या है मामला?
यह मामला एक पिता द्वारा अपनी ही सगी बेटी के साथ किए गए जघन्य अपराध से जुड़ा है। निचली अदालत (Trial Court) ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को 'मृत्युदंड' की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में अपील की थी।अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस पी.एन. प्रकाश और जस्टिस आर. हेमलता की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कई गंभीर पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने कहा कि मौत की सजा तो कुछ ही पलों में जीवन समाप्त कर देती है, लेकिन 'उम्रकैद' (बिना किसी छूट के) अपराधी को हर दिन उसके द्वारा किए गए जघन्य कृत्य की याद दिलाती है। जेल की दीवारों के बीच पछतावे के साथ जीना मौत से भी बदतर हो सकता है।
हालांकि अपराध बेहद घृणित था, लेकिन अदालत ने सजा को कम करते हुए यह सुनिश्चित किया कि अपराधी को समाज में वापस आने का मौका न मिले। कोर्ट ने मौत की सजा को हटाकर उसे 'बिना किसी छूट के ताउम्र कैद' (Life Imprisonment without remission) में बदल दिया। इसका मतलब है कि वह व्यक्ति मरते दम तक जेल में ही रहेगा।
अकेलेपन में जिंदगी जी रहा दोषी
अदालत ने गौर किया कि दोषी मुरुगन पहले से ही घोर अकेलेपन में जिंदगी जी रहा है, क्योंकि उसके परिवार और समुदाय ने उसे पूरी तरह से त्याग दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, "वह घोर एकांत की स्थिति में जी रहा है, परिवार, गांव और समाज से कटा हुआ। यह स्थिति, एक जीवित निर्वासन के समान, महज एक आकस्मिक कठिनाई नहीं बल्कि निरंतर और गंभीर दंड का रूप है।"
बता दें कि मुरुगन अपनी 14 वर्षीय बेटी के साथ बार-बार किए गए जघन्य यौन उत्पीड़न के मामले में एकमात्र आरोपी था। अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया कि मुरुगन ने अपनी पत्नी की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर पीड़िता की कमजोरी और अकेलेपन का शोषण किया। पीड़िता ने गवाही दी कि उसके साथ बीस से अधिक बार यौन उत्पीड़न किया गया।
