Delhi Metro: दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की चेयरपर्सन डी. थारा ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बिना शर्त माफी मांगी है। उन्होंने कहा है कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश का पालन उसकी भावना और शब्दों के अनुरूप किया गया है। थारा ने अदालत से 11 अक्टूबर को जारी अवमानना नोटिस को खारिज करने की अपील की है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
हलफनामे में डी. थारा ने कहा कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में मामले का उल्लेख किए जाने और सुनवाई के दौरान दिल्ली मेट्रो को न तो नोटिस दिया गया था और न ही निगम अदालत में मौजूद था। उन्होंने कहा कि अदालत के सामने यह दलील रखी गई थी कि आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
दिल्ली मेट्रो चेयरपर्सन के मुताबिक, दिल्ली मेट्रो नेटवर्क में कुल 303 स्टेशन हैं। 8 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने इनमें से 57 स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने का निर्देश दिया था। 9 अक्टूबर को पुलिस ने प्रतिबंधित स्टेशनों की संख्या घटाकर 45 कर दी। डीएमआरसी का दावा है कि 10 अक्टूबर को 271 ट्रेनें चलाई गईं और कुल 4,157 ट्रेन ट्रिप पूरी की गईं। उसके मुताबिक, ट्रेन ट्रिप की संख्या में कोई कटौती नहीं हुई।
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि 10 अक्टूबर को मेट्रो से करीब 32 लाख यात्रियों ने सफर किया, जबकि सामान्य दूसरे शनिवार को यह संख्या लगभग 58 लाख रहती है। मेट्रो ने यात्रियों की संख्या में गिरावट को विरोध-प्रदर्शन के असर से जोड़ा है। उसके अनुसार, 10 अक्टूबर की रात 10 बजे से 45 स्टेशनों पर लगी पाबंदियां हटा दी गई थीं।
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डी. थारा ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि डीएमआरसी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा एजेंसियों के आकलन और निर्देशों के अनुसार काम करेगा।
क्या मेट्रो चेयरपर्सन ने SC के सामने गलती मान ली है?
हलफनामे को देखें तो डी. थारा ने मेट्रो सेवाओं पर पाबंदी लगाने के मामले में गलती स्वीकार करने या किसी अधिकारी की चूक मानने की स्पष्ट बात नहीं कही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रति सम्मान जताते हुए बिना शर्त माफी मांगी है और दावा किया है कि 9 अक्टूबर के आदेश का पालन उसकी भावना और शब्दों के अनुरूप किया गया। यानी हलफनामे में माफी तो है, लेकिन यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं है कि डीएमआरसी से गलती हुई थी या अदालत के आदेश का उल्लंघन किया गया था।
इसके बजाय, डी. थारा ने अपने बचाव में कहा है कि 9 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान डीएमआरसी को न तो नोटिस दिया गया था और न ही निगम अदालत में मौजूद था। उन्होंने यह भी दलील दी कि मेट्रो नेटवर्क पूरी तरह बंद नहीं था और ट्रेन परिचालन जारी रहा। ऐसे में बिना शर्त माफी को अदालत के प्रति सम्मान जताने और अवमानना की कार्यवाही से राहत मांगने के कदम के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन इसे अपने आप गलती मान लेने के बराबर नहीं कहा जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अवमानना नोटिस खारिज करने की अपील भी की है।
