Delhi SIR: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर अहम सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने पूछा कि जिन मतदाताओं के नाम 2026 की मतदाता सूची में पहले से दर्ज हैं, उन्हें दोबारा फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
दिल्ली एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई (फाइल फोटो)
फॉर्म-6 का इस्तेमाल मुख्य रूप से पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 43 लाख लोगों के नाम हटाए जाने के बाद यह सवाल उठा है। इन मतदाताओं को स्थानांतरित या अनुपस्थित श्रेणी में रखा गया है। पिछली बार हुई सुनवाई में प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया था कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। इस पर जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग से इन शिकायतों की जांच करने को कहा था। कोर्ट ने कहा था कि नोटिस ऐसे है जैसे कंप्यूटर से बने हो।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया में मौजूद खामियों और उन मतदाताओं की स्थिति पर सवाल उठाए, जो किसी दूसरे स्थान पर स्थायी रूप से नहीं गए हैं, लेकिन उन्हें गणना प्रपत्र नहीं मिल पाया या वे इसे जमा नहीं कर सके। आयोग ने कोर्ट से कहा कि वह देर से जमा किए गए गणना फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समयसीमा भी बढ़ाई जा सकती है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह के भीतर इस संबंध में रिपोर्ट देने को कहा है।
पुराने मतदाताओं को क्यों भरना होगा फॉर्म-6?
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि किसी मतदाता का नाम 2026 की मतदाता सूची में पहले से मौजूद है और वह केवल अपना निवास स्थान बदलकर दिल्ली के किसी दूसरे इलाके में गया है, तो उसे फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों बाध्य किया जाए? ऐसे मामलों में फॉर्म-8 का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो मतदाता सूची में पहले से दर्ज मतदाताओं के विवरण या निवास स्थान में बदलाव के लिए है।
कोर्ट की चिंता यह थी कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को ऐसी घोषणा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जिससे यह लगे कि उनका नाम पहले कभी मतदाता सूची में दर्ज ही नहीं था।
एक-दो महीने काम के लिए बाहर रहने का मतलब स्थायी रूप से पलायन नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी अनुपस्थिति और स्थायी रूप से निवास स्थान बदलने के बीच अंतर पर भी जोर दिया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति काम के सिलसिले में एक या दो महीने के लिए कहीं बाहर चला जाता है, तो उसे स्थायी रूप से स्थानांतरित कैसे माना जा सकता है?
दिल्ली जैसे शहर में बड़ी संख्या में मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी मजदूर काम करते हैं। उनकी आवाजाही अक्सर काम और रोजगार पर निर्भर करती है। ऐसे में केवल कुछ समय के लिए अपने पते पर मौजूद नहीं होने के आधार पर उन्हें स्थायी रूप से स्थानांतरित मानना उचित नहीं होगा।
फॉर्म जमा नहीं किया तो क्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा वोट देने का अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस प्रक्रिया से जुड़े एक बुनियादी सवाल को उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि कोई मतदाता गणना फॉर्म जमा नहीं कर पाता है, तो क्या वह हमेशा के लिए अपना मतदान का अधिकार खो देगा?
जस्टिस बागची ने इसे 'स्ट्रक्चरल इनकांग्रुइटी' (संरचनात्मक विसंगति) बताते हुए कहा कि इस समस्या का समाधान किया जाना जरूरी है। कोर्ट की चिंता यह थी कि किसी प्रक्रिया में शामिल होने से चूक जाने के कारण मतदाता को स्थायी रूप से मताधिकार से वंचित करने जैसी स्थिति नहीं बननी चाहिए।
जिन लोगों को फॉर्म मिला ही नहीं, उनके लिए क्या व्यवस्था है?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया में ऐसी श्रेणी की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें वे मतदाता शामिल हैं जिन्होंने अपना निवास स्थान नहीं बदला, लेकिन उन्हें गणना फॉर्म दिया ही नहीं गया।
कोर्ट के सवाल का मूल यह था कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने पते पर ही रह रहा है और उसे फॉर्म नहीं मिला, तो वह खुद को मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए क्या करे? आयोग की प्रक्रिया में ऐसे मतदाताओं के लिए स्पष्ट समाधान होना चाहिए, ताकि फॉर्म नहीं मिलने की गलती का खामियाजा उन्हें न भुगतना पड़े।
समयसीमा बीतने के बाद भी फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करे आयोग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती, तब तक केवल निर्धारित समयसीमा समाप्त हो जाने के आधार पर गणना फॉर्म खारिज करने का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं दिखता।
चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि वह देर से जमा किए गए फॉर्म स्वीकार करने के विकल्प पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समयसीमा बढ़ाने पर भी विचार किया जाएगा। आयोग को इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी है।
दिल्ली में हाल फिलहाल चुनाव नहीं, फिर समयसीमा को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों?
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भी समयसीमा को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब दिल्ली में निकट भविष्य में कोई चुनाव प्रस्तावित नहीं है, तो चुनाव आयोग को निर्धारित समयसीमा पर इतना जोर देने की जरूरत क्यों है?
कोर्ट की टिप्पणी का आशय यह था कि मतदाता सूची को सही और समावेशी बनाने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, ताकि प्रक्रिया में शामिल होने से चूक गए लोगों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिल सके।
आयोग खुद मतदाताओं तक पहुंचे, सारी जिम्मेदारी उन पर न डाले
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की बड़ी प्रवासी आबादी को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और दिहाड़ी कामगारों जैसे लोगों की बड़ी संख्या दिल्ली में काम करती है और उनकी आवाजाही लगातार बनी रहती है।
ऐसे में पूरी जिम्मेदारी मतदाताओं पर नहीं छोड़ी जा सकती कि वे खुद चुनाव आयोग के कार्यालय पहुंचकर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। आयोग को भी ऐसे मतदाताओं तक पहुंचने और उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए।
हटाए गए नामों की सूची आसान हिंदी और स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित हो
अदालत ने मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों के नामों की सूची को आसानी से उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी जोर दिया। सूची ऐसी होनी चाहिए, जिसे आम लोग आसानी से समझ सकें। इसके लिए सरल हिंदी और स्थानीय भाषाओं में जानकारी प्रकाशित करने की जरूरत है।
साथ ही, सूची में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि संबंधित मतदाता निर्धारित प्रक्रिया के तहत जवाब नहीं देता है, तो उसके नाम और मतदान के अधिकार पर क्या असर पड़ सकता है। इससे मतदाताओं को समय रहते अपनी स्थिति समझने और जरूरी कदम उठाने में मदद मिलेगी।
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की वैलेडिटी जांचना अभी बाकी: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने बिहार में हुए SIR से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों का भी उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार से जुड़े आदेशों को SIR की प्रक्रिया से संबंधित हर कानूनी सवाल पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' (तार्किक विसंगति) की जांच की वैधता का प्रश्न अभी खुला है। यानी बिहार मामले में दिए गए आदेशों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि इस श्रेणी या इससे जुड़ी प्रक्रिया को सभी मामलों में अंतिम रूप से न्यायिक मंजूरी मिल चुकी है।
2003 की मतदाता सूची में दर्ज नामों को दोबारा खोलने पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि चुनाव आयोग एक व्यापक प्रक्रिया के तहत 2003 की संदर्भ मतदाता सूची में पहले से दर्ज नामों को दोबारा जांच के दायरे में कैसे ला सकता है।
कोर्ट की चिंता यह थी कि पहले से मौजूद संदर्भ सूची में दर्ज नामों को फिर से खोलने के लिए इस्तेमाल की जा रही प्रक्रिया का आधार और उसका दायरा स्पष्ट होना चाहिए।
सुनवाई का मुख्य सवाल यही है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम केवल तकनीकी चूक, फॉर्म नहीं मिलने या समयसीमा के भीतर जवाब नहीं दे पाने के कारण बाहर नहीं रह जाना चाहिए। चुनाव आयोग को अब इन सवालों पर दो सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट देनी होगी।
