Justice Verma Cash Case: घर से कैश मिलने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा लोकसभा जांच समिति की रिपोर्ट में दोषी पाए गए हैं। जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगाए गए तीनों आरोप सही पाए गए हैं। लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह ने भी जांच समिति की दो खंडों वाली रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रखी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी थी। बिरला ने 12 अगस्त 2025 को, न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित रूप से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की जांच के लिए इस समिति का गठन किया था।
जस्टिस यशवंत वर्मा लोकसभा जांच समिति की रिपोर्ट में दोषी पाए गए (फोटो- PTI)
पहला आरोप- अघोषित नकदी
नई दिल्ली स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट के आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम से ₹500 के नोटों के रूप में बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने का मामला सामने आया। समिति के अनुसार, जज नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। इस आधार पर समिति ने पहले आरोप को सिद्ध माना।
दूसरा आरोप- साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही
समिति ने पाया कि मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित और संरक्षित नहीं रखा गया था। कानूनी सीलिंग और निरीक्षण की प्रक्रिया से पहले ही स्टोररूम की स्थिति में बदलाव किए जाने की बात सामने आई। इसके अलावा बाद में कुछ करेंसी नोटों के गायब या अनुपलब्ध होने का भी कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला। समिति ने इसे साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और विफलता माना, हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि जज ने खुद नोटों को हटाया था।
तीसरा आरोप- टालमटोल और असंतोषजनक जवाब
समिति ने जज की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण, खासकर 22 मार्च 2025 के जवाब को संतोषजनक नहीं माना। समिति के अनुसार, उनका रुख टालमटोल वाला रहा और यह संस्थागत जिम्मेदारी तथा अपेक्षित स्पष्टता के अनुरूप नहीं था। स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस आरोप को भी सिद्ध पाया गया।
14 मार्च 2025 को मिला था कैश
न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा दे दिया और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे को अभी तक कानून मंत्रालय ने अधिसूचित नहीं किया है। विवाद के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था जो घटना के समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर ’’सक्रिय या मौन नियंत्रण’’ था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी।
महाभियोग की थी तैयारी
जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए उनपर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद अगस्त में बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था। हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के मद्देनजर न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई।
