Hyderabad House History: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मेहमानों का तांता लगा हुआ है, वजह है ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit 2026)। शनिवार और रविवार को ब्रिक्स सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों संग द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे, जो भारत मंडपम में आयोजित होंगी। इसके अलावा, एकाद कार्यक्रम ऐतिहासिक हैदराबाद हाउस में भी होंगे। यह वही हैदराबाद हाउस (Hyderabad House) है, जो कूटनीतिक संबंधों की नींव को लगातार मजबूत करता आया है। राजधानी दिल्ली के बेहद अहम इलाके में इंडिया गेट के उत्तर की ओर मौजूद 1, अशोक रोड का हैदराबाद हाउस महज एक सरकारी इमारत या गेस्ट हाउस नहीं है। यह उस दौर की एक ऐसी ऐतिहासिक निशानी है, जिसका कनेक्शन हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान से रहा है।
कभी दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में शुमार निजाम की शाही जिंदगी, बेशुमार दौलत और राजसी ठाठ-बाट की कई परतें इस इमारत के इतिहास से जुड़ी हुई हैं। हैदराबाद हाउस की वास्तुकला भी अपने अंदर बीते दौर की भव्यता को समेटे हुए है। इसकी विशाल संरचना, खूबसूरत मेहराबें और बारीक डिजाइन उस समय की शाही सोच और स्थापत्य कला की झलक पेश करते हैं। इमारत का हर कोना हैदराबाद रियासत के वैभव, उसके राजसी प्रभाव और उस समय की समृद्ध जीवनशैली की कहानी कहता नजर आता है।
यह भवन सिर्फ खूबसूरत वास्तुकला का उदाहरण नहीं, बल्कि भारत के राजसी अतीत और आजाद भारत की आधुनिक कूटनीतिक पहचान के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी भी है। समय के साथ इसकी भूमिका भले बदल गई, लेकिन इसकी दीवारों में इतिहास की कई कहानियां आज भी दर्ज हैं। आज हैदराबाद हाउस भारत के महत्वपूर्ण कूटनीतिक कार्यक्रमों और विदेशी नेताओं के साथ हाई लेवल बैठकों का प्रमुख स्थल है। आधुनिक दौर की इन मुलाकातों के बीच यह इमारत अपने अंदर निजामों के दौर की यादें, शाही वैभव और दिल्ली के बदलते इतिहास की विरासत को संजोए हुए है। शांत खड़ी यह इमारत मानो बीते कई दशकों के राजनीतिक और सामाजिक बदलावों की मूक गवाह बनी हुई है। तो आइए इसके ऐतिहासिक सफर पर एक नजर डालते हैं....
Hyderabad House, Delhi
हैदराबाद हाउस का ऐतिहासिक सफर
साल था 1911 का जब अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ट्रांसफर कर नई दिल्ली के निर्माण की योजना शुरू की, तब देश की कई रियासतों ने भी नई राजधानी में अपनी पहचान और प्रभाव दर्ज कराने की कोशिश की। इनमें हैदराबाद के निजाम की मांग सबसे महत्वाकांक्षी मानी गई। निजाम चाहते थे कि उन्हें ऐसा भूखंड दिया जाए, जहां उनकी हैसियत और राजसी प्रतिष्ठा के हिसाब से एक भव्य महल बनाया जा सके। उनकी इच्छा थी कि यह भवन वायसराय हाउस, यानी आज के राष्ट्रपति भवन के बेहद करीब हो। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने निजाम की इस मांग को मंजूर नहीं किया। अंग्रेज वायसराय के निवास के आसपास किसी भारतीय शासक के लिए इतनी विशाल और प्रभावशाली इमारत बनाने के पक्ष में नहीं थे। इसके बाद नई दिल्ली के किंग्स वे के अंतिम हिस्से में वायसराय हाउस से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर चुनिंदा रियासतों को भूखंड आवंटित किए गए।
किंग्स वे के आखिरी छोर पर मिली जमीन
इन रियासतों में हैदराबाद के साथ बड़ौदा, पटियाला, जयपुर और बीकानेर शामिल थीं। हैदराबाद के निजाम को किंग्स वे के आखिरी छोर पर जमीन मिली। इसी भूखंड पर 1920 के दशक में मीर उस्मान अली खान ने एक शानदार महलनुमा इमारत का निर्माण कराया, जिसे आगे चलकर हैदराबाद हाउस के नाम से पहचान मिली। उस दौर में हैदराबाद हाउस अपनी भव्यता और स्थापत्य के कारण नई दिल्ली की सबसे खास इमारतों में गिना जाता था। वायसराय हाउस को छोड़ दिया जाए तो इसकी शान-ओ-शौकत का मुकाबला राजधानी की गिनी-चुनी इमारतें ही कर पाती थीं। यह भव्यता उस शख्स की संपन्नता को भी दर्शाती थी, जिसने इसे बनवाया था।
Mir Osman Ali Khan
दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल थे मीर उस्मान अली खान
मीर उस्मान अली खान को अपने समय में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल किया जाता था। उनकी दौलत और खजाने को लेकर आज भी कई किस्से मशहूर हैं। कहा जाता है कि उनके पास मौजूद मोतियों की संख्या इतनी अधिक थी कि उनसे एक ओलंपिक आकार का स्विमिंग पूल तक भरा जा सकता था। निजाम के वैभव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जाता है कि उनके पास मशहूर जैकब डायमंड था, जिसे दुनिया के बड़े हीरों में गिना जाता है। कुछ किस्सों के मुताबिक निजाम इस बेशकीमती हीरे को किसी तिजोरी में बंद रखने के बजाय पेपरवेट के तौर पर इस्तेमाल करते थे। जिस शख्स के लिए इतना कीमती हीरा भी महज कागज दबाने की चीज बन जाए, उसके दिल्ली स्थित महल की भव्यता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
हैदराबाद हाउस को किसने डिजाइन किया?
हैदराबाद के निजाम और बड़ौदा के गायकवाड़ ने नई दिल्ली में अपने-अपने राजसी निवासों के निर्माण के लिए उस दौर के मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस (Edwin Lutyens) की मदद ली थीं। लुटियंस वही नाम हैं, जिन्होंने नई दिल्ली की वास्तुकला को एक अलग पहचान देने में अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट जैसी प्रतिष्ठित इमारतों की डिजाइन भी उनके वास्तुशिल्प से जुड़ी रही है। हालांकि निजाम की इच्छा थी कि उनका दिल्ली स्थित महल वायसराय हाउस की भव्यता की झलक पेश करे, लेकिन लुटियंस ने हैदराबाद हाउस को उसकी हूबहू नकल बनाने के बजाय एक बिल्कुल अलग वास्तुशैली दी। उन्होंने इस इमारत की योजना को अनोखे तितलीनुमा आकार में तैयार किया, जो इसे नई दिल्ली की दूसरी ऐतिहासिक इमारतों से अलग बनाता है। हैदराबाद हाउस की संरचना के केंद्र में एक प्रमुख गुंबद बनाया गया है। इसके दोनों ओर फैले हिस्से तितली के पंखों जैसी आकृति देते हैं। ये सममित संरचनाएं लगभग 55 डिग्री के कोण पर फैलती हैं। भवन के सामने बनाया गया भव्य प्रवेश मार्ग इसकी राजसी पहचान को और प्रभावशाली बनाता है।
हैदराबाद हाउस बनाने में कितनी लागत आई?
1920 के दशक में जब हैदराबाद हाउस का निर्माण कराया गया, तब इस भव्य इमारत पर करीब 2 लाख पाउंड की रकम खर्च हुई थी। उस दौर के हिसाब से यह बेहद बड़ी राशि मानी जाती थी। निर्माण पर किया गया यह खर्च इस बात का संकेत था कि निजाम अपने दिल्ली स्थित निवास को कितना शानदार और प्रभावशाली बनाना चाहते थे। हैदराबाद हाउस की सबसे खास बात इसकी मिश्रित वास्तुकला है। इसे यूरोपीय स्थापत्य शैली की बुनियाद पर तैयार किया गया, लेकिन इसमें भारतीय और खासकर मुगल वास्तुकला के कई तत्वों को भी खूबसूरती से शामिल किया गया। यही सांस्कृतिक मेल इस इमारत को बाकी ऐतिहासिक भवनों से अलग पहचान देता है।
यूरोपीय शिल्प और भारतीय राजसी सौंदर्य का अनोखा संगम
इस विशाल महलनुमा इमारत में करीब 36 बड़े कमरे थे। इसके अंदरूनी हिस्से को मेहराबदार गलियारों, खुले आंगनों और फव्वारों से सजाया गया था, जो पूरे परिसर को राजसी रूप प्रदान करते थे। सामने की ओर बना विशाल हॉल भी इसकी भव्यता को और बढ़ाता था। भवन के ऊपरी हिस्से में फ्लोरेंटाइन शैली का प्रभाव दिखाई देता है। यहां मौजूद मेहराबों की डिजाइन पर रोम के प्रसिद्ध पैंथियन की वास्तुकला का प्रभाव माना जाता है। इस तरह हैदराबाद हाउस में यूरोपीय शिल्प और भारतीय राजसी सौंदर्य का अनोखा संगम देखने को मिलता है। लुटियंस ने हैदराबाद हाउस की योजना बनाते समय महिलाओं के लिए एक अलग जनाना (महिलाओं के लिए अलग जगह) भी तैयार किया था। यह हिस्सा एक गोलाकार आंगन के आसपास विकसित किया गया था, जिसके चारों ओर करीब 12 से 15 छोटे कमरों की व्यवस्था थी।
Hyderabad House From Inside
हैदराबाद हाउस की भव्यता देखकर दंग रह गए थे लॉर्ड हार्डिंग
हैदराबाद हाउस का निरीक्षण करने के बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने इसकी अंदरूनी बनावट और सुविधाओं का भी जिक्र किया था। उनके विवरण के मुताबिक, इमारत के कमरे इतने विशाल थे कि उनका आकार घोड़ों के अस्तबल जितना बड़ा लगता था। हालांकि कमरों में साज-सज्जा बेहद साधारण रखी गई थी और उनमें मुख्य रूप से एक साधारण बिस्तर ही नजर आता था। लेकिन सुविधाओं के मामले में यह भवन अपने समय से काफी आगे था। हार्डिंग ने बताया था कि यहां महिलाओं के स्नान के लिए गर्म और ठंडे पानी की अलग-अलग व्यवस्था थी।
लुटियंस की सबसे शानदार रचनाओं में शामिल
एडविन लुटियंस ने नई दिल्ली में कई महत्वपूर्ण महलों और इमारतों की डिजाइन तैयार की, लेकिन हैदराबाद हाउस को उनकी सबसे भव्य रचनाओं में गिना जाता है। इसकी विशालता, स्थापत्य शैली और शाही स्वरूप ने इसे राजधानी की सबसे प्रभावशाली इमारतों में स्थान दिलाया। कई विवरणों में इसे राष्ट्रपति भवन के बाद नई दिल्ली की सबसे शानदार इमारतों में भी माना गया है। हैदराबाद हाउस की चमक-दमक को सिर्फ निजाम की दौलत का प्रदर्शन मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। यह इमारत उनके राजसी दर्जे और राजनीतिक प्रभाव का भी प्रतीक थी। हैदराबाद के निजाम को ब्रिटिश शासन के दौरान 21 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था, जो उनकी ऊंची राजनीतिक हैसियत को दर्शाता था।
आजादी के बाद बदल गई हैदराबाद हाउस की भूमिका
1947 में देश की आजादी के बाद जब भारतीय रियासतों को भारत में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब हैदराबाद रियासत का मामला काफी समय तक अलग रहा। निजाम ने शुरुआत में भारत में विलय को स्वीकार नहीं किया और हैदराबाद लंबे समय तक स्वतंत्र रहने की कोशिश करता रहा। हालात तब बदले जब सितंबर 1948 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो शुरू किया। सैन्य कार्रवाई के बाद हैदराबाद रियासत का भारत में विलय हो गया। इसके साथ ही निजाम की राजनीतिक ताकत और प्रभाव में भी धीरे-धीरे कमी आती गई। इस राजनीतिक बदलाव का असर दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस पर भी पड़ा। जिस इमारत का निर्माण कभी निजाम के शाही निवास के तौर पर हुआ था, वह धीरे-धीरे उनके व्यक्तिगत उपयोग से बाहर हो गई और अंततः भारत सरकार के नियंत्रण में आ गई। इसके बाद हैदराबाद हाउस की भूमिका पूरी तरह बदल गई। साल 1974 में इसे विदेश मंत्रालय के अधीन कर दिया गया। इसके साथ ही कभी निजाम के राजसी वैभव का प्रतीक रहा यह महल आजाद भारत की कूटनीतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र में बदल गया।
हैदराबाद हाउस: भारत की कूटनीति का नया केंद्र
कभी हैदराबाद के निजाम की शाही हैसियत और प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा यह भव्य भवन आज भारत की कूटनीतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्रों में शामिल है। समय के साथ हैदराबाद हाउस का स्वरूप और उपयोग पूरी तरह बदल गया। जहां कभी शाही परिवार का वैभव दिखाई देता था, वहीं अब यहां दुनिया के प्रभावशाली राष्ट्राध्यक्षों और शीर्ष नेताओं का स्वागत किया जाता है। 1970 के दशक के बाद से हैदराबाद हाउस भारत की विदेश नीति से जुड़ी महत्वपूर्ण गतिविधियों का प्रमुख मंच बन गया। यहां प्रधानमंत्री की ओर से विदेशी मेहमानों के सम्मान में आधिकारिक भोज आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ उच्चस्तरीय बैठकें तथा महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताएं भी इसी ऐतिहासिक इमारत में होती हैं। इस तरह हैदराबाद हाउस ने समय के साथ अपनी पहचान को एक शाही निवास से बदलकर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अहम केंद्र के रूप में स्थापित किया है। आज इसकी ऐतिहासिक दीवारों के बीच होने वाली हर बड़ी बैठक भारत की वैश्विक कूटनीति की एक नई कहानी लिखती है।
