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1967 की वो घटना, जिसने UP में Congress का किला हिला दिया और गठबंधन के नए दौर की नींव रखी

साल 1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर जनसंघ, समाजवादी और कम्युनिस्ट दलों को साथ लाकर उत्तर प्रदेश में ऐसा प्रयोग किया, जिसने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। उनके प्रयोग ने यूपी और देश में एक नई तरह की राजनीति की नींव रखी।

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चरण सिंह ने यूपी में कांग्रेस के वर्चस्व को दी चुनौती
Authored by: दिगपाल सिंह
Updated Oct 28, 2026, 18:20 IST
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आज भारत का लोकतंत्र काफी विकसित हो चुका है। राज्यों ही नहीं केंद्र के स्तर पर भी एक के बाद एक गठबंधन सरकारें सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी हैं, फिर चाहे वह पीएम अटल वाजपेयी की पहली NDA सरकार हो या पीएम मनमोहन सिंह की UPA सरकार और अब पीएम नरेंद्र मोदी की NDA की सरकार, लेकिन 1967 में हालात अलग थे। आज बात 1967 के उत्तर प्रदेश की हो रही है और उस समय राज्य ही नहीं देश में भी कांग्रेस का एकछत्र राज था। उस समय तक कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता रहे चरण सिंह ने कांग्रेस के तिलिस्म को ऐसा तोड़ा कि राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन बैठे। जिस तरह से आज भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां, समाजवादी के साथ ही अन्य क्षेत्रीय दल इकट्ठा हो गए हैं, वैसा ही कुछ आज से साठ साल पहले चरण सिंह ने कर दिखाया था।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज गठबंधन, सीटों का बंटवारा और साझा उम्मीदवार चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हैं। लेकिन लगभग छह दशक पहले हुए उस राजनीतिक प्रयोग ने देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को चुनौती दे डाली। बड़ी बात ये है कि चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर ऐसे दलों को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई, जिनकी विचारधाराएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं। एक तरफ दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ था, तो दूसरी तरफ समाजवादी और कम्युनिस्ट दल। इन सबको जोड़ने वाला साझा लक्ष्य था - कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना।

इस राजनीतिक प्रयोग का नतीजा 3 अप्रैल 1967 को सामने आया, जब चौधरी चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। हालांकि, संयुक्त विधायक दल (SVD) की यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी, लेकिन इसने यूपी की राजनीति में एकदलीय वर्चस्व को चुनौती देने और गठबंधन सरकारों के लिए नई जमीन तैयार करने का काम किया।

1967 के चुनाव में कांग्रेस को नहीं मिला बहुमत

आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में लगातार कांग्रेस का दबदबा रहा था। लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदलने लगी। 425 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस 199 सीटें ही जीत पाई, जबकि बहुमत के लिए 213 सीटों की जरूरत थी। भारतीय जनसंघ 98 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा। समाजवादी और कम्युनिस्ट दलों ने भी विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने चरण सिंह

यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने चरण सिंह

चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी जरूर थी, लेकिन अब उसके लिए पहले की तरह आसानी से सरकार चलाना संभव नहीं था। पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान ने संकट को और गहरा कर दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता और चौधरी चरण सिंह के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता थी। चरण सिंह भी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने गुप्ता को आगे बढ़ाया।

CM पद की दावेदारी से शुरू हुई बगावत

चौधरी चरण सिंह लंबे समय तक कांग्रेस में रहे थे और उत्तर प्रदेश सरकार में कई अहम विभाग संभाल चुके थे। उनका कांग्रेस छोड़ने का फैसला सिर्फ मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा से जुड़ा नहीं था। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, नेतृत्व से मतभेद और कुछ मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भी उनका पार्टी नेतृत्व से टकराव था।

चरण सिंह के जीवन और राजनीतिक सफर को दर्ज करने वाले Charan Singh Archives के मुताबिक, इंदिरा गांधी के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान उन्होंने चंद्रभानु गुप्ता के पक्ष में अपनी दावेदारी छोड़ने पर सहमति जताई थी। इसके बदले उन्होंने कुछ मंत्रियों को हटाने की मांग रखी। उनके मुताबिक, सहमति बनने के बावजूद यह शर्त पूरी नहीं हुई। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनका विवाद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया।

चरण सिंह की राजनीति में किसान, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अहम मुद्दे थे। उनकी आर्थिक सोच नेहरू के औद्योगीकरण मॉडल से अलग थी। हालांकि, कांग्रेस से अलग होने के पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षा और संगठन के भीतर नेतृत्व का संघर्ष भी अहम कारक थे।

1 अप्रैल 1967 : गिर गई कांग्रेस सरकार

14 मार्च 1967 को चंद्रभानु गुप्ता ने निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन चरण सिंह उसमें शामिल नहीं हुए। विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान चरण सिंह अपने समर्थक कांग्रेस विधायकों के साथ विपक्ष के खेमे में खड़े हो गए। प्रस्ताव पर सरकार को झटका लगा और गुप्ता सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। इस तरह चंद्रभानु गुप्ता अपने इस दूसरे कार्यकाल में 3 अप्रैल 1967 तक मात्र 20 दिन के लिए मुख्यमंत्री पद पर रहे।

1 अप्रैल 1967 को चरण सिंह ने 17 अन्य विधायकों के साथ कांग्रेस से अलग होकर जन कांग्रेस बनाने की घोषणा की। यह केवल पार्टी बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि विधानसभा में कांग्रेस के बहुमत और सरकार बनाने की संभावनाओं को बदलने वाला घटनाक्रम था।

जनसंघ और कम्युनिस्ट एक साथ कैसे आए?

इस सवाल का जवाब समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया की गैर-कांग्रेसवादी रणनीति में मिलता है। इस विचार के तहत कांग्रेस को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों के बीच चुनावी और विधायी सहयोग को जरूरी माना गया। मकसद यह नहीं था कि सभी दल अपनी विचारधारा छोड़ दें, बल्कि यह था कि वे साझा राजनीतिक लक्ष्य के लिए साथ आ सकें।

संयुक्त विधायक दल में भारतीय जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया और अन्य विपक्षी दल शामिल हुए। स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी और निर्दलीय विधायकों ने भी इस राजनीतिक समीकरण में भूमिका निभाई। जनसंघ के नानाजी देशमुख और समाजवादी नेताओं ने विपक्षी एकता बनाने में अहम योगदान दिया।

यह गठबंधन वैचारिक समानता पर नहीं, बल्कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने और सरकार बनाने के साझा उद्देश्य पर टिका था। मंत्रिमंडल में विभिन्न दलों को जगह देने और सरकार चलाने के लिए साझा कार्यक्रम पर सहमति बनाने की कोशिश की गई।

3 अप्रैल को बने यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री

चरण सिंह को संयुक्त विधायक दल का नेता चुना गया और 3 अप्रैल 1967 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। यह प्रयोग बताता था कि विधानसभा में बहुमत का गणित बदलने पर अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल भी सत्ता में साझेदारी कर सकते हैं।

ज्यादा दिन नहीं चला गठबंधन

संयुक्त विधायक दल की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक विविधता थी। भूमि राजस्व, सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल और भाषा जैसे मुद्दों पर सहयोगी दलों के बीच मतभेद उभरे। जनवरी 1968 में समाजवादी खेमे के 'अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन और मंत्रियों की गिरफ्तारी के मुद्दे पर तनाव बढ़ा। सहयोगी दलों के समर्थन में कमी आने के बाद चरण सिंह ने 17 फरवरी 1968 को इस्तीफा दे दिया। 25 फरवरी 1968 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

इस तरह यह सरकार करीब दस महीने चली। अपने छोटे कार्यकाल के बावजूद 1967 का प्रयोग उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अहम मोड़ बना। इसने दिखाया कि कांग्रेस जैसी लंबे समय तक प्रभावशाली रही पार्टी को भी विधानसभा में चुनौती दी जा सकती है और अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल साझा सत्ता-समीकरण बना सकते हैं। बाद के दशकों में भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका को समझने के लिए यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संदर्भ है।

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