Delhi Riots Case: दिल्ली दंगा साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत जमानत को लेकर अहम संवैधानिक सवाल बड़ी बेंच के पास भेज दिए हैं। अदालत ने कहा कि केए नजीब फैसले की व्याख्या और उसके इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों में मतभेद दिखाई दे रहा है, इसलिए अब इस मुद्दे पर बड़ी बेंच कानून साफ करेगी।
दिल्ली दंगा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपियों को दी राहत (फाइल फोटो)
तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले के आरोपी तस्लीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि दोनों लंबे समय से जेल में हैं और मुकदमे के जल्द शुरू होने की संभावना भी फिलहाल नहीं दिख रही।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को अलग-अलग तरीके से समझा और लागू किया जा रहा है। उन्होंने करतार सिंह बनाम पंजाब, शाहीन वेलफेयर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, के. रामचंद्र राव समेत कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केए नजीब फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन साथ ही यूएपीए जैसे विशेष कानून की कठोर शर्तों को भी स्वीकार करता है। अदालत ने कहा कि इस फैसले में साफ किया गया था कि यूएपीए की धारा 43D(5) अदालत की संवैधानिक शक्तियों को पूरी तरह खत्म नहीं करती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नजीब फैसला कोई 'चार्टर' या ऐसा गणितीय नियम नहीं है कि हर मामले में लंबी हिरासत अपने आप जमानत का आधार माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के फैसले को इसी संदर्भ में समझना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि गुलफिशा फैसले में अनुच्छेद 21 और त्वरित सुनवाई के अधिकार को पूरी अहमियत दी गई थी, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया था कि केवल मुकदमे में देरी जमानत का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। बल्कि अदालतों को आरोपी की अपराध में भूमिका, मुकदमे की वास्तविक स्थिति, देरी के कारण और रिहाई के संभावित जोखिमों को भी देखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुलफिशा फैसले ने नजीब जजमेंट को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे 'संवैधानिक सुरक्षा' के रूप में देखा। अदालत ने कहा कि उस मामले में दोनों आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत इसलिए नहीं मिली थी, क्योंकि उनके खिलाफ आरोपों और भूमिका को हमने अपने आदेश में गंभीर माना था।
जस्टिस अरविंद ने दूसरे बेंच पर खड़े किए सवाल
जमानत का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बाद में आए अंद्राबी फैसले में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां (समान शक्ति वाली बेंच) ने गुलफिशा फैसले पर गंभीर सवाल उठाए थे और कहा था कि उसने नजीब फैसले की सीमित व्याख्या की है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी समान शक्ति वाली बेंच को दूसरे फैसले की केवल आलोचना करने के बजाय मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए।
अदालत ने कहा, 'न्यायिक अनुशासन केवल आलोचना करने से पूरा नहीं होता। अगर किसी पुराने फैसले को असंगत माना जाता है, तो उसे बड़ी बेंच को भेजना ही उचित प्रक्रिया है।'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक तरफ यूएपीए की धारा 43D(5) की अत्यधिक कठोर व्याख्या अनुच्छेद 21 को कमजोर कर सकती है, वहीं दूसरी तरफ बिना किसी सीमा के जमानत देने का दृष्टिकोण संसद की मंशा और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि अनुच्छेद 21 बचा हुआ है या नहीं, बल्कि यह है कि जब संसद ने राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर कड़ी शर्तें लगाई हैं, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को किस तरह लागू किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बड़ी बेंच को संदर्भ भेजने का मतलब केए नजीब फैसले पर कोई संदेह जताना नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून की स्पष्टता और एकरूपता बनाए रखने के लिए मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में बड़ी बेंच करने का अनुरोध किया जाएगा।
तस्लीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को दी गई अंतरिम जमानत के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कई शर्तें भी लगाई हैं। दोनों को पासपोर्ट जमा करना होगा या हलफनामा देना होगा कि उनके पास पासपोर्ट नहीं है। बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जा सकेंगे। उन्हें अपना मौजूदा पता अदालत को देना होगा और हर सुनवाई पर ट्रायल कोर्ट में पेश होना होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों आरोपी किसी गवाह या शिकायतकर्ता से संपर्क नहीं करेंगे, इलेक्ट्रॉनिक या अन्य किसी सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेंगे और प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कोई सार्वजनिक बयान नहीं देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर मुकदमे में देरी कराने की कोई कोशिश की गई, तो उसे जमानत रद्द करने का आधार माना जाएगा।
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